‘जंगल राज’ का नैरेटिव लौट आया

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वास्तविकता है कि लालू प्रसाद के परिवार के साथ ‘जंगल राज’ की विरासत जुड़ी है। तेजस्वी यादव उसी विरासत के प्रतिनिधि हैं। कांग्रेस को पता था कि उनके नाम की घोषणा से लोगों की स्मृति में पुरानी सारी कहानियां फिर से जीवित हो जाएंगी। उन 15 वर्षों में कितने नरसंहार हुए, कितनी हत्याएं हुईं और कैसे सत्ता के संरक्षण में अपहरण उद्योग फला फूला यह सब लोगों के दिमाग में घूमने लगेगा।

यह अनायास नहीं है कि प्रधानमंत्री  नरेंद्र मोदी ने बिहार विधानसभा चुनाव के लिए प्रचार अभियान की शुरुआत की तो दो जनसभाओं में 30 बार ‘जंगल राज’ शब्द का इस्तेमाल किया, जो लालू प्रसाद और राबड़ी देवी के 15 साल के शासन की पहचान का शब्द है। यह शब्द किसी राजनीतिक दल का दिया हुआ नहीं है, बल्कि अदालत का दिया हुआ है। लगभग 15 साल के संघर्ष के बाद बिहार ‘जंगल राज’ से आजाद हुआ था। आज बिहार चुनाव में एक बार फिर ‘जंगल राज’ की आहट सुनाई दे रही है तभी  प्रधानमंत्री ने बार बार बिहार के लोगों को स्मरण कराया कि बिहार कैसी स्थितियों में था और कैसे उसे वहां से निकाला गया था। उन्होंने ‘मेरा बूथ सबसे मजबूत’ अभियान के तहत संवाद करते हुए बिहार के भाजपा कार्यकर्ता से भी कहा कि वे बुजुर्ग लोगों को लेकर जनता के बीच जाएं और 18 से 35 साल के युवाओं को ‘जंगल राज’ सत्य घटनाएं बताएं, जो अपराध कथाओं से ज्यादा लोमहर्षक हैं।

बिहार की विपक्षी पार्टियों के महागठबंधन की ओर से  लालू प्रसाद और  श्रीमति राबड़ी देवी के बेटे  तेजस्वी यादव को मुख्यमंत्री पद का दावेदार घोषित कर दिया गया है। यह पहले से तय था लेकिन अब उस पर औपचारिक मुहर लग गई है। यह एक तरह से उस राज को वापस लौटा लाने का संकेत है, जिससे 2005 में भाजपा और जनता दल यू ने बिहार को मुक्त कराया था। बिहार के लोग किसी हाल में ऐसा नहीं होने दे सकते हैं। तभी कह सकते हैं कि   तेजस्वी यादव के नाम की घोषणा करके महागठबंधन ने बिहार के चुनाव का फैसला तय कर दिया है। यह राष्ट्रीय जनता दल की जिद थी कि तेजस्वी यादव के नाम की घोषणा की जाए, जिसके लिए कांग्रेस तैयार नहीं हो रही थी। कांग्रेस को अंदाजा था कि उनके नाम की घोषणा मात्र से महागठबंधन चुनाव गंवा देगा। तभी कांग्रेस ने कई तरह के तर्कों से उनके नाम की घोषणा रोक रखी थी।

यह बिहार की वास्तविकता है कि लालू प्रसाद के परिवार के साथ ‘जंगल राज’ की विरासत जुड़ी है। तेजस्वी यादव उसी विरासत के प्रतिनिधि हैं। कांग्रेस को पता था कि उनके नाम की घोषणा से लोगों की स्मृति में पुरानी सारी कहानियां फिर से जीवित हो जाएंगी। उन 15 वर्षों में कितने नरसंहार हुए, कितनी हत्याएं हुईं और कैसे सत्ता के संरक्षण में अपहरण उद्योग फला फूला यह सब लोगों के दिमाग में घूमने लगेगा। कांग्रेस को यह भी अंदाजा था कि राजद नेता के नाम की घोषणा होते ही गैर यादव पिछड़ी जातियों, सवर्ण जातियों और दलित समुदाय का ध्रुवीकरण एनडीए की ओर पूरी तरह से हो जाएगा। वैसे भी ये समुदाय पारंपरिक रूप से एनडीए के साथ होते हैं। सत्ता की जाति होने की वजह से और राजद के 15 साल के निरंकुश शासन की वजह से यादव समुदाय का टकराव दूसरी जातियों के साथ सामाजिक स्तर पर रहा है। तभी कांग्रेस नहीं चाहती थी कि ऐसे किसी ध्रुवीकरण की स्थिति बनने दी जाए लेकिन राजद नेताओं की जिद के आगे उसे घुटने टेकने पड़े। महागठबंधन की सहयोगी पार्टियों की एक चिंता यह भी थी कि   लालू प्रसाद के साथ साथ   तेजस्वी यादव के खिलाफ आईआरसीटीसी के टेंडर से जुड़े एक मामले में 13 अक्टूबर को आरोप तय हुए हैं और जमीन के बदले नौकरी के मामले में दोनों पिता, पुत्र के खिलाफ आरोप तय होकर सुनवाई हो गई है, जिसमें फैसला आने वाला है। जाहिर है भ्रष्टाचार के इतने बड़े मामले के आरोपी को मुख्यमंत्री पद का दावेदार घोषित करना जोखिम का काम है।

फिर भी महागठबंधन ने गंभीर भ्रष्टाचार के आरोपी और बिहार में ‘जंगल राज’ लाने वाली पार्टी के नेता को मुख्यमंत्री पद का दावेदार घोषित करके अपनी मंशा स्पष्ट कर दी है। बिहार के लोगों को इसे समझने में परेशानी नहीं होगी क्योंकि राष्ट्रीय जनता दल के समर्थक बिहार की सड़कों पर और सोशल मीडिया में अपनी मंशा का प्रदर्शन कर रहे हैं। पिछले कुछ दिनों से बिहार में प्रचार के लिए राजद के नेता जिन गानों का इस्तेमाल कर रहे हैं या सोशल मीडिया में उनके समर्थक जैसे गाने वायरल करा रहे हैं उससे भी स्पष्ट है कि महागठबंधन बिहार में किस किस्म का शासन लाना चाहता है। अभी   तेजस्वी यादव विपक्षी गठबंधन की ओर से मुख्यमंत्री पद के दावेदार भर घोषित हुए हैं लेकिन उनके समर्थक मान रहे हैं कि वे मुख्यमंत्री हो गए है। उन्होंने अभी से कट्टा, दुनाली, राइफल,  पिस्तौल के वीडियो के साथ ‘गोली मार देने’, ‘उठा लेने’, ‘धुआं धुआं कर देने’ की धमकी देनी शुरू कर दी है। उधर ‘जंगल राज’ का प्रतीक चेहरा रहे मोहम्मद शहाबुद्दीन के बेटे मोहम्मद ओसामा शहाब को राष्ट्रीय जनता दल ने चुनाव मैदान में उतार कर अपनी मंशा पहले ही जगजाहिर कर दी है। तभी   केंद्रीय गृह मंत्री   अमित शाह ने सिवान की सभा में बिहार के लोगों को भरोसा दिलाया कि सैकड़ों शहाबुद्दीन आकर भी बिहार के लोगों को अब नहीं डरा पाएंगे।

बहरहाल,   प्रधानमंत्री   नरेंद्र मोदी ने अपनी जनसभा में विवादित गानों के बारे में भी बिहार के लोगों को बताया। उन्होंने समस्तीपुर में एनडीए के चुनाव अभियान का आगाज करते हुए आपत्तिजनक गीतों को जंगलराज की आहट बताया।   प्रधानमंत्री ने कहा, ‘राजद, कांग्रेस का यह लठबंधन अभी से छर्रा, कट्टा, दुनाली के जरिए घर से उठाने की धमकी देने लग गए। इनका प्रचार इन्हीं धुनों पर चल रहा है। बदनीयत लठबंधन वाले पुराने जंगल राज का दिन वापस लाने का प्रचार कर रहे हैं। माताओं, बहनों के सम्मान और स्वाभिमान की रक्षा के लिए इस चुनाव में भी जंगल राज वालों का डब्बा गोल करना है’।   प्रधानमंत्री ने जिन गानों की ओर संकेत किया वो बेहद आपत्तिजनक हैं। एक गाने में तो सीधे प्रधानमंत्री   नरेंद्र मोदी और केंद्रीय मंत्री   चिराग पासवान को मारने की धमकी दी जा रही है। ‘जंगल राज’ की आहट कैसी होती है उसे इन गानों से समझा जा सकता है।

एक गाना है, ‘भईया के आबे दे सत्ता रे, कट्टा सटा के उठा लेबऊ घरा से रे’। इसका मतलब है कि भईया यानी   तेजस्वी यादव की सत्ता आती है तो कट्टा यानी देसी पिस्तौल सटा कर उठा लेंगे यानी अगवा कर लेंगे। एक दूसरा गाना है, ‘घरे घरे से चलतउ राइफल का दाना, यादव के नाम से ना केस लेतउ थाना’। यह सत्ता के संरक्षण में अपराध होगा इसका इशारा है। इसका मतलब है कि घर से घर राइफल की गोली चलेगी और थाने में केस भी दर्ज नहीं होगा। ऐसा ही ‘जंगल राज’ में होता था। एक तीसरा गाना है, ‘मार देहिब गोली त छेदत निकली, इहां अहिरे के चलल बा अहिरे के चली’। यह अहिर यानी यादव का निरंकुश राज चलाने का दावा है, जिसमें गोली मार कर छेद देने की धमकी दी जा रही है। यह तीसरा गाना तो ऐसे गायक का है, जो राष्ट्रीय जनता दल की टिकट पर चुनाव लड़ रहा है। इसके करोड़ों व्यूज हैं। क्या इसके बाद भी राजद और महागठबंधन की उसकी सहयोगी पार्टियों का शासन कैसा होगा, इसे समझने में कोई शंका रह गई है?

बिहार के मतदाताओं को यह बात समझने की जरुरत है कि 1990 से 2005 का शासन, जिसे ‘जंगल राज’ की संज्ञा दी जाती है वह किस कदर विनाशकारी था। उन 15 वर्षों में बिहार राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक रूप से सबसे बदहाल राज्य में तब्दील हुआ। 1990 में समाप्त हुए कांग्रेस के शासन में भी बिहार पिछड़ गया था लेकिन तब भी देश की प्रति व्यक्ति आय के 43 फीसदी के बराबर बिहार की प्रति व्यक्ति आय थी, जो   लालू प्रसाद और  मति राबड़ी देवी के शासन में घट कर महज 27 फीसदी हो गई। बिहार बिल्कुल निचले पायदान पर पहुंच गया। बड़ी मुश्किल से इसे वहां से निकाला गया है। ‘जंगल राज’ के 15 वर्षों में करीब 70 हजार निर्दोष लोगों की हत्या हुई। हजारों अपहरण हुए, जिसके बाद विदेशी पत्र, पत्रिकाओं में बिहार की बदनामी की कहानियां छपीं। आज फिर उसी पार्टी और उसी परिवार के लोग सत्ता पर कब्जा करने के लिए तरह तरह के प्रपंच रच रहे हैं।

हर परिवार के एक सदस्य को सरकारी नौकरी देने जैसा झूठा वादा करके बिहार के लोगों की भावनाओं से खेलने का प्रयास किया जा रहा है।   तेजस्वी यादव कह रहे हैं कि वे बिहार में काम करने की उम्र वाली आबादी में लगभग हर दूसरे व्यक्ति को सरकारी नौकरी दे देंगे। सवाल है कि करीब पौने तीन करोड़ लोगों को नौकरी देंगे तो उनसे क्या काम कराएंगे? उनके वेतन आदि देने की बात तो बाद में आती है। क्या बिहार के जागरूक और समझदार युवाओं को ऐसे झूठे वादों से बरगलाया जा सकता है? परंतु ‘जंगल राज’ वालों को लगता है कि वे ऐसे झूठे वादों से लोगों की भावनाएं जगा कर फिर से सत्ता हासिल कर लेंगे और लूट का खेल चालू कर देंगे। तभी   प्रधानमंत्री ने बार बार बिहार के लोगों को स्मरण कराया है कि ‘जंगल राज’ की आहट सुनाई दे रही है, लोगों को सावधान हो जाना चाहिए।   (लेखक दिल्ली में सिक्किम के मुख्यमंत्री प्रेम सिंह तामंग (गोले) के कैबिनेट मंत्री का दर्जा प्राप्त विशेष कार्यवाहक अधिकारी हैं।)


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