कांग्रेस, राजद ने फिर फैलाया रायता!

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मुख्य जिम्मेदारी कांग्रेस की थी। हमेशा राष्ट्रीय पार्टी की होती है। आरजेडी पर आरोप लगाना आसान है। मगर वह मेन प्लेयर है। उस पर उम्मीदवारों का ज्यादा दबाव था। कार्यकर्ता भी उसके पास ज्यादा हैं तो उम्मीदवार भी। और पिछले दो चुनावों से वह सबसे ज्यादा सीटें भी जीत रही है। पिछली बार 2020 में उसने सबसे ज्यादा 75 सीटें जीती थीं। भाजपा 74 के साथ नंबर दो पर थी।

बिहार में विपक्ष की शानदार बढ़त बन रही थी। मगर फिर कांग्रेस और आरजेडी ने अचानक रायता फैला दिया। सीटों का बंटवारा नहीं कर पाए। कौन कितनी सीटों पर लड़ेगा और कहां से इसकी सूची जारी नहीं कर पाए। एक साथ बैठे ही नहीं।

अब जब खूब विवाद हो गया तो गुरूवार को जब दूसरे फेज के नाम वापस लेने की आखिरी तारीख है तो संयुक्त प्रेस कान्फ्रेंस करने जा रहे हैं। उम्मीद है अब सभी 243 सीटों पर महागठबंधन का एक एक उम्मीदवार ही होगा। मगर यह काम पहले भी हो सकता था। अशोक गहलोत जो पटना जाकर अभी लालू यादव और तेजस्वी से बात कर रहे हैं वह पहले भी कर सकते थे। और विवाद सिर्फ कांग्रेस और आरजेडी में नहीं है। सभी घटक दलों में एक दूसरे के साथ है।

और कारण संवाद की कमी। विश्वास की नहीं है। यह बहुत खतरनाक बात है कि एक दूसरे पर विश्वास है। कामन एजेंडा है। मगर नेताओं में आगे बढ़कर समय रहते समस्या हल करने कr तत्परता नहीं है।

मुख्य जिम्मेदारी कांग्रेस की थी। हमेशा राष्ट्रीय पार्टी की होती है। आरजेडी पर आरोप लगाना आसान है। मगर वह मेन प्लेयर है। उस पर उम्मीदवारों का ज्यादा दबाव था। कार्यकर्ता भी उसके पास ज्यादा हैं तो उम्मीदवार भी। और पिछले दो चुनावों से वह सबसे ज्यादा सीटें भी जीत रही है। पिछली बार 2020 में उसने सबसे ज्यादा 75 सीटें जीती थीं। भाजपा 74 के साथ नंबर दो पर थी। और जो मुख्यमंत्री बने नीतीश बाबू उनकी पार्टी तीसरे नंबर पर 49 सीटों के साथ।

उससे पहले 2015 में आरजेडी 80 सीटें जीतकर नंबर एक पर थी। नीतीश की जेडीयू साथ मिलकर लड़ी थी। उतनी ही बराबर। 101 – 101। मगर उसको 71 मिली थीं। भाजपा तीसरे नंबर पर थी 57 सीटों के साथ। तो आरजेडी लगातार नंबर वन पार्टी बन रही है। और इस बार अगर महागठबंधन सरकार बनाने की सोच रहा है तो उसी की दम पर। बहुमत के लिए 122 सीटें चाहिए। कम से कम। हालांकि आज की तारीख में भाजपा और चुनाव आयोग ने जो हाल कर रखा है उसमें बहुमत के आंकड़ें से पन्द्रह बीस सीटें ज्यादा होना चाहिए। ताकि सरकार न बनने देने की सारी कोशिशें असफल साबित हो जाएं। चार छह के बहुमत को तो भाजपा छोड़िए चुनाव आयोग ही पुनर्गणना के नाम से इधर से उधर कर देगा।

मतगणना में और मतगणना के बाद की यह स्थितियां कांग्रेस राजद के सामने स्पष्ट होना चाहिए। लड़ाई मुश्किल है। यह लोग जिस लापरवाह अंदाज से लड़ रहे हैं वह नुकसान पहुंचा सकता है। 12 या 13 सीटों पर विवाद है। जिनमें से 6 पर कांग्रेस और आरजेडी आमने सामने हैं। चार पर कांग्रेस और सीपीआई दोनों के उम्मीदवार आमने सामने हैं। दो सीटों पर राजद और वीआईपी। और एक सीट पर कांग्रेस और वीआईपी में टकराव है।

स्पष्ट घोषणा न करने से कि किस पार्टी को समझौते में कितनी सीटें मिली हैं असमंजस का दौर बरकरार है। सब ने अपने अपने उम्मीदवारों की घोषणा कर दी। मगर समझौते में लड़ना कितनी सीटों पर है यह कहीं स्पष्ट नहीं है। ऐसे में झारखंड मुक्ति मोर्चा जैसी छोटी पार्टी को तो मैदान छोड़कर ही भागऩा पड़ा। राजद ने 143 उम्मीदवारो की सूची जारी की है। एक बार में ही इसलिए वहां भ्रम नहीं है। कांग्रेस ने कई बार में जारी की है। नाम बदले हैं।

इसलिए वहां कन्प्यूजन सबसे ज्यादा है। उसने पहले 48 उम्मीदवीरों की सूची जारी की। फिर एक की, फिर पांच फिर छह। अब कोई 60 बताता है कोई 61 जबकि  कांग्रेस पूरी लिस्ट अब एक बार में जारी कर सकती थी। मगर अभी तक तो की नहीं। अब शायद जो गुरुवार को प्रस्तावित आरजेडी के साथ संयुक्त प्रेस कान्फ्रेंस है उसमें जारी हो। मुकेश सहनी जिन्हें राहुल ने अपनी पूरी वोटर अधिकार यात्रा में बराबर साथ रखा उनका विवाद सबसे ज्यादा है।

उनकी पार्टी वीआईपी (विकासशील इंसान पार्टी) बिहार के मल्लाह, केवट, निषाद आदि मछली पालन करने वाली जातियों का प्रतिनिधत्व करती है। इनकी आबादी अच्छी खासी है। करीब 7 से 8 प्रतिशत। आफिशियल कुछ भी नहीं है। बस अनौपचारिक रूप से बताया जा रहा है कि वीआईपी को 9 सीटें मिली हैं। मगर उसने पन्द्रह पर अपने उम्मीदवार उतारे हैं।

चुनाव के काफी पहले से यह तय गया था कि यह सारे दल मिलकर चुनाव लड़ेंगे। पिछले साल ही तेजस्वी और मुकेश सहनी का वह वीडियो आ गया था जिसमें हैलिकाप्टर में वे साथ मछली खाते हुए साथ चुनाव लड़ने का मैसेज दे रहे थे। लेफ्ट का तय था। कांग्रेस का तय था। अभी अगस्त में राहुल की वोटर अधिकार यात्रा में सभी दलों के नेता साथ थे। दो हफ्ते तेजस्वी, सीपीआईएमएल के दीपंकर भट्टाचार्य, मुकेश सहनी सब लगातार साथ चलते रहे। अब दो महीने बाद क्या हो  गया?

हुआ कुछ नहीं! बस थोड़ी अपनी ताकत दिखाने की चाह, कार्यकर्ताओं का दबाव, राहुल को छोड़कर बाकी सबकी भीड़ देखकर जाग गया अहंकार और मैं ही अपरिहार्य हूं का अंहकार। मेरे बिना यह गठबंधन सफल नहीं हो सकता की गलतफहमी। लगातार इतने चुनाव हारने के बाद भी विपक्ष छोटी छोटी चीजों से नहीं निकल पा रहा।ठीक चुनाव के वक्त वह यह भी भूल जाता है कि मोदी के जीतने के मतलब क्या होगा।

बिहार चुनाव मोदी के जीतने का मतलब है इनकी खोई हुई ताकत की वापसी। ट्रंप के लगातार बयानों से मोदी की छवि बहुत खराब हुई है। साथ ही देश में बढ़ती बेरोजगारी केवल बातों ही बातों ने युवाओं में भारी निराशा भर दी है। अगर मोदी बिहार चुनाव हार गए तो उनकी पार्टी के अंदर ही उनके नेतृत्व पर सवाल खड़े हो जाएंगे। 2024 लोकसभा चुनाव के बाद से ही उनका ग्राफ गिरता जा रहा है।

आपरेशन सिंदूर को वे इसलिए बार बार बड़ी कामयाबी बताने की कोशिश कर रहे हैं। मगर ट्रंप का हर बयान उनकी बातों को काउंटर कर जाता है। अभी वे रूस के राष्ट्रपति पुतीन से मिलने वाले हैं। इससे पहले और बोलोंगे कि मोदी ने उनसे वादा किया है कि रूस से तेल नहीं खरीदेंगे। मोदी सीजफायर से लेकर रूस से तेल खरीदने तक की किसी बात का खंडन नहीं कर पा रहे हैं।

यही बात विपक्ष को समझना है कि यह मोदी का सबसे कमजोर दौर है। अगर यह समय भी आपसी तनातनी, मूर्खता में गंवा दिया तो फिर मोदी जल्दी दोबारा मौका देने वाले नहीं हैं।


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