इसलिए बिहार ज़रूरी है नरेंद्र भाई के लिए

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2026 में होने वाले पांच प्रदेशों के चुनाव नतीजों का 2027 में होने वाले छह राज्यों पर इसलिए चक्रवृद्धि ब्याज जैसा असर पड़ेगा कि तब फरवरी के मध्य से साल के अंत तक गुजरात, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, पंजाब, मणिपुर और गोआ में चुनाव होंगे। दिसंबर में गुजरात के चुनाव आने से पहले साल की पहली छमाही में ही बाकी पांच राज्यों के चुनाव निपट चुके होंगे और इन में से तीन के परिणाम गुजरात का भविष्य भी लिखने का काम करेंगे।

तक़रीबन एक महीने बाद नवंबर में बिहार विधानसभा के चुनाव हो जाने के बाद, 2029 में अगले लोकसभा चुनाव होने तक, देश के 21 प्रदेशों में विधानसभा के चुनाव होंगे और 4 राज्य ऐसे होंगे, जिन की विधानसभाओं के चुनाव लोकसभा-चुनाव के साथ कराए जाएंगे। यानी कुल 25 राज्य चुनावों में जाएंगे। बिहार के इस चुनाव से सामने आने वाली प्रतिपक्ष की स्थिति 2028 के आख़ीर तक होने वाले 21 प्रदेश-चुनावों के नतीजों की शक़्ल को आकार देगी। इन के चुनाव परिणाम तय करेंगे कि 2029 की लोकसभा में मौजूदा विपक्ष किस हालत में होगा।

बिहार में अगले महीने अगर भारतीय जनता पार्टी और यूनाइटेड जनता दल सत्ता से बाहर हो गया और राश्ट्रीय जनता दल के साथ कांग्रेस की सरकार बन गई तो भारतीय राजनीति के भावी आसमान का रंग क्या होगा? और, अगर ऐसा नहीं हुआ तो सियासत के राश्ट्रव्यापी फलक पर कौन-सी इबारत लिखी होगी? इस उधेड़बुन से बाहर आने का रास्ता इसलिए आसान नहीं है कि बिहार की ख्याति भले ही देश की राजनीति को नया मोड़ देने वाले प्रदेश की रही है, मगर अब वह ख़ुद ही गड्डमड्ड और दिग्भ्रम में गोता खाता दिखाई देने लगा है।

बिहार-चुनाव के बाद अगले साल 2026 में पांच प्रदेशों की विधानसभाओं के चुनाव होंगे। अप्रैल के मध्य से ले कर जून की शुरुआत तक पश्चिम बंगाल, असम, तमिलनाडु, केरल और पुदुचेरी मत-कुरुक्षेत्र में जाएंगे। दक्षिण के राज्यों पर बिहार में एनडीए की हार-जीत का कोई असर पड़े-न-पड़े, पश्चिम बंगाल और असम के चुनाव नतीजों पर इस का सीधा असर दिखाई देगा। बिहार अगर एनडीए की झोली में बरकरार रहता है तो पश्चिम बंगाल की विधानसभा में भाजपा की मौजूदा 65 सीटों में ख़ासा उछाल आने के आसार बढ़ जाएंगे। लेकिन बिहार अगर उस के दामन से छिटक जाता है तो बंगाल में उस की सीटें आधी हो जाने का खतरा सामने है।

असम में भी भाजपा और उस के सहयोगी दलों के गुलाबीपन पर बिहार के नतीजे बेतरह असर डालेंगे। असम में अभी भाजपा की 64 और सहयोगी दलों की 19 सीटें हैं। बिहार में भाजपा-जदयू की जीत इस बहुमत को कमोबेश बरकरार रख सकती है, लेकिन बिहार की हार असम में भाजपा के सहयोगी दलों का क़रीब-क़रीब सफ़ाया ही कर देगी और भाजपा की सीटें भी 50 के आसपास सिमटने की आशंका सामने खड़ी हो जाएगी।

तमिलनाडु, केरल ओर पुदुचेरी के चुनावों पर बिहार के परिणामों का प्रत्यक्ष असर भले ही दिखाई न दे, मगर परोक्ष प्रभाव की हिलोरें तो अगले साल वहां भी देखने को मिलेंगी। तमिलनाडु में भाजपा के अभी भले ही सिर्फ़ चार विधायक हैं, मगर यह भूलना ठीक नहीं होगा कि एनडीए समूह के पास 234 के सदन में 74 सीटें हैं। भाजपा पिछले कुछ वर्षों से तमिलनाडु पर ख़ास ध्यान दे रही है। केरल में भाजपा-एनडीए कहीं नहीं हैं, लेकिन पुदुचेरी में तो एनडीए की सरकार है। वहां भाजपा के अपने 6 विधायक भी हैं। 33 सदस्यों वाली पुदुचेरी विधानसभा का पेंडुलम बिहार के परिणामों से अपनी ताल मिलाएगा।

2026 में होने वाले पांच प्रदेशों के चुनाव नतीजों का 2027 में होने वाले छह राज्यों पर इसलिए चक्रवृद्धि ब्याज जैसा असर पड़ेगा कि तब फरवरी के मध्य से साल के अंत तक गुजरात, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, पंजाब, मणिपुर और गोआ में चुनाव होंगे। दिसंबर में गुजरात के चुनाव आने से पहले साल की पहली छमाही में ही बाकी पांच राज्यों के चुनाव निपट चुके होंगे और इन में से तीन के परिणाम गुजरात का भविष्य भी लिखने का काम करेंगे।

बिहार में अगर भाजपा-जदयू जख़्मी हो गए तो निश्चित मानिए कि उत्तर प्रदेश की विधानसभा में भाजपा 258 सदस्य ले कर तो किसी भी कीमत पर नहीं लौट पाएगी। उस के विधायकों की तादाद अगर आनुपातिक तौर पर घटी तो डेढ़ सौ के आसपास रह जाएगी। ऐसे में समाजवादी पार्टी पौने दो सौ के क़रीब पहुंच जाएगी। कांग्रेस के उत्तर प्रदेष में अभी महज़ दो विधायक हैं, लेकिन बिहार में अगर प्रतिपक्ष की लहर चल पड़ी तो कांग्रेस के लिए उत्तर प्रदेश के आसमान में भी आस के बादल पहले से तो ज़्यादा पानीदार हो ही जाएंगे। बिहार अगर जस-का-तस रहा या भाजपा के लिए अब से भी बेहतर हो गया तो मान कर चलिए कि समाजवादी पार्टी का, जो हो, सो हो, कांग्रेस के लिए तो आगे की राह और दुर्गम हो जाएगी।

उत्तराखंड भी उत्तर प्रदेश का हमराही-सा ही साबित होगा। बिहार में एनडीए की हार से अगले चुनाव में वहां कांग्रेस की सरकार बनने की संभावनाएं ठोस हो जाएंगी। सांगठनिक कुव्यवस्थाओं और कांग्रेसी नेताओं की आपसी तूतूमैंमैं के बावजूद पिछली बार वहां कांग्रेस के 20 विधायक जीत कर आ गए थे तो बिहार में विपक्षी कलगी ऊंची होने पर उस की सीटें दुगनी हो जाना असंभव नहीं है।

पंजाब में भाजपा अभी नहीं के बराबर है। उस के सिर्फ़ दो विधायक हैं। बावजूद इस के कि आम आदमी पार्टी के 93 विधायकों का जन्म तुक्के के गर्भ से हुआ है, भाजपा के लिए पंजाब के आसार बिहार का कोई भी चुनाव परिणाम न तो उजले कर सकता है, न धुंधले। उजले होंगे तो भी उस की सीटें कितनी हो जाएंगी? दो से चार, आठ, बारह? धुंधले होंगे तो दो से नीचे कहां जाना है? हां, बिहार का नतीजा अगर प्रतिपक्ष की तरफ़ गया तो 2027 के पंजाब-चुनाव में कांग्रेस बड़ी भूमिका में आ जाएगी। अभी उस के 16 विधायक हैं। आम आदमी पार्टी से हताशा इस संख्या को सरकार बनाने लायक बहुमत के आसपास भी पहुंचा सकती है।

गुजरात के चुनाव उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड और पंजाब के नतीजे आने के छह महीने बाद होंगे। सो, इन तीनों प्रदेशों के नतीजों का गुजरात पर एकदम सीधा असर पड़ेगा। घनघोर सेंधमारी की सियासत का शिकार होने के बाद वहां कांग्रेस के अब 12 विधायक ही बचे हैं। हो सकता है कि अगले चुनावों से पहले उन्हें भी भाजपा लील जाए। अगर ऐसा हुआ तो भी गुजरात में अकेली कांग्रेस ही इस स्थिति में रहेगी कि भाजपा की अभी की 162 सीटों को अपने कलाजंग दांव से पटकनी दे कर 90 की संख्या से नीचे ला फेंके। आम आदमी पार्टी के बूते की यह बात नहीं है। वह अपनी बेहतर-से-बेहतर स्थिति में भी एक दर्जन सीटों का आंकड़ा पार करने की कूवत, 2027 में तो क्या, 2037 में भी हासिल नहीं कर पाएगी। इसलिए गुजरात में भाजपा का विकल्प, जब बनेगी, कांग्रेस ही बनेगी।

2027 के जुलाई में राष्ट्रपति पद के लिए भी चुनाव होंगे। तब तक बिहार समेत 12 प्रदेशों के नए सियासी समीकरण आकार ले चुके होंगे। प्रादेशिक राजनीतिक संरचनाओं में अगर कोई बड़े उलटफेर हो गए तो वे राष्ट्रपति के चुनाव पर भी असर डाले बिना नहीं रहेंगे। अगर नरेंद्र भाई अगला राष्ट्रपति बनना चाह रहे होंगे तो इस लिहाज़ से भी बिहार से बहने वाली बयार अहम साबित होने वाली है। अगर वे राष्ट्रपति नहीं बनते हैं तो उन्हें अगला प्रधानमंत्री चुनने-न-चुनने के लिए 2029 में होने वाले चुनाव से पहले 2028 में 10 प्रदेशों के विधानसभा चुनाव होंगे और 2029 में मई-जून तक 4 प्रदेशों के। 2029 में कुल 8 प्रदेशों में चुनाव होंगे, मगर उन में से बाकी के 4 अक्टूबर से दिसंबर के बीच चुनावों में जाएंगे। सो, बिहार पर भाजपा और नरेंद्र भाई का नसीब निर्भर है।


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