चिदंबरम के कहें का क्या है अर्थ?

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दशकों तक स्वतंत्र भारत की विदेश नीति विदेशी विचारधारा से बंधी रही है। इसी वजह से भारत को बार-बार उन मुल्कों के आगे भी झुकना पड़ा, जो लंबे समय तक भारतीय हितों के खिलाफ खड़े थे। सालों तक भारत ने फिलिस्तीन और इस्लामी देशों का समर्थन किया, जबकि वह कश्मीर के मसले पर मजहब के नाम पर पाकिस्तान का साथ देते रहे। पिछले 11 वर्षों से भारतीय नेतृत्व इस पराजित मानसिकता से मुक्त है।

पूर्व केंद्रीय मंत्री पी।चिदंबरम के हालिया खुलासे का निहितार्थ क्या है? 17 साल पहले जब वर्ष 2008 में मुंबई पर पाकिस्तान द्वारा प्रायोजित भीषण 26/11 आतंकवादी हमला हुआ, जो चार दिनों तक चला, जिसमें सीमापार से आए दस जिहादियों ने 166 मासूमों को मौत के घाट उतारा और देश का एक बड़ा वर्ग प्रतिशोध की ज्वाला में धधकता रहा— तब तत्कालीन कांग्रेस नीत तत्कालीन संप्रग सरकार (2004-14) विदेशी दबाव— विशेषकर अमेरिकी नेतृत्व के कहने पर पाकिस्तान के खिलाफ प्रतिकार स्वरूप कोई भी सैन्य कार्रवाई करने से पीछे हट गई। बकौल चिदंबरम, “उस वक्त मेरे मन में आया कि बदला लेना चाहिए।।। मैंने प्रधानमंत्री और बाकी अहम लोगों से इस मामले पर चर्चा की थी, लेकिन निष्कर्ष काफी हद तक विदेश मंत्रालाय और विदेश सचिवों से प्रभावित था कि हमें स्थिति पर सीधे प्रतिक्रिया नहीं देनी चाहिए, इसकी जगह कूटनीतिक तरीका अपनाना चाहिए।”

उन्होंने आगे स्वीकार किया, “उस समय अमेरिकी विदेश मंत्री कोंडोलीजा राइस, मेरे पद संभालने के दो-तीन दिन बाद मुझसे और प्रधानमंत्री से मिलने आई थीं।।। उन्होंने कहा था कि प्रतिक्रिया नहीं दें।” मुझे पी।चिदंबरम के बयान पर कोई हैरानी नहीं। दरअसल, यह मानसिकता न ही देश में नई है और न ही चिदंबरम का यह मानस 2008 के आतंकी हमले तक सीमित है।

बात ज्यादा पुरानी नहीं है। अमेरिकी-यूरोपीय प्रतिबंधों के दबाव में 1995 में तत्कालीन प्रधानमंत्री नरसिंह राव ने पोखरण परमाणु परीक्षण रोक दिया था। लेकिन 1998 में अटल बिहारी वाजपेयीजी ने दोबारा सत्ता में आते ही इन पश्चिमी धमकियों को नजरअंदाज करके पोखरण में परीक्षण किया और भारत को परमाणु शक्ति के रूप में स्थापित भी कर दिया। आज जो चिदंबरम 26/11 के समय अमेरिकी दबाव में पाकिस्तान पर कार्रवाई नहीं करने की बात स्वीकार रहे है, उन्हीं चिदंबरम ने 27 मई 1998 को लोकसभा में चर्चा करते हुए पोखरण परमाणु परीक्षण को “सत्ता-लोलुप एजेंडा” और “नैतिक अधिकारों के खिलाफ” बताते हुए कहा था— “।।।हम परमाणु हथियार बनाने के खिलाफ हैं, हम परमाणु बमों का भंडार तैयार करने के खिलाफ हैं, हम इन हथियारों को सेना में शामिल करने के खिलाफ हैं, और हम भारत को हथियारों की दौड़ में झोंकने के भी खिलाफ हैं। आपने जो किया है, उससे हमारे दोनों बड़े पड़ोसी अब दुश्मन बन गए हैं…।” क्या 1998 और 2025 में प्रकट चिदंबरम के मानस में कोई अंतर दिखता है? क्या बकौल चिदंबर 1998 से पहले भारत के पाकिस्तान और चीन से संबंध मधुर थे?

वर्ष 1962 में भारत को वामपंथ शासित चीन के हाथों शर्मनाक शिकस्त झेलनी पड़ी थी, जिसमें देश ने अपनी हजारों वर्ग किलोमीटर जमीन भी खो दी। यह सब नेहरूजी की आत्ममुग्धता में चीन की कुटिल साम्राज्यवादी नियत को न समझ पाने का नतीजा था। पंचशील समझौता, सुरक्षा परिषद की सदस्यता चीन को देना और ‘हिंदी-चीनी भाई-भाई’ जैसे नारे अंत में भारत के लिए बेहद नुकसानदेह साबित हुए। ऊपर से अमेरिका के सामने पं।नेहरू द्वारा बार-बार मिन्नतें करने से देश की संप्रभुता और आत्मसम्मान को भी ठेस पहुंची।

अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआईए के पूर्व अधिकारी ब्रूस रीडेल ने अपनी किताब “जेएफके फॉरगॉटन क्राइसिस: तिब्बत, द सीआईए एंड द सीनो-इंडियन वॉर” में पं।नेहरू द्वारा अमेरिकी राष्ट्रपति जॉन एफ। कैनेडी को लिखे गुप्त खतों के कुछ हिस्से उजागर किए हैं। इन पत्राचारों में नेहरूजी ने लिखा था— “हमें 12 स्क्वाड्रन सुपरसोनिक लड़ाकू विमानों की सख्त जरूरत है।।। हमारे पास आधुनिक राडार व्यवस्था नहीं है, इसलिए जब तक हमारे सैनिक तैयार नहीं हो जाते, तब तक इन विमानों और राडारों का संचालन अमेरिकी वायुसेना को करना होगा।” साफ है कि तब नेहरूजी ने अमेरिका के सामने भारत का स्वाभिमान गिरवी रख दिया था।

इसी तरह वर्ष 1965 के युद्ध में जब भारतीय सेना लाहौर में पहुंच गई थी, तब अगले साल ताशकंद जाकर जो कुछ हमने जीता था, उसे सोवियत संघ (रूस) की मध्यस्थता में लौटा दिया गया। इस फैसले का रणनीतिक औचित्य आज तक साफ नहीं है। क्या इससे पाकिस्तान ने अपना रवैया बदला? नहीं। उल्टा, ताशकंद समझौते के दौरान प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्रीजी की रहस्यमयी मौत ने उस समझौते को और भी संदिग्ध बना दिया। इससे पहले, 1960 में नेहरूजी ने पाकिस्तान के साथ ‘सिंधु जल समझौता’ भी किया था, जो हमारे राष्ट्रीय हितों के खिलाफ था।

निसंदेह, वर्ष 1971 के युद्ध में भारत ने ऐतिहासिक फतह हासिल की और पाकिस्तान के दो टुकड़े कर दिए। तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के नेतृत्व में भारतीय सेना ने पाकिस्तान को घुटनों पर लाकर उसके 93,000 फौजियों को आत्मसमर्पण करने के लिए मजबूर कर दिया था। परंतु शिमला संधि के तहत इंदिरा सरकार ने पाकिस्तान द्वारा कब्जाए कश्मीर के एक हिस्से (पीओके) पर कोई अंतिम निर्णय लिए बिना पाकिस्तानी युद्धबंदियों को रिहा कर दिया। युद्ध के दौरान इंदिराजी ने तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन को खत लिखकर पाकिस्तान की जंगबाज़ी रोकने की गुजारिश भी की थी।

यह अक्टूबर का माह है। 1947 में इसी महीने की 22 तारीख को अर्थात् स्वतंत्रता के लगभग दो माह पश्चात पाकिस्तान ने कबाइलियों के साथ मिलकर कश्मीर पर हमला कर दिया था। तब जम्मू-कश्मीर रियासत का अधिकांश मुस्लिम सैन्यबल इस्लाम के नाम पर शत्रुओं से जा मिला था। भारत में विलय की औपचारिकता पूरी होने के बाद जब भारतीय सेना ने मोर्चा संभाला और वह कश्मीर को अपने नियंत्रण में लेने लगी, तब पूरे कश्मीर को पाकिस्तानियों से मुक्त कराए बिना पं।नेहरू ने युद्धविराम और जनमत संग्रह की घोषणा कर दी। यदि यह तीन हिमालयी भूलें (गद्दारी सहित) नहीं हुई होती, तो आज कश्मीर की स्थिति कुछ और होती।

वास्तव में, दशकों तक स्वतंत्र भारत की विदेश नीति विदेशी विचारधारा से बंधी रही है। इसी वजह से भारत को बार-बार उन मुल्कों के आगे भी झुकना पड़ा, जो लंबे समय तक भारतीय हितों के खिलाफ खड़े थे। सालों तक भारत ने फिलिस्तीन और इस्लामी देशों का समर्थन किया, जबकि वह कश्मीर के मसले पर मजहब के नाम पर पाकिस्तान का साथ देते रहे। पिछले 11 वर्षों से भारतीय नेतृत्व इस पराजित मानसिकता से मुक्त है। सतत आर्थिक तरक्की के बीच भारतीय सेना अब किसी भी दुस्साहस का मुंहतोड़ उत्तर देने को स्वतंत्र है। सर्जिकल स्ट्राइक, सिंधु समझौते का स्थगन और ‘ऑपरेशन सिंदूर’— इसका प्रत्यक्ष प्रमाण हैं।


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