कही दिल्ली पेयजल की प्यासी न हो जाए!

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गौरतलब है कि अकबर की राजधानी फतेहपुर सीकरी पानी के अभाव के कारण मात्र 15 सालों में ही उजड़ गई थी।… दिल्ली का संकट केवल एक चेतावनी है। आने वाले वर्षों में संकट और बढ़ेगा।  विशेषज्ञों के मुताबिक़, यदि ठोस कदम नहीं उठाए गए तो 2030 तक देश के आधे बड़े शहर जल-विहीनक्षेत्रों की श्रेणी में आ सकते हैं। इसलिए अब समय है कि सरकार और समाज दोनों मिलकर दीर्घकालिक रणनीति अपनाएँ।

इस वर्ष देश भर में हुई भारी बारिश और जल प्रलय के बावजूद भारत के शहरी क्षेत्रों में जल संकट है। पेयजल संकट आशंका नहीं, बल्कि एक कठोर सच्चाई है। दिल्ली, मुंबई, चेन्नई, बेंगलुरु जैसे महानगर, जो आर्थिक प्रगति और आधुनिक जीवनशैली के प्रतीक हैं, अब जल प्रबंधन की विफलता के गंभीर परिणाम झेल रहे हैं। हाल ही में दिल्ली के वसंत कुंज क्षेत्र में तीन बड़े मॉल और आसपास की सप्लाई के पूरी तरह ठप हो जाने से यह संकट फिर सुर्ख़ियों में आया।

इन प्रतिष्ठानों को बंद करने की नौबत इसलिए आ गई है क्योंकि टैंकरों से इनकी जल आपूर्ति रुक गई, जबकि भूजल दोहन (ग्राउंड वॉटर बोरिंग) पर पहले से ही एनजीटी ने प्रतिबंध लगा रखा है। यह स्थिति केवल अस्थायी तकनीकी समस्या नहीं, बल्कि एक गहरे प्रशासनिक और नैतिक संकट की ओर संकेत करती है। पिछले सात दशकों में खरबों रुपया जल प्रबंधन पर खर्च किए जाने के बावजूद ऐसा है तो आखिर क्यों??

दिल्ली महानगर की जनसंख्या 2 करोड़ से अधिक है। इससे  जल आपूर्ति की व्यवस्था लंबे समय से दबाव में है। दिल्ली जल बोर्ड के आंकड़ों के अनुसार, शहर में प्रतिदिन करीब 1,000 मिलियन गैलन पानी की मांग है, जबकि उपलब्धता मुश्किल से 850 मिलियन गैलन तक पहुँच पाती है। वसंत कुंज जैसे पॉश इलाकों में भी पिछले कुछ वर्षों से पानी की टंकियों और निजी टैंकरों पर निर्भरता बढ़ी है। परंतु इस बार स्थिति पहले से कहीं अधिक भयावह हो गई क्योंकि प्रशासन ने सुरक्षा और ट्रैफिक कारणों से टैंकरों की आवाजाही पर रोक लगा दी। इस निर्णय का सबसे बड़ा असर व्यापारिक केंद्रों जैसे मॉल्स, रेस्तरां और दुकानों पर पड़ा है।

इन मॉल्स में हज़ारों कर्मचारी काम करते हैं और प्रतिदिन लाखों ग्राहक आते हैं; बिना पानी के ऐसी व्यवस्था एक दिन भी नहीं चल सकती। शौचालय, सफाई, भोजनालय, अग्निशमन प्रणाली, सब कुछ जल आपूर्ति पर निर्भर हैं। जब टैंकरों की आपूर्ति रुकी, तो केवल व्यापार ही नहीं, आसपास के आवासीय समाज भी संकट में पड़ गए।

दिल्ली सरकार ने कुछ वर्ष पहले भूजल दोहन पर सख्त प्रतिबंध लगाया था। उद्देश्य यह था कि गिरते जलस्तर को रोका जाए। यह पहल पर्यावरणीय दृष्टि से आवश्यक था, क्योंकि लगातार बढ़ते दोहन ने दिल्ली के अधिकांश क्षेत्रों में भूजल को 300 फीट से भी अधिक नीचे पहुँचा दिया था। लेकिन सवाल यह है कि क्या पहले वैकल्पिक व्यवस्था पर्याप्त रूप से विकसित की गई?

जब सरकार ने ग्राउंड वॉटर बोरिंग को गैरकानूनी घोषित किया, तब उसके समानांतर रूप में मजबूत टैंकर नेटवर्क, पुनर्चक्रण संयंत्र और रेन वॉटर हार्वेस्टिंग सिस्टम विकसित करने चाहिए थे। दुर्भाग्यवश, नीतियाँ बनीं पर उनका कार्यान्वयन अधूरा रह गया। परिणामस्वरूप, लोग न तो कानूनी तरीके से पानी निकाल सकते हैं, न सरकारी वितरण पर भरोसा कर सकते हैं। सोचने वाली बात यह है कि यदि जाड़ों में यह हाल है तो गर्मियों में क्या होगा?

दिल्ली ही नहीं, बल्कि पूरे देश में पानी की आपूर्ति से जुड़ा टैंकर कारोबार वर्षों से विवादों में रहा है। कई जगह यह सार्वजनिक सेवा से अधिक निजी व्यवसाय बन चुका है। अधिकारियों और टैंकर ठेकेदारों के बीच मिलीभगत के आरोप नए नहीं हैं। दिल्ली में जल आपूर्ति में आई यह हालिया बाधा भी ऐसे ही भ्रष्टाचार की परतें उजागर करती प्रतीत होती है।

त्योहारों के मौसम में जब पानी की मांग बढ़ जाती है, घरों में सजावट, साफ-सफाई और उत्सव आयोजन अधिक होते हैं। ऐसे समय पर टैंकरों की आवाजाही पर प्रतिबंध या ‘तकनीकी समस्या’ का बहाना बना देना संदेह उत्पन्न करता है। कई स्थानीय निवासियों का कहना है कि कुछ जल एजेंसियों ने टैंकरों की उपलब्धता को कृत्रिम रूप से सीमित कर कीमतें बढ़ाने की कोशिश की है। इससे न केवल आम नागरिकों पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ पड़ा, बल्कि मॉल्स और व्यापारिक प्रतिष्ठानों को बंद करने की स्थिति आ गई। अगर यह सही हैं, तो यह सिर्फ प्रशासनिक लापरवाही नहीं, बल्कि नैतिक दिवालियापन का उदाहरण है। जल जैसी बुनियादी संपदा के साथ ऐसा बर्ताव किसी नागरिक समाज में अक्षम्य अपराध है।

भारत में जल नीति के कई स्तर हैं। केंद्र सरकार, राज्य सरकारें और नगरपालिका निकाय सभी अपने ढंग से  मनमानी में काम करते हैष राष्ट्रीय जल नीति (2012) कहती है कि हर नागरिक को पर्याप्त और गुणवत्तापूर्ण पेयजल मिलेगा, पर छोटे शहरों को तो छोड़ें, दिल्ली जैसे शहरों में भी वास्तविकता इसके उलट है। नगरपालिकाएँ रेन वॉटर हार्वेस्टिंग की अनिवार्यता घोषित करती हैं, पर अधिकांश इमारतों में यह प्रणाली केवल कागज़ों पर मौजूद है। जल पुनर्चक्रण संयंत्रों की क्षमता भी इस संकट का सामना करने के लिए अपर्याप्त है। यमुना का प्रदूषण भी दिल्ली की जल आपूर्ति पर सीधा असर डालता है। यदि यमुना से शुद्ध जल नहीं मिलेगा, तो शहर को बाहरी स्रोतों पर निर्भर रहना पड़ेगा, जिससे राजनीतिक टकराव बनते हैं।

हालाँकि नीति-निर्माण और कार्यान्वयन की बड़ी जिम्मेदारी सरकार पर है, पर नागरिक भी निर्दोष नहीं हैं। शहरी समाज में जल का अनावश्यक उपयोग आम बात है। बागवानी में अत्यधिक पानी, कार धोने में व्यर्थ बहाव, और रिसाव की अनदेखी। स्वच्छ भारत मिशन या हर घर जल जैसे अभियान  व्यक्तिगत और सामुदायिक स्तर पर अपनाए जा सकते हैं। मॉल्स और हाउसिंग सोसाइटीज़ में यह व्यवस्था अनिवार्य की जानी चाहिए, ताकि टैंकरों पर निर्भरता घटे।

दिल्ली का वर्तमान संकट केवल एक चेतावनी है। आने वाले वर्षों में संकट और बढ़ेगा।  विशेषज्ञों के मुताबिक़, यदि ठोस कदम नहीं उठाए गए तो 2030 तक देश के आधे बड़े शहर ‘जल-विहीन’ क्षेत्रों की श्रेणी में आ सकते हैं। इसलिए अब समय है कि सरकार और समाज दोनों मिलकर दीर्घकालिक रणनीति अपनाएँ। गौरतलब है कि अकबर की राजधानी फतेहपुर सीकरी पानी के अभाव के कारण मात्र 15 सालों में ही उजड़ गई थी। महानगरों में वर्षा जल संग्रहण प्रणाली को सख्ती से लागू करना जरूरी है। जल पुनर्चक्रण संयंत्रों की संख्या और क्षमता बढ़ाना भी। टैंकर संचालन को पारदर्शी और जीपीएस-नियंत्रित बनाना आवश्यक है ताकि रिश्वतखोरी पर रोक लगे। यमुना जैसी नदियों की सफाई और उसके पुनर्जीवन को प्राथमिकता देनी चाहिए। पानी की बर्बादी रोकने के लिए सख्त कानून और जनजागरूकता अभियान भी चाहिए। इन कदमों के साथ-साथ यह भी सुनिश्चित करना होगा कि जल प्रबंधन केवल संकट आने पर चर्चा का विषय न बने, बल्कि शहरी नियोजन की मूल नीति का हिस्सा हो।

दिल्ली पर आया जल संकट याद दिलाता है कि पानी केवल संसाधन नहीं, बल्कि जीवन का आधार है। जब हम इसे समझने में चूक करते हैं, तो सभ्यता के अस्तित्व पर भी प्रश्नचिह्न लग जाता है। यदि सरकार और नागरिक समाज अब भी इस संकट को गंभीरता से नहीं लेंगे, तो ‘जल युद्ध’ भविष्य का नहीं, वर्तमान का शब्द बनेगा।  जलसंकट का समाधान केवल योजनाओं से नहीं, ईमानदार नीयत और सामूहिक प्रयासों से ही संभव है।


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