झकझोरती है ’होमबाउंड’

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नीरज घेवन की होमबाउन्ड‘, लंबे अर्से बाद कोई ऐसी रियलिस्ट फ़िल्म आई है, जिसने दर्शकों को झकझोर कर रख दिया है। सिनेमा ख़त्म होने के बाद भी इसका गहरा असर दर्शकों के दिलों दिमाग पर रहता है। पूरी फ़िल्म में कथार्सिस के ऐसे ढेर सारे मोमेंट्स हैं जो दर्शकों को उनके की फ़र्क़ पैंदाकी जीवन शैली से बाहर निकाल कर गहन विचार विमर्श करने के लिए प्रेरित करते हैं। नज़दीकी सिनेमाघर में है। देख लीजिएगा।  

सिने-सोहबत

अख़बार में छपे शब्दों का जादू किसी भी रुप में अपना असर दिखा सकता है। आज के ‘सिने-सोहबत’ में एक ऐसी फ़िल्म, ‘होमबाउंड’ की समीक्षा और उससे उठे विचारों को टटोलते हैं, जिसकी शुरुआत 2020 में ‘द न्यूयॉर्क टाइम्स’ में ‘बशारत पीर’ के एक लेख ‘टेकिंग अमृत होम’ से होती है। यह फिल्म भारत में जातिगत रूढ़ियों के चलते दो दोस्तों के संघर्ष को बख़ूबी दिखाती है। ‘होमबाउंड’ दो दोस्तों की कहानी है जो अपने सपनों को पूरा करने के लिए जातिगत भेदभाव के खिलाफ संघर्ष करते हैं। यह कहानी कोविड-19 लॉकडाउन के दौरान प्रवासी पलायन को भी छूती है। निर्देशक हैं नीरज घेवन, जिनकी पहली फ़िल्म ‘मसान’ ने भी काफ़ी प्रशंसा बटोरी थी। मुख्य कलाकार हैं ईशान खट्टर, जाह्नवी कपूर और विशाल जेठवा।

‘होमबाउंड’ का प्रीमियर कान फिल्म फेस्टिवल 2025 में हुआ, जहां इसके लिए नौ मिनट का स्टैंडिंग ओवेशन मिला। उसके बाद टोरंटो में हुए ‘टीआईएफएफ 2025’ में, इसे ‘इंटरनेशनल पीपल्स चॉइस अवार्ड’ के लिए दूसरा रनर अप घोषित किया गया और एक बार फिर इसे स्टैंडिंग ओवेशन मिला था और अब सिनेमा के सबसे प्रतिष्ठित अवार्ड ऑस्कर 2026 में भारत की तरफ से होमबाउंड की ऑफिशियल एंट्री हो चुकी है।

अब तक अगर हम ऑस्कर में भारतीय सिनेमा का इतिहास देखें तो 57 भारतीय फिल्में इस प्रतिष्ठित अवॉर्ड के लिए जा चुकी हैं वहीं सिर्फ तीन फिल्में ही ऐसी हैं, जो टॉप पांच तक पहुंच पाई हैं। इन फिल्मों में ‘मदर इंडिया’, ‘सलाम बॉम्बे’ और ‘लगान’ जैसी फिल्में हैं। ‘लगान’ आखिरी फिल्म थी जिसे सर्वश्रेष्ठ पांच फिल्मों में जगह मिली थी।

‘होमबाउंड’ की कहानी की बात करें तो मापुर नामक सुदूर गांव में जातिवाद और भेदभाव की त्रासदी से त्रस्‍त चंदन कुमार और मोहम्मद शोएब पुलिस भर्ती की परीक्षा के लिए रेलवे स्‍टेशन आते हैं। वहीं उनकी मुलाकात सुधा भारती (जाह्नवी कपूर) से होती है। अंबेडकरवादी सुधा अपनी गरिमा के लिए लड़ने के साथ अपने पूरे समुदाय को ऊपर उठाना चाहती हैं। उसका मानना है कि समाज में सम्मान पाने के लिए शिक्षा ही इसका एकमात्र रास्ता है। वहीं शोएब और चंदन को पुलिस में भर्ती होना सम्‍मान और समानता प्राप्ति के अवसर जैसा लगता है। प्रदेश पुलिस में कांस्टेबल की परीक्षा में चंदन पास हो जाता है, लेकिन शोएब नहीं। इसका असर उनकी दोस्‍ती पर भी पड़ता है। उसमें दरार आती है। फिर पता चलता है कि भर्ती परीक्षा के परिणाम पर रोक लग गई है। इस बीच सुधा और चंदन की नजदीकियां बढ़ती है और हालात मोड़ लेते हैं।

पारिवारिक और आर्थिक वजहों से दोनों सूरत में कपड़े की मिल में नौकरी करने जाते हैं। फिर कोरोना का प्रकोप आता है। लॉकडाउन’ लग जाता है। दोनों के लिए घर से दूर जीविकोपार्जन करना कठिन हो जाता है। सामाजिक उत्पीड़न, सांप्रदायिक घृणा और गरीबी के भारी बोझ को पार करते हुए क्‍या दोनों घर लौट पाएंगे? पूरी कहानी देखने के लिए फ़िल्म देखनी पड़ेगी।

‘होमबाउंड’ की कहानी का मर्म शुरुआत में ही इसके नायक शोएब (ईशान खट्टर) और दलित चंदन (विशाल जेठवा) के बीच की वार्ता है, “बदन पर वर्दी दिखती है न तो सीने पर लिखा नाम नहीं पढ़ता कोई। एक बार हम सिपाही बन गए न तो ।।किसी के बाप में हिम्‍मत नहीं होगी हमें गरियाने की”। दरअसल, ये सिर्फ़ एक संवाद नहीं है। ये प्रतिबिम्ब है हमारे समाज के उस हिस्से का जहां की कहानी ये फ़िल्म बयान करती है।

‘मसान’ की रिलीज के करीब एक दशक बाद नीरज घेवन ने किसी फीचर फिल्‍म का निर्देशन किया है। नीरज और सुमित राय द्वारा लिखित ये कहानी जातिवाद, सामाजिक, धार्मिक भेदभाव का बारीकी से चित्रण करती है। नीरज ने इतने संवेदनशील विषय को बेहद ईमानदारी के साथ गढ़ा है। वह शुरुआत में ही अपने पात्रों के दर्द और छटपटाहट को बयां करते हैं। फिर आहिस्‍ता से उनकी दुनिया में ले जाते हैं।

सिनेमेटोग्राफर प्रतीक शाह का कैमरा पात्रों की जिंदगी को गहराई से दिखाने में मदद करता है। उसमें चंदन की मां को विरासत में मिली फटी और नुकीली एड़ियां हों या बहन को शिक्षा से वंचित रखना ताकि चंदन पढ़ाई कर सके या शोएब से एचआर मैनेजर का यह कहना कि वो उसकी बोतल न भरे जैसे दृश्‍य झकझोर देते हैं। वहीं नीरज घेवन, वरूण ग्रोवर और श्रीधर दुबे के लिखे संवाद उसे ठोस आधार देते हैं।

फिल्‍म दोस्‍ती के साथ उसके मायने भी दिखा जाती है। घर वापसी की कोशिश के समय शोएब पर पुलिस की बर्बरता के बीच चंदन का खुद का नाम बदलकर बताना जैसे दृश्‍य दोस्‍ती की मिसाल दिखाते हैं। वहीं ईद पर शोएब के घर में दोनों परिवारों का साथ में बिरयानी खाने का दृश्‍य सांस्‍कृतिक साझापन की झलक देते हैं।

फिल्‍म कोरोना काल में प्रवासी मजदूरों की मजबूरियों, आर्थिक दिक्‍कतों के साथ घर वापसी की राह में आने वाले सामाजिक और धार्मिक अड़चनों का भी बारीकी से विश्लेषण करती हैं। फिल्‍म में कई ऐसे पल आते हैं जो दर्शकों को सोचने पर मजबूर करते हैं, ह्रदय द्रवित हो जाता है।

भावनाओं के ज्‍वार में बहाने की नीरज की सोच को आकार देने में दोनों प्रमुख कलाकारों ईशान खट्टर और विशाल जेठवा का योगदान  क़ाबिल ए ग़ौर रहा। दोनों ने अपने किरदारों की मनःस्थिति, द्वंद्व, और संघर्ष को पूरी शिद्दत से जीया है। वह हर दृश्‍य में अपने अभिनय से प्रभाव छोड़ते हैं। जाह्नवी कपूर भी सीमित स्‍क्रीनटाइम में अपना प्रभाव छोड़ती हैं। सहयोगी कलाकारों की भूमिका में आए पात्र भी अपनी छाप छोड़ जाते हैं, ख़ासकर चंदन की मां की भूमिका में शालिनी वत्स का काम अद्भुत रहा है। शालिनी को इससे पहले नेलफ्लिक्स पर ‘सेक्रेड गेम्स’ और कई फिल्मों में देखा जा चूका है जिनमें ‘लूडो’ और ‘पीपली लाइव’ प्रमुख हैं।

नीरज घेवन की ‘होमबाउन्ड’, लंबे अर्से बाद कोई ऐसी रियलिस्ट फ़िल्म आई है, जिसने दर्शकों को झकझोर कर रख दिया है। सिनेमा ख़त्म होने के बाद भी इसका गहरा असर दर्शकों के दिलों दिमाग पर रहता है। पूरी फ़िल्म में कथार्सिस के ऐसे ढेर सारे मोमेंट्स हैं जो दर्शकों को उनके ‘की फ़र्क़ पैंदा’ की जीवन शैली से बाहर निकाल कर गहन विचार विमर्श करने के लिए प्रेरित करते हैं। नज़दीकी सिनेमाघर में है। देख लीजिएगा।  (पंकज दुबे पॉप कल्चर स्टोरीटेलर, उपन्यासकार और चर्चित शो, ‘स्मॉल टाउन्स बिग स्टोरीज़’ के होस्ट हैं।)


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