यूपीए दो की तरह एनडीए तीन!

Categorized as अजित द्विवेदी कालम

इन दिनों सबसे ज्यादा चर्चा में यह जुमला सुनने को मिल रहा है और हैरानी की बात है कि राइटविंग इकोसिस्टम के लोगों से मुंह से सुनने को मिल रहा है। वे कह रहे हैं कि एनडीए तीन यानी नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में बनी तीसरी सरकार की हालत यूपीए दो की तरह होती जा रही है। ध्यान रहे यूपीए दो का मतलब मनमोहन सिंह की 2009 में बनी दूसरी सरकार थी। दोनों में कंट्रास्ट यह है कि मनमोहन सिंह की सरकार पहली बार कांग्रेस के 145 सांसदों के साथ बनी थी लेकिन दूसरी सरकार 206 सांसदों के साथ बनी थी। दूसरी ओर नरेंद्र मोदी की पहली दो सरकारें पूर्ण बहुमत की थी लेकिन तीसरी सरकार 240 सांसदों की है, अल्पमत की है।

बहरहाल, यूपीए की दूसरी सरकार के कार्यकाल में ही सारे विवाद हुए। सारे घोटालों की खबरें उसी कार्यकाल में आईं, भले उनके घटित होने का वर्ष पहले का हो। मनमोहन सिंह के दूसरे कार्यकाल में सरकार की इतनी बदनामी हुई कि उसके बाद के चुनाव में कांग्रेस को इतिहास में सबसे कम लोकसभा सीटें मिलीं। उसके बाद से कांग्रेस आज तक खड़ी नहीं हो पाई है।

एनडीए तीन की तुलना यूपीए दो से सिर्फ इस आधार पर नहीं हो रही है कि उस समय भी बहुत विवाद हुए थे और अब भी बहुत विवाद हो रहे हैं। यह तुलना इसलिए हो रही है क्योंकि यूपीए दो में सरकार उन बातों के लिए निशाने पर आई थी, जो पहले उसकी ताकत मानी जाती थी। मनमोहन सिंह के प्रधानमंत्री बनने से कांग्रेस के ऊपर लगने वाले वंशवाद के आरोप कमजोर हुए थे और उनकी ईमानदार छवि की वजह से सरकार की इमेज को बड़ा फायदा हुआ था। तीसरी बात यह है कि पहले कार्यकाल का समापन अमेरिका के साथ परमाणु संधि से हुई थी, जिसकी वजह से पूरी दुनिया में भारत का अछूतपन खत्म हुआ था।

इससे मध्यवर्ग का रूझान कांग्रेस की ओर बना था। लेकिन 2009 में चुनाव जीतने के बाद सरकार वंशवाद से लेकर भ्रष्टाचार सबके आरोप में घिरी और उसने मध्य वर्ग को नाराज करने वाले फैसले किए।

याद करें कैसे 2009 की सरकार में राहुल गांधी ने चुन चुन कर बड़े नेताओं के बेटों को मंत्री बनवाया। हालांकि बाद में उनमें से ज्यादातर उनकी पार्टी छोड़ कर चले गए। कांग्रेस की सरकार ने जनादेश की गलत व्याख्या की और मध्य वर्ग को छोड़ कर पिछड़े, दलित, अल्पसंख्यक को केंद्र में रख कर नीतियां बनानी शुरू कीं। इसमें किसी को आपत्ति नहीं हो सकती है लेकिन इसके साथ ही मध्य वर्ग की आकांक्षाओं का ध्यान रखा जाना चाहिए था, जो नहीं सरकार ने नहीं रखा। उसके बाद संचार घोटाले से भ्रष्टाचार की जो कहानी शुरू हुई वह ए टू जेड घोटाले में बदल गई। संचार घोटाला, कोयला घोटाला, कॉमनवेल्थ घोटाला, आदर्श घोटाला, एयरसेल मैक्सिस घोटाले आदि आदि। इसके बाद अंत में ताबूत में आखिरी कील के रूप में दिल्ली का निर्भया कांड हुआ। इन सबसे अन्ना हजारे, अरविंद केजरीवाल, बाबा रामदेव आदि को मौका मिला सरकार के खिलाफ माहौल बनाने का।

बिल्कुल इसी रूप में तो नहीं लेकिन वह कहानी फिर दोहराई जाती दिख रही है। सरकार जाने अनजाने में हुई गलतियों और प्रयोगों के कारण विवादों में घिर रही है। ऐसा लग रह है कि एनडीए तीन की सरकार ने अपने सबसे प्रतिबद्ध वोट आधार और वैचारिक मुद्दों की अनदेखी शुरू कर दी है या उनको छोड़ कर दूसरे प्रयोगों पर ज्यादा ध्यान देना शुरू कर दिया है। एनडीए की मौजूदा सरकार की सबसे बड़ी ताकत हिंदुत्व व राष्ट्रवाद का नैरेटिव है। अगर वोट की बात करें तो मध्य वर्ग और अगड़ी जातियों का समर्थन उसके लिए वोट मोबिइलाज करने और नैरेटिव बनाने वाली सबसे बड़ी शक्ति है। इन चारों मुद्दों पर कुछ न कुछ ऐसा हुआ है, जिससे सरकार कठघरे में आई है। हिंदुत्व का मुद्दा शंकराचार्य के साथ बरताव के कारण प्रभावित हुआ है तो राष्ट्रवाद का मुद्दा पूर्व सेना प्रमुख जनरल एमएम नरवणे की अभी तक नहीं छपी किताब ‘फोर स्टार्स ऑफ डेस्टिनी’ का अंश संसद में पढ़े जाने और सरकार द्वारा उसे रोकने की घटना से प्रभावित हुआ है। बजट के बाद मध्य वर्ग के बारे पूछे जाने पर जैसा मुंह वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने बनाया और यूजीसी के नियमों ने सवर्णों को जैसे नाराज किया वह भाजपा के लिए चिंता की बात है।

भाजपा ने बहुत पहले, जब वह सत्ता में आने से बहुत दूर थी, तभी राष्ट्रवाद के मुद्दे पर अपना एकाधिकार रख दिया था। सेना से रिटायर होने वाले लोग आमतौर पर भाजपा के साथ जुड़ते थे। चाहे जम्मू कश्मीर का मुद्दा हो या घुसपैठ का मसला हो, उन पर भाजपा लड़ती थी। सेना के शौर्य को भाजपा हमेशा आगे रखती थी। सरकार बनने के बाद से नरेंद्र मोदी की सरकार का सबसे खास जुमला यह रहा था कि सेना को साफ निर्देश है कि ‘गोलियां नहीं गिननी है’, ‘अगर उधर से गोली चले तो गोला दागना है’ आदि, आदि। लेकिन जनरल नरवणे की किताब बताती है कि चीन के साथ गलवान घाटी जैसी घटना के बाद भी सेना को यह निर्देश था कि चीन के ऊपर गोलियां नहीं चलानी हैं। और जब 30 अगस्त 2020 की रात को चीन की सेना भारतीय सैनिकों की ओर बढ़ रही थी तो तत्कालीन सेना प्रमुख कई घंटों तक राजनीतिक निर्देश के लिए फोन करते रहे थे। अंत में उनको कह दिया गया कि ‘जो उचित समझो वह करो’। इससे राजनीतिक नेतृत्व की कमजोरी जाहिर होती है और राष्ट्रवाद, सेना को लेकर बनाया गया नैरेटिव भी बिगड़ता है।

इसी तरह माघ मेले में ज्योतिषपीठ के शंकराचार्य के साथ जिस तरह की घटना हुई उसने भाजपा के सवर्ण मतदाताओं को नाराज किया। शंकराचार्य को गंगा स्नान से रोकना, उनकी पालकी रोकना और उनका छत्र टूटना एक पहलू है तो संस्कृत पढ़ने वाले वेद पाठी बटुकों की शिखा पकड़ कर उनके साथ मारपीट का मामला दूसरा पहलू है। इस मामले की गूंज भले अभी बहुत नहीं सुनाई दे रही है, लेकिन अगड़ी जातियों खास कर ब्राह्मण और उनकी उपजातियों के लोगों के मनोविज्ञान पर इसका बड़ा असर हुआ है। वे लोग भाजपा को हिंदू धर्म का रक्षक मानते थे लेकिन जब हिंदू धर्म के सबसे बड़े प्रतीक पर भाजपा की सरकार की ओर से हमला हुआ और सारे बड़े नेता चुप रहे तो एक बड़े समाज को आहत करने वाला था।

जिस समय यह घटना हुई लगभग उसी समय यूजीसी ने उच्च शिक्षण संस्थानों में कथित तौर पर समानता लाने के लिए एक दिशा निर्देश जारी किया। यह समानता लाने की बजाय भेदभाव बढ़ाने वाला प्रस्ताव था, जिस पर सुप्रीम कोर्ट ने रोक लगा दी है। लेकिन इससे भाजपा के कोर समर्थकों का मोहभंग हुआ है। हालांकि कांग्रेस भी उनको नहीं पूछ रही है इसलिए हो सकता है कि वे अब भी बाई डिफॉल्ट भाजपा के साथ रहें लेकिन पहले जैसा समर्पण नहीं होगा। ध्यान रहे भाजपा और केंद्र सरकार के लिए नैरेटिव बनाने का काम यही वर्ग करता है। अगर मध्य वर्ग का एक बड़ा हिस्सा सरकार की योजना से अपने बाहर पाता है और उसको लगता है कि कांग्रेस और प्रादेशिक पार्टियों की तरह भाजपा भी बहुजन राजनीति साधने के लिए उसको अलग थलग कर रही है तो वह अपनी पोजिशनिंग करेगा। धारणा और वोट दोनों के स्तर पर भाजपा को इसका नुकसान हो सकता है।


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