अमेरिका से समझौता क्या जीत है?

Categorized as अजित द्विवेदी कालम

अमेरिका के साथ व्यापार संधि पर अभी दस्तखत नहीं हुए हैं। इसकी सिर्फ राजनीतिक घोषणा हुई है। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने संधि का ऐलान किया, जिसकी पुष्टि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने की। उसके बाद अमेरिका के व्यापार प्रतिनिधि जैमिसन ग्रियर और कृषि मंत्री ब्रुक रॉलिंस ने संधि की कुछ बारीकियों की जानतारी दी, जिसे लेकर भारत में विरोध शुरू हो गया। इसके बाद वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल ने सामने आकर सफाई दी। उन्होंने कहा कि कृषि और डेयरी सेक्टर के हितों से समझौता नहीं किया गया है। क्या समझौता हुआ है यह मसौदा दस्तावेज सामने आने के बाद ही पता चलेगा। परंतु वाणिज्य मंत्री ने सफाई देने के क्रम में जो बातें कहीं उसमें कम से कम एक बात बेहद आपत्तिजनक थी। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री मोदी ने राष्ट्रपति ट्रंप के साथ अपनी दोस्ती का फायदा उठा कर भारत के लिए फायदेमंद डील करा दी।

यह प्रधानमंत्री मोदी को भारत से बड़ा दिखाने की बहुत बेमतलब कोशिश है। किसी ने उनसे पूछा नहीं कि राष्ट्रपति ट्रंप से मोदी की कब की दोस्ती है? क्या दोनों साथ पढ़े हैं? क्या मोदी के भारत का प्रधानमंत्री बनने के पहले से गैर राजनीतिक रूप से ट्रंप से उनकी दोस्ती थी? ध्यान रहे ट्रंप मोदी को भारत के प्रधानमंत्री के नाते ही जानते हैं और संधि मोदी व ट्रंप की नहीं हुई है, बल्कि अमेरिका और भारत की हुई है। यह भारत की और 140 करोड़ लोगों के बाजार की ताकत है कि अमेरिका या दूसरे देश भारत से संधि कर रहे हैं। ट्रंप से मोदी की दोस्ती है इसलिए भारत की संधि हुई है यह कहना भारत का और इसके 140 करोड़ लोगों का अपमान है।

बहरहाल, संधि की बारीकियां पता नहीं हैं, इसलिए बड़े बिंदुओं पर ही चर्चा हो सकती है। सबसे बड़ा बिंदु टैरिफ कम होने का है। कहा जा रहा है कि ट्रंप ने भारत के ऊपर लगाए गए 50 फीसदी टैरिफ को घटा कर 18 फीसदी कर दिया है। पहले इस टैरिफ को समझें। ट्रंप ने पिछले साल जैसे को तैसा टैरिफ के नाम पर भारत के ऊपर 25 फीसदी टैरिफ लगाया और उसके बाद रूस से तेल खरीदने की सजा देने के लिए 25 फीसदी का जुर्माना लगाया। सोचें, तब ट्रंप ने मोदी के साथ कथित दोस्ती का मान नहीं रखा। इसके बाद ट्रंप ने रूस की दो कंपनियों पर पाबंदी लगाई और सेकेंडरी पाबंदी की भी घोषणा की, जिसके बाद भारत ने रूस से तेल खरीदना कम कर दिया।  इसके बाद ही अमेरिका के वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट ने कहा था कि अब भारत पर से 25 फीसदी टैरिफ हटाया जा सकता है।

दिलचस्प बात यह है कि इसके बाद राष्ट्रपति ट्रंप ने ऐलान किया कि भारत अब रूस से तेल नहीं खरीदेगा, बल्कि वेनेजुएला से खरीदेगा। वैसे भी भारत ने अमेरिका से तेल और गैस की खरीद बढ़ा दी है। इस वजह से 25 फीसदी टैरिफ हटा दिया गया। सोचें, पहले भारत कहता था कि वह अपनी ऊर्जा जरुरतों के मुताबिक जिससे चाहे उससे तेल खरीद सकता है। लेकिन अब अमेरिकी दबाव या पाबंदी की वजह से रूस से कम तेल खरीदेगा और पाबंदियों के कारण ईरान से तेल खरीद बंद है। इसका मतलब है कि खाड़ी के दूसरे देशों पर और वेनेजुएला व अमेरिका पर निर्भरता बढ़ेगी।

जुर्माने वाला टैरिफ हटाने के बाद बाद अमेरिका ने रेसिप्रोकल यानी जैसे को तैसा वाला जो 25 फीसदी टैरिफ लगाया था उसे घटा कर 18 फीसदी कर दिया। भारत इसी का जश्न मना रहा है। सोचें, एक ऐसा टैक्स कम किया गया है, जिसका आठ महीने पहले तक अस्तित्व ही नहीं था। जुलाई 2025 से पहले भारत के सामानों पर अमेरिका में औसतन तीन फीसदी टैरिफ लगता था। अब औसत टैरिफ 18 फीसदी लगेगा यानी आठ महीने पहले जितना टैरिफ था उससे छह गुना ज्यादा! बताया जा रहा है कि अभी भारत जो निर्यात करता है उसमें से 40 अरब डॉलर मूल्य के वस्तुओं पर जीरो टैरिफ लगेगा और बाकी 30 अरब डॉलर पर टैरिफ लगेगा। दूसरी ओर भारत में अमेरिकी सामानों पर बहुत भारी भरकम टैरिफ लगता है, जिसमें भारत बड़ी रियायत दे रहा है।

ट्रंप ने कहा है कि भारत जीरो टैरिफ करेगा। सोचें, ट्रंप एक समय भारत को टैरिफ किंग कहा करते थे। अमेरिकी बाइक हार्ले डेविडसन पर सौ फीसदी से ज्यादा टैरिफ लगता था। हालांकि पिछले दिनों भारत सरकार हार्ले डेविडसन बाइक के अलावा कई तरह की शराब पर टैरिफ कम किया। फिर भी भारत में अमेरिकी उत्पादों पर औसतन 15 फीसदी के करीब टैरिफ लगता था, जिसको जीरो करने की बात हो रही है। जीरो नहीं भी हो तो इसमें बड़ी कमी आएगी। यानी भारतीय उत्पादों पर अमेरिका में लगने वाला टैरिफ छह गुना होगा और अमेरिकी सामानों पर लगने वाला टैरिफ कम होगा। तभी सवाल है कि इसमें जश्न मनाने की क्या बात है?

भारत के लिए जश्न मनाने की एक बात तो यह है कि पड़ोसी देशों के मुकाबले भारत पर टैरिफ थोड़ा कम है इसलिए भारतीय उत्पादों को थोड़ा फायदा अमेरिका में हो सकता है। पाकिस्तान, बांग्लादेश, वियतनाम, इंडोनेशिया आदि देशों पर 19 या 20 फीसदी टैरिफ है। हालांकि ब्रिटेन पर 10 फीसदी और यूरोपीय संघ व जापान पर 15 फीसदी ही अमेरिकी टैरिफ है। यानी भारत इन दोनों के बीच खड़ा है। टैरिफ के अलावा भारत के लोगों का एक सरोकार कृषि और डेयरी उत्पादों को लेकर रहा है। प्रधानमंत्री ने खुद कई बार कहा है कि वे किसानों और पशुपालकों के हितों से कोई समझौता नहीं करेंगे। लेकिन अब खबर आ रही है कि कुछ कृषि उत्पादों के लिए भी भारत का बाजार खुलेगा।

जेमिसन ग्रियर और ब्रुक रॉलिंस ने इसका संकेत दिया है। कहा जा रहा है कि सोयाबीन, मक्का और जेनेटिकली मोडिफायड फूड्स के अलावा कुछ प्रोसेस्ड फूड आइटम्स को भारत में बाजार मिल सकता है। बहरहालस, अगर भारत भी अपना निर्यात बढ़ाने के लिए अपने को तैयार करता है और भारत का विनिर्माण सेक्टर मजबूत होता है तो कपड़े, चमड़े, मैरिन प्रोडक्ट्स और जेम्स व ज्वेलरी के अलावा भी दूसरे उत्पादों का निर्यात कर सकता है। पड़ोसी और प्रतिस्पर्धी देशों के मुकाबले कम टैरिफ का लाभ भारत को मिल सकता है।

टैरिफ के अलावा एक बड़ा सवाल भारतीयों के प्रति अमेरिकी राष्ट्रपति के व्यवहार और वीजा समस्याओं का है। अमेरिका में ट्रंप और उनके मेक अमेरिका ग्रेट अगेन यानी मागा आंदोलन के समर्थक भारतीयों को दुश्मन मानते हैं। उनके ऊपर हमले करते हैं। खुद ट्रंप ने वीजा नियमों को इतना सख्त बना दिया है कि अब तक एच 1बी वीजा के सबसे बड़ा लाभार्थी रहे भारतीय पेशेवरों को सबसे ज्यादा मुश्किल हो रही है। भारतीय छात्रों को भी बड़ी समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है। वीजा रिन्यू कराने के लिए लोगों को एक एक साल इंतजार करना पड़ रहा है। लेकिन प्रधानमंत्री की दोस्ती इस मामले में काम नहीं आ रही है!

इस पूरे प्रकरण में अमेरिका की बात किए बगैर बात पूरी नहीं होगी। राष्ट्रपति ट्रंप खुश हैं कि उनकी वजह से अमेरिकी का आय बढ़ गई है। टैरिफ से अरबों डॉलर आ रहे हैं। लेकिन उनको समझना चाहिए कि अरबों डॉलर की वजह से अमेरिका बड़ा नहीं है। अमेरिका की धाक उसके पैसे की वजह से नहीं है, बल्कि उसकी ताकत लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा, अपने देश की मजबूत संस्थाओं, प्रवासियों के योगदान और दुनिया भर में के मित्र देशों के सहयोग की वजह से है। ट्रंप ने अमेरिका की आय बढ़ाने के लिए मित्र देशों को भी अमेरिका के खिलाफ खड़ा कर दिया है।

यह संभवतः पहली बार है कि इटली की प्रधानमंत्री ने अमेरिका की एक फूड चेन का नाम लेकर कहा कि उसे बंद कर देंगे। उन्होंने कहा कि अमेरिका के 80 सैन्य बेस बंद कर दिए जाएंगे। फ्रांस में एजेंसियों ने इलॉन मस्क की कंपनी के कार्यालय पर छापा मारा है और उनको समन भेजा है। ब्रिटेन में भी मस्क की कंपनी के खिलाफ जांच शुरू हुई है। भारत में सुप्रीम कोर्ट ने फेसबुक और व्हाट्सऐप की पैरेंट कंपनी मेटा को कहा कि भारतीय नियमों का पालन करें या भारत छोड़ कर जाएं। यह सब पहले नहीं होता था क्योंकि अमेरिका की धाक थी। अब ट्रंप ने पैसे कमाने के लिए देश की धाक समाप्त कर दी है। सहयोगियों को भरोसा खत्म कर दिया है।


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