यूजीसी के नियमों का घाव गहरा है

Categorized as अजित द्विवेदी कालम

उच्च शिक्षण संस्थानों में कथित तौर पर समानता लाने के लिए विश्वविद्यालय अनुदान आयोग यानी यूजीसी ने जो नियम जारी किए थे उसने भाजपा को गहरा घाव दिया है। पार्टी के नेता और यहां तक कि भाजपा और आरएसएस की ओर से टेलीविजन चैनलों पर राय रखने वाले प्रवक्ता व वक्ता भी कह रहे हैं कि इतनी मेहनत से पिछले 12 साल में नरेंद्र मोदी और अमित शाह ने जो नैरेटिव बनाया था वह एक झटके में बिखर गया। उनका कहना है कि इसको फिर से पटरी पर लाने में बहुत समय लगेगा। इस बात को रेखांकित किया जा रहा है कि पिछले 12 साल में हिंदू-मुस्लिम का नैरेटिव बहुत गहरे तक पहुंच गया था। लोग इस बात को समझ नहीं रहे थे और भाजपा की जीत के तरह तरह के कारण खोज रहे थे। असली कारण यह है कि सांप्रदायिक विभाजन डीप रूटेड हो गया था। हिंदुओं की हर जाति वोटिंग के समय मुस्लिम नैरेटिव का ध्यान रख कर वोट करती थी। लेकिन यूजीसी के नियमों के बाद विभाजन हो गया है। सवर्ण अब भी मुस्लिम नैरेटिव से प्रभावित होंगे लेकिन पिछड़ी और एससी, एसटी जातियों को लेकर भी एक पूर्वाग्रह बन गया। यह पूर्वाग्रह दोनों तरफ बना है। हिंदू समाज की जातियों का विभाजन भाजपा को नुकसान पहुंचाने वाला लग रहा है।

असल में यूजीसी के नियमों और उस पर भाजपा के तमाम बड़े नेताओं की चुप्पी ने सबसे अधिक धारणा को प्रभावित किया। शुरू में यह प्रयास हुआ कि इसका ठीकरा किसी और पर फोड़ा जाए। तभी शिक्षा मंत्रालय की संसदीय समिति के प्रमुख दिग्विजय सिंह का नाम उछाला गया लेकिन उन्होंने भी सामने आकर स्पष्ट कर दिया कि ये सिफारिशें कमेटी की नहीं हैं। इसी तरह सुप्रीम कोर्ट और इंदिरा जयसिंह पर भी ठीकरा फोड़ने का प्रयास हुआ लेकिन वह भी कामयाब नहीं हो सका। अंत में शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को निशाना बनाया गया। राइटविंग के एक सबसे चहेते सोशल मीडिया इनफ्लूएंसर ने तो धर्मेंद्र प्रधान के प्रति बेहद आपत्तिजनक अंदाज में वीडियो बना कर जारी किया। लेकिन जल्दी ही यह प्रयास भी विफल हो गया क्योंकि राइटविंग के ही लोगों ने यह कहा कि मौजूदा समय में भाजपा का कोई भी नेता, चाहे वह किसी भी पद पर हो, सर्वोच्च नेताओं की सहमति के बगैर सांस भी नहीं लेता है तो धर्मेंद्र प्रधान कैसे इतना बड़ा फैसला कर सकते हैं। सो, ले देकर ठीकरा पार्टी के शीर्ष नेतृत्व पर फूटा। यह भाजपा के सवर्ण समर्थकों का दिल तोड़ने वाला था। उनको लगा कि जिसे वे हिंदुत्व का सबसे बड़ा मसीहा समझ रहे थे वह भी जातिवादी ही है। धारणा का इस स्तर पर प्रभावित होना लंबे समय तक भाजपा को परेशान कर सकता है।

इसका कितना नुकसान हो सकता है उसकी झलक अब हर दिन सोशल मीडिया में दिखने लगी है। भाजपा इकोसिस्टम के इनफ्लूएंसर्स या राइटविंग के ज्यादातर अकाउंट, जो पहले आंख मूंद कर सरकार की हर चीज का समर्थन करते थे उनकी राय बदल गई है। वे सरकार की नीतियों पर सवाल उठाने लगे हैं। बजट इसका सबसे ताजा उदाहरण है। कायदे से राइटविंग इनफ्लूएंसर्स के अकाउंट से बजट की तारीफ होनी चाहिए थी। इसके प्रावधान को मास्टरस्ट्रोक बताया जाना चाहिए था। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। उलटे इसमें कमियां निकाली जाने लगीं। सरकार की मंशा पर सवाल उठाए जाने लगे। बिहार के लोगों ने पूछा कि पिछले साल बिहार चुनाव से पहले बजट में बिहार को लेकर जो घोषणाएं हुई थीं उनका क्या हुआ? 40 हजार करोड़ रुपए आवंटित करने की घोषणा हुई थी लेकिन किसी नई योजना में कोई आवंटन नहीं हुआ है। यह सवाल भी उठा कि सरकार ने पिछले 12 साल में सैकड़ों योजनाएं घोषित की हैं उनमें से ज्यादातर योजनाओं को भुला दिया गया है। अमेरिका के साथ हुए व्यापार समझौते में भी कमियां निकाली जा रही हैं। हालांकि यह नहीं कहा जा सकता है कि विरोध का स्वर आगे मुखर होगा या धीरे धीरे कमजोर पड़ेगा और अंततः पुरानी स्थिति बहाल होगी। अभी तो ऐसा लग रहा है कि संदेह गहरा है और इसलिए नाराजगी प्रकट हो रही है।

यूजीसी वाली घटना के बाद एक और दिलचस्प ट्रेंड यह देखने को मिला है कि बड़ी संख्या में राइटविंग एक्टिविस्ट या इनफ्लूएंसर्स यह कहने लगे हैं कि वे कभी भी किसी पार्टी के समर्थक नहीं रहे हैं। उनका कहना है कि वे विचारधारा के समर्थक थे और आगे भी रहेंगे। भाजपा से इस तरह दूरी दिखाना भाजपा कैडर के भीतर की बेचैनी को बता रहा है। ऐसा नहीं है कि भाजपा के नेता यह नहीं जानते हैं कि भारत में जाति सबसे बड़ी सचाई है। वे जानते हैं कि भारत में धर्म बदला जा सकता है लेकिन जाति नहीं बदली जाती है। धर्म बदलने वालों के साथ भी जाति उनके नए धर्म तक जाती है। इसलिए चाहे हिंदुत्व और राष्ट्रवाद का नैरेटिव कितना भी मजबूत हो, अगर उसका जातीय समीकरण से विपर्यय होगा यानी उसमें जाति का समीकरण ठीक नहीं होगा तो वह नैरेटिव विफल हो सकता है। तभी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बहुत बारीक तरीके से अपनी अति पिछड़ी जाति की पहचान को स्थापित किया और उसके बाद आर्थिक रूप से कमजोर सवर्ण यानी ईडब्लुएस को 10 फीसदी आरक्षण दिया। पिछले 12 साल के शासन की खूबी और लगातार चुनाव जीतने को इसी संतुलन के जरिए परिभाषित किया जा सकता है।

अब सवाल है कि यूजीसी के दिशा निर्देश अभी क्यों आए? अगर इससे एससी, एसटी और ओबीसी वोट को साधने का उद्देश्य है या विपक्ष की ओर रूझान दिखा रहे बहुजन समाज को संदेश देना है तो उसके लिए यह टाइमिंग क्या ठीक है? यह सवाल इसलिए है क्योंकि अभी कोई ऐसा चुनाव नहीं है, जहां जाति समीकरण भाजपा को बढ़त दिला सके। पश्चिम बंगाल और असम से लेकर दक्षिण भारत के राज्य उत्तर की पारंपरिक जाति राजनीति से अलग हैं। तभी ऐसा लग रहा है कि अगले साल के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव और उसके अलावा होने वाले छह अन्य राज्यों के चुनावों को ध्यान में रखा गया है। उस समय तक भाजपा का मैसेज बिल्कुल जमीनी स्तर तक पहुंच जाएगा और सामान्य वर्ग के समर्थकों में जो अचानक नाराजगी प्रकट हुई है उसका गुबार भी बैठ जाएगा। इसलिए यह टाइमिंग सोच समझ कर रखी गई है। इससे भाजपा को डैमेज कंट्रोल का समय मिल गया है।


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