अमेरिका से सौदा कितना सच्चा है?

Categorized as अजित द्विवेदी कालम

भारत और अमेरिका के बीच दोपक्षीय व्यापार वार्ता चलती रहेगी लेकिन उससे पहले अंतरिम समझौते की घोषणा हो गई है। जिस दिन घोषणा हुई यानी समझौते का फ्रेमवर्क और साझा बयान जारी हुआ उसके अगले दिन, आठ फरवरी को पता नहीं अमेरिका के अखबारों में किसी भारतीय उत्पाद का विज्ञापन छपा या नहीं, लेकिन भारत की राजधानी दिल्ली में सभी बड़े अखबारों में पहले पन्ने पर पूरे पेज पर अमेरिकी मोटरसाइकिल हार्ले डेविडसन का विज्ञापन छपा। 125 सीसी की हार्ले डेविडसन मोटरसाइकिल की कीमत तीन लाख रुपए से कम बताई गई।

ध्यान रहे यह कोई सामान्य मोटरसाइकिल नहीं है। यह अमेरिकी औद्योगिक उत्पादन शृंखला का प्रतीक उत्पाद है। पहली बार राष्ट्रपति रहते डोनाल्ड ट्रंप इसी बाइक पर लगने वाले सौ फीसदी से ज्यादा टैरिफ को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से नाराज हुए थे। उन्होंने भारत को टैरिफ किंग कहा था। बाद में भारत सरकार ने इस पर लगने वाला शुल्क कम किया। अब खबर है कि नए समझौते के तहत इस पर जीरो टैरिफ लगेगा। भारत में मोटरसाइकिल का बाजार बहुत बड़ा है और अब देशी कंपनियों के सामने हार्ले डेविडसन की चुनौती है।

बहरहाल, अमेरिका के साथ होने वाले सौदे को लेकर बहुत सी बातें कही और लिखी जा चुकी हैं। जैसे पहले भारतीय उत्पादों पर तीन फीसदी टैरिफ लगता था अब 18 फीसदी लगेगा और भारत में अमेरिकी उत्पादों पर औसतन 15 फीसदी टैरिफ लगता था, जिसको शून्य किए जाने की खबर है। इसी तरह भारत ने रूस से तेल खरीदना कम कर दिया है और अमेरिका से खरीद बढ़ा दी है। ऐसे ही भारत अब वेनेजुएला से तेल खरीदना शुरू करेगा। यह तेल भारत को महंगा पड़ेगा।

फ्रेमवर्क का ड्राफ्ट सामने आने और रूस से तेल खरीद की वजह से भारत पर लगाए गए 25 फीसदी अतिरिक्त टैरिफ को वापस लेने के राष्ट्रपति ट्रंप के कार्यकारी आदेश की प्रति सामने आने के बाद कुछ नई और दिलचस्प चीजें पता चली हैं। ट्रंप के कार्यकारी आदेश में लिखा हुआ है कि अगर भारत ने फिर रूस से तेल खरीदना शुरू किया तो उसके ऊपर 25 फीसदी टैरिफ लगाया जा सकता है। सोचें, किसी संप्रभु राष्ट्र के लिए क्या कोई दूसरा देश इस तरह के आदेश और धमकी जारी कर सकता है? ट्रंप ने भारत के लिए जारी किया लेकिन सब अपनी सुविधा के हिसाब से उनकी अनदेखी कर रहे हैं।

ऐसे ही फ्रेमवर्क में एक दिलचस्प बात यह है कि भारत अगले पांच साल में अमेरिका से पांच सौ अरब डॉलर के सामान खरीदेगा। यानी हर साल भारत को एक सौ अरब डॉलर के सामान खरीदने हैं। सवाल है कि भारत क्या खरीदेगा? अभी अमेरिका से भारत की औसत सालाना खरीद 40 अरब डॉलर की है। इसको दोगुने से ज्यादा बढ़ाना है। भारत अमेरिका से ऐसा क्या खरीदना शुरू करेगा कि उसका आयात दोगुने से ज्यादा बढ़ कर सौ अरब डॉलर यानी करीब नौ लाख करोड़ रुपए का हो जाएगा? यह सही है कि भारत ने तेल खरीद बढ़ा दी है। तेल व गैस की खरीद थोड़ी और बढ़ाई जा सकती है। कुछ विमान व विमानों के कल पुर्जों की खरीद बढ़ जाएगी लेकिन क्या इससे भारत का आयात दोगुना हो जाएगा? कम से कम पहले साल में तो नहीं होने वाला है।

भारत दुनिया के दूसरे देशों से सस्ती और जरुरत की चीजें छोड़ कर अमेरिका से ज्यादा और गैरजरूरी चीजों की खरीद करे तब तो बात अलग है। अन्यथा ऐसे हर साल नौ लाख करोड़ रुपए का सामान खरीदना मुश्किल होगा। अगर भारत ने समझौते की इस शर्त को पूरा नहीं किया तो क्या होगा? सबको पता है कि राष्ट्रपति ट्रंप ने अपने सबसे करीबी सहयोगियों में से एक दक्षिण कोरिया के साथ क्या किया? उन्होंने दक्षिण कोरिया से समझौता किया और एक दिन अचानक कहा कि वह समझौते की शर्तों को ठीक से लागू नहीं कर रहा है इसलिए उसके ऊपर 25 फीसदी टैरिफ लगाया जाता है। भारत के सामने भी यह खतरा रहेगा।

ध्यान रहे अभी तक भारत और अमेरिका के बीच व्यापार में संतुलन भारत के पक्ष में था। अमेरिका से भारत अभी करीब चार लाख करोड़ रुपए का सामान खरीदता है और उसे सात लाख करोड़ रुपए से ज्यादा का सामान बेचता है। दुनिया के ज्यादातर देशों के साथ अमेरिका का व्यापार संतुलन ऐसा ही था। तभी राष्ट्रपति ट्रंप ने कहा कि अब तक अमेरिका सभी देशों के साथ व्यापार में घाटा उठाता रहा है, अब वे इसे बदलेंगे। यानी अब अमेरिका मुनाफा कमाएगा। भारत के साथ व्यापार में भी ऐसा ही होगा। अब व्यापार संतुलन अमेरिका के पक्ष में होगा। अगर भारत चाहता है कि ऐसा न हो तो वह अमेरिका से नौ लाख करोड़ रुपए का सामान खरीदेगा और उसे इससे ज्यादा का सामाना बेचना होगा।

सोचें, अभी भारत सात लाख करोड़ रुपए से कुछ ज्यादा का सामान बेचता है अब अचानक तीन या चार लाख करोड़ रुपए का कौन सा सामान बेचने लगेगा कि व्यापार संतुलन भारत के पक्ष में झुके? यह भी ध्यान रखने की जरुरत है कि यूरोपीय संघ के साथ भी भारत ने मुक्त व्यापार संधि की है। ब्रिटेन और न्यूजीलैंड के साथ भी संधि हुई है। इन देशों को भी सामान बेचना है। इसे एक अवसर माना जा सकता है। लेकिन क्या अवसर का लाभ उठाने के लिए भारत तैयार है?

सौदे में एक और दिलचस्प बात यह है कि वाणिज्य मंत्री ने उन वस्तुओं की सूची गिनाई, जिनका निर्यात भारत करेगा। उसमें सेब और एवाकाडो भी है। सोचें, भारत में अपने इस्तेमाल का एवाकाडो तंजानिया, पेरू, चिली, ऑस्ट्रेलिया आदि देशों से आता है तो भारत कहां से एवाकाडो अमेरिका को निर्यात करेगा। इसी तरह भारत में सेब की अपनी जरुरत अमेरिका से लेकर न्यूजीलैंड और चीन के सेब से पूरी होती है। बहरहाल, भारत को एक तरफ अनाज, फल आदि का उत्पादन बढ़ाना होगा, उन्हें पेस्टिसाइड से मुक्त करना होगा और अमेरिकी व यूरोपीय स्टैंडर्ड का करना होगा। उसके साथ ही अपना बुनियादी ढांचा भी मजबूत करना होगा।

सरकार कह रही है कि उसने किसानों के हितों से कोई समझौता नहीं किया है। लेकिन अभी समझौते का अंतिम मसौदा सामने आना बाकी है। सरकार ने सोयाबीन तेल पर से टैरिफ हटा दिया है, जबकि अभी तक उस पर 45 फीसदी टैरिफ लगता था। इसी तरह ड्राई डिस्टिलर्स ग्रेन को अनुमति दी गई और उस पर लगने वाले 14 फीसदी टैरिफ को जीरो किया गया है। बादाम पर 42 रुपए प्रति किलो और बादाम गिरि पर सौ रुपए किलो टैरिफ लगता था और अखरोट एक सौ फीसदी व अखरोट गिरि पर 120 फीसदी टैरिफ लगता था। उसे भी जीरो कर दिया गया है।

इससे किसानों पर होने वाले असर का आकलन होना बाकी है लेकिन भारत को मिलने वाले आयात शुल्क में इससे अच्छी खासी कमी आएगी। सो, अगर भारत का निर्यात बहुत बड़ी मात्रा में नहीं बढ़ता है और आयात बढ़ता जाता है और अनेक चीजों पर आयात शुल्क कम हो जाता है तो भारत को विदेशी मुद्रा की कमी का सामना करना पड़ सकता है। बहरहाल, सौदे में कुछ तो गड़बड़ी है, जिसकी वजह से कोई खुल कर नहीं बात कर रहा है। सौदे के बारे में पूछे जाने पर विदेश मंत्री कहते हैं कि वाणिज्य मंत्री बताएंगे और रूस से तेल खरीदने के मामले पर वाणिज्य मंत्री कहते हैं कि विदेश मंत्री जानें या तेल कंपनियां जानें। भारत में शासन की इतनी केंद्रीकृत व्यवस्था में पहली बार ऐसा विकेंद्रीकरण देखने को मिल रहा है।


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