बंगाल का असर बहुत बड़ा होगा

Categorized as अजित द्विवेदी कालम

वैसे तो अप्रैल में पांच राज्यों में विधानसभा के चुनाव होने वाले हैं लेकिन सबकी नजर पश्चिम बंगाल पर है। और ऐसा होने के कई कारण है। हालांकि ऐसा नहीं है कि तमिलनाडु का चुनाव कम महत्वपूर्ण है या केरल और असम का चुनाव ज्यादा महत्व का नहीं है। असम और केरल का चुनाव कांग्रेस पार्टी के लिए जीवन मरण का चुनाव है तो तमिलनाडु डीएमके, अन्ना डीएमके और फिल्म स्टार विजय के लिए बहुत अहम है। परंतु राष्ट्रीय स्तर पर जिस चुनाव का सबसे ज्यादा असर होगा वह पश्चिम बंगाल का है। अगर ममता बनर्जी लगातार चौथी बार चुनाव जीतती हैं तो सिर्फ बंगाल नहीं, बल्कि राष्ट्रीय राजनीति प्रभावित होगी और सिर्फ भाजपा नेतृत्व वाले एनडीए पर ही नहीं, बल्कि विपक्षी गठबंधन ‘इंडिया’ की राजनीति पर भी बड़ा असर होगा।

चुनाव की घोषणा से पहले कांग्रेस ने ऐलान कर दिया है कि वह अकेले सभी 294 सीटों पर लड़ेगी। दूसरी ओर वामपंथी पार्टियों का मोर्चा भी अकेले लड़ने की तैयारी कर रहा है। 2016 के बाद पहली बार ऐसी स्थिति बन रही है। पिछले दो चुनावों में कांग्रेस और वाम मोर्चे के बीच सीट एडजस्टमेंट की सहमति बनी थी और दोनों ने मिल कर चुनाव लड़ा था। पिछली बार यानी 2021 में तो फुरफुराशरीफ के पीरजादा अब्बास सिद्दीकी की पार्टी इंडियन सेकुलर फ्रंट यानी आईएसएफ के साथ भी सीटों का समझौता हुआ था। इस बार देखने वाली बात होगी कि आईएसएफ की कमान संभाल रहे नौशाद सिद्दीकी क्या फैसला करते हैं। उनका फैसला इसलिए अहम हो गया है क्योंकि इस बार पश्चिम बंगाल में एक मुस्लिम गठजोड़ के अलग से चुनाव लड़ने की संभावना बन रही है। तृणमूल से चुनाव जीते हुमायूं कबीर ने जनता उन्नयन पार्टी बनाई है।

वे मुर्शिदाबाद के बेलडांगा में बाबरी मस्जिद बनवा रहे हैं और मुस्लिम ध्रुवीकरण के प्रयास कर रहे हैं। उन्होंने पिछले दिनों एक सभा की तो उसमें असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी ऑल इंडिया एमआईएम के प्रदेश अध्यक्ष इरफान सोलंकी भी शामिल हुए थे। कहा जा रहा है कि हुमायूं कबीर इस बार ओवैसी की पार्टी एमआईएम और बदरूद्दीन अजमल की पार्टी एआईयूडीफ से तालमेल करेंगे। अगर आईएसएफ इसमें शामिल हो तो चार मुस्लिम पार्टियों का एक मोर्चा बनेगा। हालांकि इस बीच यह भी खबर है कि सीपीएम के प्रदेश सचिव मोहम्मद सलीम ने भी हुमायूं कबीर से मुलाकात की है। तो क्या लेफ्ट मोर्चा इन मुस्लिम पार्टियों के साथ गठबंधन कर सकता है? जो हो अभी तक यह दिख रहा है कि भाजपा और तृणमूल कांग्रेस की आमने सामने की लड़ाई में कांग्रेस, लेफ्ट और मुस्लिम पार्टियों के मोर्चे की चुनौती है। दूर से एक बहुकोणीय मुकाबला दिख रहा है। हालांकि ऐसा होगा नहीं।

चुनाव से पहले बन रहे गठबंधनों की पृष्ठभूमि जानना इसलिए जरूरी है क्योंकि पश्चिम बंगाल में हिंदू और मुस्लिम दोनों वोटों के बंटवारे या ध्रुवीकऱण से चुनावी नतीजे तय होते हैं। लगभग 30 फीसदी मुस्लिम आबादी लगभग पूरी तरह से ममता बनर्जी की पार्टी के समर्थन में वोट करती है। दूसरी ओर 70 फीसदी हिंदू आबादी का लगभग 60 फीसदी हिस्सा भाजपा का समर्थन करता है। इसका अर्थ है कि अगर 10 फीसदी और हिंदू वोट भाजपा के साथ जुड़ जाएं तो भाजपा चुनाव जीत जाएगी या अगर 20 फीसदी के करीब मुस्लिम वोट ममता बनर्जी से टूट जाए तब भी भाजपा जीत जाएगी। भाजपा का 38 से 40 फीसदी तक वोट कायम रहने की संभावना इसलिए है क्योंकि पिछले तीन चुनावों में उसे इतना ही वोट मिलता है और उसे इसे और कंसोलिडेट किया है।

पिछले चुनाव में कांग्रेस, लेफ्ट और आईएसएफ को साझा तौर पर 12 फीसदी के करीब वोट मिला था। इसमें ज्यादा बड़ा हिस्सा हिंदू वोट का था। ध्यान रहे बांग्ला बोलने वाला हिंदू समुदाय भाजपा के साथ जाने की बजाय ममता बनर्जी या लेफ्ट, कांग्रेस के साथ रहता है। लेकिन इस बार स्थिति बदलने की संभावना है। बांग्लाभाषी हिंदू पहली बार मुस्लिम आबादी को लेकर चिंता में हैं। उनको लग रहा है कि भाषा और संस्कृति की एकता बनाने के चक्कर में बांग्लाभाषी हिंदू पहले कांग्रेस फिर लेफ्ट और अब तृणमूल को वोट देते रहे हैं लेकिन इस बीच राज्य की जनसंख्या संरचना बदल गई और उनके सामने गंभीर खतरे खड़े हो गए हैं। अगर बांग्लाभाषी हिंदू इस मानसिकता में वोट करते हैं तो भाजपा के लिए अवसर बनेगा और राष्ट्रीय स्तर पर हिंदू ध्रुवीकरण मजबूत होगा।

अगर चुनिंदा इलाकों में जैसे मालदा, मुर्शिदाबाद और उत्तरी दिनाजपुर के मुस्लिम बहुल इलाकों में तृणमूल कांग्रेस को छोड़ कर मुस्लिम आवाम का समर्थन मुस्लिम नेताओं की पार्टियों को मिलता है तो हैदराबाद से शुरू होकर महाराष्ट्र और बिहार तक मुस्लिम नेतृत्व के प्रति मुस्लिम आवाम के बढ़ते रूझान पर मुहर लगेगी। यह ट्रेंड स्थायी रूप से देश की राजनीति को बदलने वाला होगा। ध्यान रहे बिहार में आमने सामने के चुनाव के बावजूद ओवैसी की पार्टी के पांच विधायक जीते। महाराष्ट्र में ओवैसी की पार्टी के करीब एक सौ पार्षद जीते हैं। यह ट्रेंड दिखाता है कि मुस्लिम आवाम के मन में मौजूदा सेकुलर पार्टियों को लेकर संदेह पैदा हो गया है। वे उनकी बजाय सीधे अपना नेतृत्व खड़ा करना चाहते हैं। तभी जहां भी उनको अपना विकल्प मिलता है वे उसे प्राथमिकता देते हैं। जहां विकल्प नहीं है वहां रणनीतिक मजबूरी में कांग्रेस या किसी प्रादेशिक पार्टी का समर्थन करते हैं। अगर ममता बनर्जी की पार्टी को मुसलमानों का समर्थन कम होता है तो इस ट्रेंड की पुष्टि होगी। आगे के चुनावों में देश के दूसरे हिस्सों में भी यह ट्रेंड देखने को मिलेगा।

नेतृत्व के स्तर पर भी पश्चिम बंगाल के चुनाव नतीजे का असर देश की राजनीति पर पड़ेगा। अगर ममता बनर्जी चौथी बार जीतती हैं और लगातार दूसरी बार सीधे मुकाबले में भाजपा को हराती हैं तो इसे भाजपा के मौजूदा नेतृत्व के करिश्मे और रणनीति के क्षरण की शुरुआत के तौर पर देखा जाएगा। ध्यान रहे एनडीए के अंदर वैसे भी इस बार भाजपा की स्थिति कमजोर है। पिछले चुनाव में वह अकेले दम पर बहुमत नहीं हासिल कर पाई। नरेंद्र मोदी की सरकार नीतीश कुमार और चंद्रबाबू नायडू के समर्थन पर निर्भर है। पश्चिम बंगाल में हारने पर सहयोगी पार्टियों का दबाव बढ़ेगा और पार्टी के अंदर भी एक दबाव समूह उभर सकता है। संघ की ओर से दखल बढ़ने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता है। लेकिन अगर पश्चिम बंगाल का किला भाजपा फतह कर लेती है तो फिर राष्ट्रीय राजनीति में वह अजेय हो जाएगी। नरेंद्र मोदी और अमित शाह के नेतृत्व के सामने लंबे समय तक कोई चुनौती नहीं आएगी।

पश्चिम बंगाल के नतीजे का विपक्षी गठबंधन पर भी बड़ा असर होगा। अगर ममता बनर्जी जीतती हैं तो फिर जैसा कि अखिलेश यादव ने कहा, भाजपा से लड़ने वाली इकलौती नेता के तौर वे स्थापित होंगी। वे दिल्ली कूच करेंगी। राहुल गांधी के नेतृत्व के सामने बड़ी चुनौती खड़ी होगी। उनके पीछे हटने और ममता बनर्जी के नेतृत्व में 2029 के लोकसभा चुनाव की तैयारी करने की मांग उठेगी। यह मांग जमीन सचाइय़ों पर आधरित होगी। इसलिए कांग्रेस भले विरोध करे पर दूसरी पार्टियां इस पर गंभीरता से विचार करेंगी। ध्यान रहे अगले चुनाव तक विपक्षी पार्टियों का सत्ता का सूखा 15 साल का हो जाएगा। ऐसे में वे ममता बनर्जी के ऊपर दांव लगा सकती हैं। अगर कांग्रेस केरल और असम में जीत जाती है और तमिलनाडु में डीएमके गठबंधन जीतता है तब भी राष्ट्रीय स्तर पर नेतृत्व को लेकर गंभीर चर्चा छिड़ेगी। कुल मिला कर हिंदू ध्रुवीकरण, मुसलमानों के अंदर अपने नेतृत्व की तलाश की बेचैनी और एनडीए व ‘इंडिया’ ब्लॉक में नेतृत्व के लिहाज से पश्चिम बंगाल का चुनाव बहुत अहम होने वाला है।


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