युद्ध केवल ठहरते हैं, अब खत्म नहीं होते!

Categorized as श्रुति व्यास कालम

नेताओं की लोकलुभावन राजनीति की एक विचित्र विशेषता है। ऐसे नेता कभी किसी विजय को अंतिम जीत नहीं बनने देते। तभी हर चुनाव अब राष्ट्र के अस्तित्व की निर्णायक लड़ाई है। हर जनादेश सभ्यता बचाने का आखिरी अवसर घोषित है। लेकिन जीत मिलते ही अगला संकट खोज लिया जाता है। मानो विजय का उद्देश्य स्थिर शासन नहीं, बल्कि अगली लड़ाई की तैयारी हो। जाहिर है पोपुलिस्ट या लोकलुभावन राजनीति जनउत्तेजना से ही जीवित रहती है।

यही बात अब इक्कीसवीं सदी के युद्ध, सैनिक आपरेशनों पर भी लागू है।

पश्चिम एशिया पर गौर करें। कितनी बार वहां युद्ध रुका और फिर शुरू हुआ? कितनी बार युद्धविराम की घोषणा हुई और कुछ ही दिनों बाद गोलाबारी फिर लौट आई?

गिनना चाहें तो शायद तीसरे या चौथे युद्धविराम के बाद ही गिनती छूट जाएगी। क्योंकि एक समय ऐसा आता है जब “तनाव कम करने” की घोषणाएं राहत नहीं देतीं, बल्कि एक औपचारिक नाटक जैसी लगने लगती हैं।

पूरा घटनाक्रम लगभग तयशुदा दिखाई देता है। पहले किसी समझौते की घोषणा होती है। कैमरों के सामने नेता हाथ मिलाते हैं। शेयर बाजार उत्साहित हो उठते हैं। तेल की कीमतें कुछ डॉलर नीचे आ जाती हैं। समाचार चैनलों की आवाज़ में संकट की जगह राहत सुनाई देने लगती है। दुनिया भर की सरकारें क्षेत्र में स्थिरता लौटने की उम्मीद जताती हैं। कुछ दिनों के लिए लगता है कि शायद अब शांति रहेगी।

लेकिन फिर कुछ ही दिनों या हफ्तों बाद कोई मिसाइल अपने लक्ष्य पर गिरती है। उसके जवाब में दूसरा हमला होता है। फिर तीसरा। समाचार वहीं से शुरू हो जाते हैं, जहां कुछ दिन पहले रुके थे। नई कहानी शुरू नहीं होती, पुरानी कहानी फिर चल पड़ती है। जैसे युद्ध कभी खत्म हुआ ही न हो, केवल थोड़ी देर के लिए रुका हो।

कुछ सप्ताह पहले अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के साथ नया समझौता फ्रांस के वर्साय महल में हस्ताक्षरित किया। यही वह महल है जहां प्रथम विश्वयुद्ध समाप्त करने वाली संधि हुई थी, लेकिन अनेक इतिहासकार मानते हैं कि उसी संधि ने द्वितीय विश्वयुद्ध के बीज भी बो दिए थे। इसलिए स्थान का चुनाव अनजाने में हुआ हो या जानबूझकर, वह आज के समय का एक सटीक प्रतीक बन गया है।

विश्व नेताओं ने इसे बड़ी उपलब्धि बताया। शेयर बाजारों ने हमेशा की तरह आशावाद दिखाया। भारत सहित अनेक देशों ने उम्मीद जताई कि दुनिया के सबसे विस्फोटक क्षेत्रों में से एक में अब शांति लौटेगी। लेकिन औपचारिक तस्वीरें अखबारों से गायब भी नहीं हुई थीं कि समझौते की बुनियाद हिलने लगी। कुछ ही सप्ताह में अंतरिम सहमति समाप्त घोषित कर दी गई। ईरान और खाड़ी क्षेत्र पर फिर हमले शुरू हो गए। प्रतिशोध की वही पुरानी भाषा फिर लौट आई।

पहली नजर में लगता है कि समस्या पश्चिम एशिया की है। जैसे यह इलाका हमेशा से कूटनीति और विनाश के बीच झूलने के लिए अभिशप्त रहा हो। यह निष्कर्ष इसलिए आकर्षक लगता है क्योंकि वह दोष को भूगोल पर डाल देता है। लेकिन सच्चाई इससे कहीं बड़ी है।

असल परिवर्तन केवल तेहरान, तेल अवीव या वॉशिंगटन तक सीमित नहीं है। पूरी दुनिया में युद्ध और राजनीति का रिश्ता बदल चुका है।

आधुनिक इतिहास के अधिकांश काल में युद्ध को राजनीति की विफलता माना जाता था। शांति का अर्थ था राजनीति की वापसी। युद्ध असाधारण स्थिति था, जिसे समाप्त करके सामान्य राजनीतिक जीवन बहाल किया जाना चाहिए।

लेकिन आज स्थिति उलट चुकी है।

युद्ध अब राजनीति की विफलता नहीं, बल्कि राजनीति की एक स्थायी अवस्था बनता जा रहा है। यही परिवर्तन सबसे गहरा है। शायद इसी कारण आज युद्ध समाप्त होते नहीं दिखते। कूटनीति भी अब समाधान की नहीं, “संघर्ष प्रबंधन” की भाषा बोलती है। आधुनिक युद्ध इसलिए इतने परिचित लगने लगे हैं क्योंकि उन्होंने केवल नई तकनीक नहीं अपनाई है। उन्होंने लोकलुभावन राजनीति का व्याकरण भी सीख लिया है।

इस परिवर्तन को सबसे पहले सेनाओं या राजनेताओं में नहीं, बल्कि दर्शकों में देखा जा सकता है।

1914 में लोग अखबारों के दफ्तरों के बाहर घंटों खड़े रहते थे। टेलीग्राफ से आने वाली खबरों का इंतजार होता था। सूचना जितनी तेजी से आती थी, युद्ध की आशंका उससे कहीं अधिक तेज दौड़ती थी।

द्वितीय विश्वयुद्ध तक आते-आते दर्शक घरों के भीतर पहुंच चुके थे। रेडियो राष्ट्रीय जीवन की धड़कन बन गया था। विंस्टन चर्चिल की आवाज़ केवल भाषण नहीं देती थी, वह पूरे ब्रिटेन की मनःस्थिति की लय तय करती थी।

फिर वियतनाम युद्ध आया। पहली बार युद्ध सीधे लोगों के बैठकखानों तक पहुंचा। टेलीविजन ने युद्ध को घर-घर पहुंचाया। अमेरिकी, पश्चिमी लोकतंत्र पहली बार अपनी ही हार को प्रत्यक्ष देख रहा था। सरकारों को केवल युद्ध नहीं लड़ना पड़ा, बल्कि हर शाम प्रसारित होने वाली तस्वीरों के सामने जवाब भी देना पड़ा।

1991 के खाड़ी युद्ध तक आते-आते एक नया दौर शुरू हुआ। सीएनएन ने युद्ध को चौबीस घंटे चलने वाले प्रसारण में बदल दिया। युद्ध केवल घटना नहीं रहा; वह लगातार चलने वाला दृश्य बन गया, जिसे लोग चैनल बदलते हुए भी देखते रह सकते थे।

अब फिर युद्ध का स्वरूप बदला है।

अब किसी मिसाइल हमले की तस्वीर आपके मोबाइल स्क्रीन पर छुट्टियों की किसी तस्वीर और खाना बनाने वाले वीडियो के बीच दिखाई देती है। किसी हवाई हमले को किसी फिल्म अभिनेता के विवाद से प्रतिस्पर्धा करनी पड़ती है। युद्धविराम की सूचना के बीच जूतों का विज्ञापन आ जाता है। किसी शहर का मलबा अभी मन में पूरी तरह बैठ भी नहीं पाता कि एल्गोरिदम आपको किसी दूसरे व्यक्ति के जीवन के अगले पंद्रह सेकंड दिखाने लगता है।

युद्ध अब केवल मोर्चे पर नहीं लड़ा जाता। वह हमारी स्क्रीन पर, हमारे ध्यान में और हमारी स्मृति के भीतर भी लड़ा जाता है। यही इक्कीसवीं सदी का सबसे बड़ा परिवर्तन है।

इसका अर्थ यह नहीं कि मनुष्य पहले की तुलना में कम संवेदनशील हो गया है। समस्या संवेदना की नहीं, बल्कि ध्यान की है। हमारा ध्यान पहले कभी इतना बिखरा नहीं था। इसकी वजह नैतिक पतन नहीं, बल्कि वह सूचना व्यवस्था है जिसमें मनुष्य का ध्यान ही सबसे कीमती संसाधन बन चुका है।

मनुष्य शोक महसूस कर सकता है। वह क्रोध भी महसूस कर सकता है और सहानुभूति भी। लेकिन वह हर दिन, हर संकट और हर युद्ध के लिए इन तीनों भावनाओं को एक साथ अनंत समय तक जीवित नहीं रख सकता। मानव मस्तिष्क की अपनी सीमाएं हैं। वह ऐसी दुनिया के लिए बना ही नहीं था, जहां हर क्षण कोई नया संकट उसकी चेतना पर अधिकार जमाने की कोशिश करे।

सरकारों ने यह बात समझ ली है। सेनाओं ने भी। इसलिए आज समाचार फीड भी युद्ध का दूसरा मोर्चा बन चुकी है। हर मिसाइल केवल दुश्मन को नुकसान पहुंचाने के लिए नहीं छोड़ी जाती। उसका दूसरा लक्ष्य वह समाज होता है जिसे प्रभावित करना है, थकाना है, अपने पक्ष में करना है या इतना लंबा इंतजार कराना है कि संघर्ष ही सामान्य जीवन का हिस्सा लगने लगे।

लेकिन परिवर्तन केवल दर्शकों में नहीं आया है। कूटनीति भी बदल चुकी है और इसका सबसे स्पष्ट प्रमाण उसकी भाषा है।

बीसवीं सदी ने दो विश्वयुद्धों की विभीषिका से एक मूल विश्वास अर्जित किया था। युद्ध चाहे कितना भी व्यापक क्यों न हो, उसका अंत किसी राजनीतिक समझौते पर होना चाहिए। संयुक्त राष्ट्र, हथियार नियंत्रण की संधियां, शांति सम्मेलन और 1945 के बाद बनी पूरी अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था इसी धारणा पर खड़ी थी कि युद्ध का एक स्पष्ट अंत होता है। कोई संधि होती है, कोई हस्ताक्षर होते हैं और कोई ऐसी तारीख होती है जिसे इतिहास दर्ज कर सके।

यह व्यवस्था कई बार असफल हुई। लेकिन उसकी असफलता को भी इसी कसौटी पर परखा गया कि शांति क्यों स्थापित नहीं हो सकी?

अब आज की कूटनीति की भाषा पर गौर करें। अब कोई स्थायी समाधान का वादा नहीं करता। अब बात होती है तनाव कम करने की, रणनीतिक संयम की, मानवीय विराम की और संघर्ष को नियंत्रित रखने की।

यह केवल शब्दों का परिवर्तन नहीं है। यह हमारी राजनीतिक महत्वाकांक्षा के सिकुड़ जाने का संकेत है। कूटनीति ने चुपचाप अपने लक्ष्य बदल लिए हैं। उसका उद्देश्य अब युद्ध समाप्त करना नहीं, बल्कि उसे सीमित रखना है—इतना कि वह भौगोलिक रूप से फैल न सके, अर्थव्यवस्था उसे झेल सके और राजनीति उसके साथ जीती रहे।

युद्ध अब वह घटना नहीं रह गया जिसे राष्ट्र समाप्त करते हैं। वह ऐसी अवस्था बन गया है जिसका लगातार प्रबंधन किया जाता है।

इसीलिए पश्चिम एशिया में लौटती हिंसा अब असाधारण नहीं लगती। वह परिचित लगती है। वह शांति के टूटने की कहानी नहीं, बल्कि लंबे समय से चले आ रहे नियंत्रित संघर्ष के भीतर आने वाले अस्थायी विरामों की कहानी है।

यहीं एक और समानता उभरती है।

संयोग नहीं है कि इक्कीसवीं सदी के अनेक बड़े संघर्ष उन नेताओं के दौर में सामने आए जिन्हें प्रायः लोकलुभावन नेता कहा जाता है। बेंजामिन नेतन्याहू के लंबे गाज़ा युद्ध, व्लादिमीर पुतिन का यूक्रेन पर आक्रमण, रेचेप तैय्यप एर्दोआन की सीरिया और उत्तरी इराक में बार-बार की गई सैन्य कार्रवाइयां, डोनाल्ड ट्रंप के समय ईरान के साथ बढ़ा टकराव और पश्चिम एशिया में नए हमले, या उरी और पुलवामा के बाद नरेंद्र मोदी सरकार की सख्त सुरक्षा प्रतिक्रियाएं—इन सबकी घरेलू राजनीति में राष्ट्रीय लामबंदी पहले से ही वैधता का प्रमुख आधार बन चुकी थी।

इसका अर्थ यह नहीं कि लोकलुभावन राजनीति युद्ध पैदा करती है। लेकिन दोनों के बीच एक गहरा स्वभावगत साम्य अवश्य दिखाई देता है।

लोकलुभावन राजनीति और आधुनिक युद्ध दोनों स्थायी शत्रु गढ़ते हैं। दोनों निरंतर संकट का वातावरण बनाए रखते हैं। दोनों टिकाऊ समझौतों की अपेक्षा निर्णायक दिखाई देने वाले कदमों को अधिक महत्व देते हैं। और दोनों तब भी जनभावनाओं को सक्रिय बनाए रखते हैं, जब मूल राजनीतिक या सैन्य उद्देश्य स्वयं धुंधले पड़ने लगते हैं।

शायद यही हमारे समय का सबसे बड़ा भू राजनीतिक परिवर्तन है।

आज राजनीति युद्ध का व्याकरण सीख रही है। उसे लगातार संघर्ष चाहिए, लगातार शत्रु चाहिए और लगातार जनता की लामबंदी चाहिए। दूसरी ओर युद्ध राजनीति का व्याकरण सीख रहा है। उसका उद्देश्य निर्णायक विजय नहीं, बल्कि संघर्ष को इतना लंबा बनाए रखना है कि उसका प्रबंधन ही राजनीति का स्थायी साधन बन जाए।

दोनों अब एक दूसरे के बाद नहीं आते। दोनों एक दूसरे को लगातार जीवित रखते हैं।

इसका असर केवल पश्चिम एशिया तक सीमित नहीं रहेगा। हर विफल युद्धविराम अगले युद्धविराम पर विश्वास को थोड़ा और कमजोर करता है। हर वह शांति पहल जो कुछ ही सप्ताह बाद फिर हिंसा में बदल जाती है, कूटनीति की विश्वसनीयता को थोड़ा और कम कर देती है।

शांति भी शायद मुद्रा, करेंसी की तरह होती है। उसे जितनी बार बिना परिणाम के चलन में लाया जाएगा, उसका मूल्य उतना ही घटता जाएगा।

लेकिन सबसे बड़ा परिवर्तन हमारे भीतर होता है।

हम दर्शकों, नागरिकों के भीतर। उन लोगों के भीतर जो युद्ध नहीं लड़ते, लेकिन युद्धों के बीच अपना जीवन बिताते हैं।

बीसवीं सदी ने हमें युद्धों को उनके अंत से पहचानना सिखाया। हमें याद है कि द्वितीय विश्वयुद्ध कब समाप्त हुआ। भारत आज भी कारगिल युद्ध को उसके स्पष्ट समापन के साथ याद करता है।

लेकिन आज किसी से पूछिए कि यमन का युद्ध कब समाप्त हुआ? सीरिया की लड़ाई का अंत कब आया? गाज़ा, लेबनान ने अब तक कितने युद्धविराम देखे? या दस वर्ष बाद कितने लोग बता पाएंगे कि ऑपरेशन सिंदूर वास्तव में कब शुरू हुआ था और क्या वह कभी सचमुच समाप्त भी हुआ?

शायद बहुत कम।

क्योंकि ये युद्ध किसी निश्चित आरंभ और अंत वाली घटनाओं की तरह नहीं आए। वे धीरे-धीरे हमारे समय की स्थायी पृष्ठभूमि बन गए। कुछ समय के लिए सामान्य जीवन में खो जाते हैं, फिर अचानक सुर्खियों में लौट आते हैं। फिर पीछे चले जाते हैं। फिर लौटते हैं।

यहीं हमारे समय की राजनीति और उसके युद्ध एक दूसरे से सबसे अधिक मिलते हैं।

दोनों ने अंत पर विश्वास करना छोड़ दिया है। राजनीति लगातार चुनाव लड़ती रहती है। वही युद्ध लगातार विराम लेता रहता है।


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