जिस तरह से अमित शाह के उप प्रधानमंत्री बनने की चर्चा है वैसे ही इस बात की भी जोर शोर से चर्चा हो रही है कि बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को केंद्र में मंत्री बनाया जा सकता है। हालांकि इसका कोई आधार नहीं है। कुछ समय पहले तक तो नीतीश समर्थक उनके उप प्रधानमंत्री बनने की बात भी कर रहे थे। लेकिन हकीकत यह है कि नीतीश कुमार ने मुख्यमंत्री की कुर्सी इसलिए छोड़ी क्योंकि उनको भूलने की बीमारी हो गई है। उनके सार्वजनिक आचरण में दिखता है कि वे लोगों को नहीं पहचानते हैं और कुछ भी करने लगते हैं। ऐसे में उनको केंद्र मंत्री बनाना उनके लिए और सरकार के लिए भी शर्मिंदगी का कारण बन सकता है।
दूसरी बात यह है कि अब सरकार उनकी पार्टी के 12 सांसदों के समर्थन की मोहताज नहीं है। ममता बनर्जी के 20 और उद्धव ठाकरे के छह सांसदों के टूटने के बाद यह मजबूरी समाप्त हो गई है। तीसरी बात यह है कि खुद नीतीश कुमार क्यों चाहेंगे कि वे अपनी पार्टी को नेताओं के साथ केंद्रीय मंत्रिमंडल का हिस्सा बनें? उनके कहने से उनकी पार्टी के सांसद केंद्र में मंत्री बनाए गए हैं। अब अगर वे खुद भी मंत्री बनते हैं तो वे अपने ही नेताओं की बराबरी में आ जाएंगे। इसलिए उनके मंत्री बनने की संभावना नगण्य है। फिर भी दिल्ली का हर पत्रकार अपनी सूची में उनका नाम रखे हुए है।
