पहली चुनौती में ही जदयू ढेर

Categorized as राजनीति

नीतीश कुमार के मुख्यमंत्री पद से हटने के बाद बिहार में जनता दल यू के सामने पहली चुनौती बक्सर भोजपुर विधान परिषद सीट की थी। स्थानीय निकायों के चुने हुए प्रतिनिधियों के वोट से एमएलसी चुना जाना था। सीट खाली हुई थी जनता दल यू के राधाचरण सेठ के इस्तीफे की वजह से। राधाचरण सेठ पिछले साल हुए विधानसभा चुनाव में कांटे की टक्कर में संदेश सीट से जीत गए थे। उसके बाद बक्सर भोजपुर सीट पर उपचुनाव हो रहा था। नीतीश कुमार की पार्टी जनता दल यू की ओर से राधाचरण सेठ के बेटे कन्हैया प्रसाद को टिकट दिया गया था, जबकि दूसरी ओर से राजद ने सोनू राय को उम्मीदवार बनाया था। इस प्रतिष्ठा के चुनाव में सोनू राय ने कन्हैया प्रसाद को करीब सवा तीन सौ वोट से हरा दिया। यह राजद की बड़ी जीत है और विधानसभा चुनाव में हार पर मलहम लगाने वाली है। नतीजों के बाद तेजस्वी यादव ने कहा कि जब भी बैलेट से चुनाव होगा, भाजपा और एनडीए की हार होगी। यह उनका अपना नैरेटिव है।

लेकिन हकीकत यह है कि जनता दल यू पहली ही परीक्षा में फेल हो गया है और इससे आगे उसके भविष्य को लेकर गंभीर सवाल उठ रहे हैं। पहले इस परीक्षा की बात करें तो सबसे बड़ा सवाल या ज्यादा गहरी समस्या गठबंधन की है। ऐसा लग रहा है कि बिहार सरकार चला रही भाजपा ने जदयू को उसके हाल पर छोड़ दिया। भाजपा के नेताओं ने इस चुनाव में जदयू की जीत के लिए काम नहीं किया। अगर भाजपा ईमानदारी से काम करती तो यह नतीजा नहीं होता। अगर भाजपा चाहती तो मनोज उपाध्याय निर्दलीय चुनाव नहीं लड़ रहे होते। उन्होंने जदयू उम्मीदवार की हार के अंतर से बहुत ज्यादा वोट काट लिया।

स्थानीय निकाय प्रतिनिधियों का चुनाव विशुद्ध रूप से पैसे और प्रशासन के दम पर होता है। जदयू प्रत्याशी के पास पैसे भी हैं और प्रशासन भी उनके गठबंधन का था। फिर भी वे हार गए। मनोज उपाध्याय को भाजपा मना सकती थी तो पांडेय बंधुओं, सुनील और हुलास पांडेय को भी मदद करने के लिए मजबूर कर सकती थी। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। सोचें, सुनील पांडेय के बेटे विशाल प्रशांत इसी इलाके की तरारी सीट से भाजपा के विधायक हैं। लेकिन उन्होंने भाजपा उम्मीदवार की मदद नहीं की। हुलास पांडेय बहुत मजबूत नेता हैं और चिराग पासवान की पार्टी से जुड़े हैं। इनका भी समर्थन जदयू उम्मीदवार को नहीं मिला।

दूसरी समस्या जदयू के नेतृत्व की है। यह साफ है कि जनता दल यू के पास अब कोई ऐसा नेता नहीं है, जो चुनावी राजनीति में माहिर हो। पार्टी के पास कोई चेहरा भी नहीं है, जिसके दम पर वह राजनीति करे। नीतीश कुमार अब सक्रिय राजनीति करने में सक्षम नहीं हैं और उनके बेटे निशांत की अभी कोई पहचान नहीं बनी है। यह भी नहीं लग रहा है कि निकट भविष्य में कोई पहचान बना पाएंगे। जदयू के जितने भी नेता हैं चाहे वह ललन सिंह हों या संजय झा, विजय चौधरी, विजेंद्र यादव या अशोक चौधरी किसी की पहचान पूरे बिहार में नहीं है और न ये जदयू के जातीय समीकरण का प्रतिनिधित्व करते हैं। इन सबकी ताकत नीतीश कुमार के कारण थी।


Previous News Next News

More News

बसपा की कलह पर सबकी नजर

September 22, 2026

बहुजन समाज पार्टी के अंदर घमासान छिड़ा है। पार्टी की सुप्रीमो मायावती के घर में अलग कलह है और पार्टी के स्तर पर अलग विवाद है। मायावती ने पहले अपने भतीजे आकाश आनंद के ससुर अशोक सिद्धार्थ को पार्टी से निकाला। उसके बाद आकाश को भी हर जिम्मेदारी से मुक्त किया। फिर दूसरे भतीजे ईशान…

सरकार कैसे एमडीआर शुल्क को मॉनिटर करेगी?

September 22, 2026

यह लाख टके का सवाल है कि केंद्र सरकार किस तरह से यह निगरानी करेगी कि दुकानदार यूपीआई के जरिए होने वाले लेनदेन में एमडीआर शुल्क यानी केंद्र सरकार ने दो हजार से ऊपर के लेनदेन पर जो 0.40 फीसदी शुल्क लगाया है वह खुद दे रहा है या ग्राहक से ले रहा है? सरकार…

मोहन भागवत के मुताबिक किसका उदय होगा?

September 22, 2026

आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने पिछले दिनों युवा धर्म संसद कार्यक्रम में अपने भाषण में कहा कि जिसका उदय होता है उसका अस्त निश्चित है। उन्होंने यह भी कहा कि कोई समझता है कि हमेशा सब कुछ उसके हिसाब से ही होगा तो ऐसा नहीं होता है। उनके इस बयान के बाद एक कयास तो…

सिद्धारमैया की मूर्ति का किस्सा

September 22, 2026

कर्नाटक में कमाल हो रहा है। डीके शिवकुमार के मुख्यमंत्री बनने के बाद हाशिए पर गए सिद्धारमैया अचानक सक्रिय हो गए हैं। कांग्रेस के जानकार नेताओं का कहना है कि उनको कहीं से शह मिल रही है। शिवकुमार को इसका अंदाजा था तभी उन्होंने अपने दांवपेंच चलने शुरू कर दिए हैं। उन्होंने सिद्धारमैया के सबसे…

हाँक सके सो हाँक!

September 22, 2026

1970 के दशक वाले सोवियत रूसी समाज की स्थिति जैसी हालत लगती है। जब वहाँ नेता नियमित झूठ से ही अपने देश को ‘उत्साहित‘ यानी भ्रमित रखते थे। वहाँ किसी बात या स्थिति की आलोचना अथवा परीक्षण का कोई स्थान न था। फलतः समय के साथ नेतागण भी अपने ही प्रोपेगंडा के शिकार खुद बन…

logo