चुनाव के दौरान छापा और उम्मीदवारों को नोटिस

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पुराने तमाम नेता यह दोहराते रहे हैं कि राजनीति सिर्फ नियम, सिद्धांत, विचार या परंपरा से नहीं, बल्कि लोकलाज से चलती है। पुराने नेता इसका बहुत ध्यान रखते थे। नियम भले नहीं हो लेकिन एक अघोषित परंपरा रही है कि चुनाव के समय केंद्रीय या राज्यों की एजेंसियां सत्तारूढ़ दल के विरोधी नेताओं को परेशान नहीं करती हैं। लेकिन पिछले 12 साल से सारी अघोषित परंपराएं और लोकलाज को समाप्त कर दिया गया है। चुनाव के बीच विरोधी पार्टियों के नेताओं के खिलाफ न सिर्फ छापे पड़ते हैं, बल्कि चुनाव लड़ रहे उम्मीदवारों को केंद्रीय एजेंसियां नोटिस देकर हाजिर होने के लिए कहती हैं। चुनाव प्रचार के बीच विपक्षी उम्मीदवार को पूछताछ के लिए बुलाया जाता है।

पश्चिम बंगाल में इस बार के चुनाव में तो ऐसी कई घटनाएं हो पहले तो ममता बनर्जी को चुनाव लड़ा रही चुनाव प्रबंधन की एजेंसी आईपैक के ऊपर ही छापा मारा गया। बाद में चुनाव प्रचार के बीच आईपैक के एक निदेशक को गिरफ्तार कर लिया गया। उस बीच तृणमूल कांग्रेस के पुराने बड़े नेता पार्थ चटर्जी के यहां ऐसे मामले में छापा मारा गया, जिस मामले में वे कई साल जेल काट चुके हैं। इसके बाद तृणमूल कांग्रेस के उम्मीदवार देबाशीस कुमार के यहां ईडी ने छापा मारा। चुनाव लड़ रहे उम्मीदवार के यहां छापा मारने के बाद एजेंसी ने उनको नोटिस देकर पूछताछ के लिए बुलाया। टीएमसी के एक और उम्मीदवार शोभन देव चटर्जी के ऑफिस पर भी छापा पड़ा। सोचें, ऐसे में कोई भी विपक्षी पार्टी कैसे चुनाव लड़ेगी और कैसे उसके लिए लेवल प्लेंइग फील्ड सुनिश्चित होगी! ऐसे किसी मामले में चुनाव आयोग कुछ नहीं कहता है। लेकिन अगर पश्चिम बंगाल की कोई एजेंसी किसी भाजपा उम्मीदवार के यहां छापा मार दे या पूछताछ का नोटिस भेज दे तो आयोग तुरंत सक्रिय हो जाएगा।


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