देश का पूरा विमर्श बदल गया

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दुनिया में इस समय चर्चा हो रही है कि पश्चिम एशिया का संकट कैसे दूर हो, तेल और गैस की सप्लाई कैसे सुचारू बने, होर्मुज की खाड़ी कैसे खुले, ऊर्जा सुरक्षा कैसे सुनिश्चित की जाए, महंगाई कैसे रोकी जाए खास कर खाने पीने की चीजों, उर्वरक, प्लास्टिक के उत्पाद, केमिकल और दवाओं आदि। लेकिन भारत में क्या चर्चा है, लोकसभा में कितनी सीटें बढ़ेंगी, महिलाओं को आरक्षण मिलेगा तो क्या बदलेगा, विधानसभाओं के आकार बढ़ाने होंगे, जनगणना के बिना परिसीमन होगा आदि आदि। इससे बात बचती है तो पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु के चुनाव की चर्चा होती है। इस बीच कई दिन से बिहार की चर्चा चल रही है। पहले अटकलें थीं कि कौन मुख्यमंत्री बनेगा और अब सम्राट चौधरी कैसे बने और क्या क्या काम उनको करना होगा। देश के प्रधानमंत्री का एक सूत्री कार्यक्रम देश को यह बताना है कि महिला शक्ति को बढ़ावा देना कितनी जरूरी है। वे 12 साल से शासन में हैं और दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी के सर्वोच्च नेता हैं लेकिन अपनी पार्टी में कभी महिलाओं को 33 फीसदी तो छोड़िए 10 फीसदी भी सीट देने का बेर में नहीं सोचे, लेकिन अब लेख लिख कर, चिट्ठी लिख कर, वीडियो संदेश जारी करके या भाषण देकर देश को बता रहे हैं कि उनकी सरकार कितना बड़ा काम करने जा रही है।

इस सारे राजनीतिक विमर्श के बीच देश की असली समस्या पर कहीं चर्चा नहीं हो रही है। 28 फरवरी को पश्चिम एशिया में जंग छिड़ने के बाद देश में जो स्थिति बनी थी उसमें कोई बदलाव नहीं आया है। लेकिन माहौल ऐसा बनाया गया है, जैसे भारत में सब कुछ सामान्य हो गया। कुछ भी सामान्य नहीं हुआ है। दिल्ली में रसोई गैस के सिलेंडर की ब्लैक मार्केटिंग वैसे ही हो रही है, जैसे मार्च के पहले हफ्ते में हो रही थी, बल्कि अब रेट बढ़ गए हैं। अब पांच हजार रुपए का सिलेंडर मिल रहा है। लोगों ने पीएनजी कनेक्शन के आवेदन थोक के भाव में किए हैं और कंपनी कछुआ चाल से काम कर रही है। मजदूरों का पलायन जारी है क्योंकि वे जहां काम करते हैं वहां कामकाज बंद हो गया है या कम हो गया है।

सोचें, उत्तर प्रदेश के नोएडा और ग्रेटर नोएडा में मजदूरों का गुस्सा फूटा तो उसका तात्कालिक कारण क्या था? मजदूर कह रहे थे कि महंगा सिलेंडर मिल रहा है और खाना पीना बहुत महंगा हो गया है। यह युद्ध के कारण है। गुजरात के सूरत से लेकर पश्चिम उत्तर प्रदेश के फिरोजाबाद और मुरादाबाद तक छोटी छोटी फैक्टरियां बंद हुई हैं तो खुल नहीं रही हैं। नई ईकाइयों में काम मंदा हो रहा है। निर्यात आधारित फैक्टरियों का उत्पादन कम हो गया है। शेयर बाजार से लेकर सोने, चांदी और रुपए के बाजार में घनघोर मंदी है। लेकिन इन सब बातों पर से फोकस हट गया है। अब सिर्फ महिला आरक्षण, परिसीमन और चुनाव की चर्चा है। अगले तीन दिन तो संसद का सत्र भी चलेगा तो जरूरी मुद्दों की और भी चर्चा नहीं होगी। सरकार ने ऊर्जा सुरक्षा और रोजगार की बजाय परिसीमन और महिला आरक्षण को अभी सबसे जरूरी मुद्दा बना दिया है। इसके दो फायदे हैं। पहला तो यह कि दुनिया के सबसे बड़े संकट से ध्यान हट गया है और दूसरा दो बड़े राज्यों के चुनाव में कुछ फायदा हो सकता है। बाकी यह काम तो 2029 की योजना के तहत किया जा रहा है।


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