हिमाचल प्रदेश के विधानसभा चुनाव में एक साल से थोड़ा ज्यादा समय बचा है। अगले साल के अंत में गुजरात के साथ हिमाचल में चुनाव होगा। भाजपा की ओर से चुनाव में प्रो इन्कम्बैंसी को स्थापित कर देने के समय में भी राजस्थान के साथ साथ हिमाचल प्रदेश ऐसे गिने चुने राज्यों में है, जहां अब भी पांच साल में सत्ता बदलती है। हिमाचल में पिछली बार भाजपा अपनी सरकार नहीं बचा पाई थी। यह भी एक तथ्य है कि भाजपा जहां सरकार बनाती है वहां उसके दोबारा जीतने के चांस बहुत ज्यादा होते हैं लेकिन कांग्रेस कही भीं दोबारा नहीं जीतती है। सवाल है कि क्या सुखविंदर सिंह सुक्खू इस जिंक्स को तोड़ेंगे? यह सवाल इसलिए उठ रहा है क्योंकि कांग्रेस उनको लेकर बहुत भरोसे में है और पार्टी के नेता मान रहे हैं कि वे सर्वाइवर हैं।
उनका संघर्ष पहले दिन से चल रहा है। वीरभद्र सिंह के परिवार के भारी दबाव के बावजूद वे मुख्यमंत्री बने। उसके तुरंत बाद राज्य में प्राकृतिक आपदा आई, जिसमें 10 हजार करोड़ रुपए से ज्यादा का नुकसान हुआ। उन्होंने इस मुश्किल को पार किया। मुख्यमत्री बनने के दो साल पूरे होने से पहले ही पार्टी में बगावत हुई औऱ 2024 के राज्यसभा चुनाव में पार्टी के छह विधायकों ने पाला बदल कर भाजपा के उम्मीदवार हर्ष महाजन को वोट कर दिया, जिसकी वजह से अभिषेक सिंघवी चुनाव हारे। लेकिन छह सीटों पर हुए उपचुनाव में बड़ी जीत हासिल करके उन्होंने फिर से अपनी पार्टी का मजबूत बहुमत बनाया। राज्य पर कर्ज का भारी बोझ है और उनको कर्मचारियों के वेतन देने में मुश्किल आ रही है। उन्होंने इसको भी पार किया है। सात राज्यों के बीच हाल में हुए किशाऊ बांध समझौते ने उनको नई ताकत दी है। इस परियोजना में बिना कोई पैसा दिए हिमाचल प्रदेश सबसे बड़ा लाभार्थी बना है। सुक्खू ने अभी से चुनावी राजनीति को साधना शुरू कर दिया है। वे दूरदराज के इलाकों के लिए योजनाएं बना रहे हैं और वंचितों, दलितों पर फोकस कर रहे हैं।
