जिस तरह जीएसटी के बावजूद अनेक किस्म के कर लोगों को चुकाने होते हैं क्या वैसे ही यूसीसी के बावजूद कई तरह के निजी कानून चलते रहेंगे? एसटी के अलावा दूसरी जातियों को भी यूसीसी के दायरे से बाहर रखने की तैयारी चल रही है। गौरतलब है कि नरेंद्र मोदी सरकार ने वस्तु व सेवा कर यानी जीएसटी को ‘एक देश, एक कर’ के रूप में प्रचारित किया और इसे आजाद भारत का सबसे बड़ा क्षण बनाने के लिए आधी रात को संसद का सत्र बुला कर सेंट्रल हॉल में साझा सत्र में इसे कानून बनाया। लेकिन क्या यह सचमुच ‘एक देश, एक कर’ का प्रतीक है? यह सवाल इसलिए है क्योंकि अब भी आयकर और जीएसटी के अलावा दस तरह के कर लोगों को देने पड़ रहे हैं। हाल ही में सरकार ने यूपीआई पर भी एक कर लगाया है। टोल टैक्स अलग है और पेट्रोल व शराब पर लगने वाला कर अलग है। सीमा शुल्क भी लगता ही है। करों और शुल्कों के अलावा कई उपकर और दूसरी चीजें भी हैं। खुद जीएसटी के इतने स्लैब हैं कि लोग उसी में कंफ्यूज हुए रहते हैं। इसी तरह से ‘एक देश, एक कानून’ के तौर पर यूसीसी यानी समान नागरिक संहिता को प्रचारित किया जा रहा है। हालांकि ऐस लग रहा है कि इसका भी हस्र जीएसटी वाला ही होगा।
सबसे पहले उत्तराखंड में यह कानून बना और लागू हुआ। जस्टिस रंजना प्रकाश देसाई की कमेटी की सिफारिशों के आधार पर कानून बना। अब उत्तराखंड का कानून पूरे देश में टेम्पलेट के तौर पर इस्तेमाल किया जा रहा है। उत्तराखंड में कानून बना तो अनुसूचित जनजाति यानी एसटी को इससे बाहर रखा गया। इसके बाद केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने ऐलान किया कि कहीं भी अनुसूचित जनजाति को इस कानून के दायरे में नहीं लाया जाएगा। यानी देश के नागरिकों के एक बड़े समूह पर यूसीसी लागू होगा, जबकि करीब आठ फीसदी आबादी वाले एसटी समुदाय पर अलग कानून लागू होगा। अभी तक यूसीसी में एसटी को छूट दिया गया था लेकिन अब छूट देने का दायरा बढ़ रहा है। दूसरी जातियों को भी कानून के दायरे से बाहर रखने की घोषणाएं हो रही हैं।
पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने ऐलान किया है कि उनके राज्य में एसटी समुदाय के अलावा कुड़मी जाति को भी यूसीसी के दायरे से बाहर रखा जाएगा। गौरतलब है कि पश्चिम बंगाल के दक्षिणी हिस्से में और खास कर झारखंड से सटे पुरुलिया आदि के इलाके में बड़ी कुड़मी आबादी है, जो अपने को एसटी समुदाय में शामिल करने की मांग करती रहती है। कोई भी सरकार कुड़मी या कुर्मी को एसटी में शामिल करने की हिम्मत नहीं कर पा रही है। लेकिन शुभेंदु अधिकारी की सरकार ने कुड़मी को एसटी की ही तरह यूसीसी से बाहर रखने का ऐलान कर दिया है। यह उनको एसटी का दर्जा देने की दिशा में उठा पहला कदम है। उसका अपना अलग असर होगा। लेकिन एक बार कुड़मी को यूसीसी से बाहर रखने का नियम बना तो फिर हर राज्य में इस तरह से किसी न किसी जाति को अलग करने की मांग उठेगी। झारखंड में भी कुड़मी बरसों से एसटी का दर्जा मांग रहे हैं। अगर कभी झारखंड में भाजपा की सरकार बनी तो वहां भी कुड़मी को अलग रखना होगा। पश्चिम बंगाल सरकार के फैसले से पंडोरा बॉक्स खुल जाएगा। कई राज्यों में कई अति पिछड़ी जातियां एससी या एसटी में शामिल होने की नांग कर रही हैं। वे भी इस तरह की छूट मांगेंगी। अगर हर राज्य में 10 फीसदी या उससे ज्यादा आबादी यूसीसी से बाहर हो गई तो फिर ‘एक देश, एक कानून’ के सिद्धांत का क्या मतलब रह जाएगा?
