यह सिर्फ हाई टेक संस्थानों की समस्या नहीं है। वहां माहौल से तालमेल बनाने की चुनौती जरूर एक कारण है, मगर आम अवसरहीनता के कारण बढ़ते दबाव पर भी अवश्य ध्यान टिका रहना चाहिए।
आईआईटी- बॉम्बे ने डीन (प्रशासनिक मामले) को हटा कर और अपनी आरंभिक टिप्पणी के लिए माफी मांग कर बी-टेक छात्र साहिल वाकोडे की कथित आत्म-हत्या से भड़के विवाद को शांत करने की पहल की है। मुमकिन है कि इससे छात्रों का गुस्सा फिलहाल शांत हो जाए। फिर भी ये प्रश्न अनुत्तरित रहेगा कि आखिर छात्र आत्म-हत्याओं के मामले क्यों तेजी से बढ़े हैं? सिर्फ ऊंचे टेक्नोलॉजी संस्थानों की बात करें, तो आईआईटी- बॉम्बे में इस वर्ष छात्र आत्म-हत्या की यह तीसरी घटना है। बीते महीने आईआईटी- दिल्ली में एक छात्र ने आत्महत्या की। आईआईटी- कानपुर में दो साल में आठ छात्र ऐसा कर चुके हैं। बेंगलुरु स्थित भारतीय विज्ञान संस्थान में बीते महीने दो छात्रों की संदिग्ध मौत हुई। इस महीने आईआईटी- मंडी में एक पीएचडी छात्र का शव मिला था। आईआईटी खड़गपुर में इस साल चार छात्रों ने आत्म-हत्या की है।
जब लगातार ऐसी घटनाएं हों, तो चुनौती कारणों की जड़ तक जाने की होती है। पिछले साल सुप्रीम कोर्ट ने भी ये जरूरत समझी। उसने एक टास्क फोर्स बनाया, जिसकी अंतरिम रिपोर्ट में कुछ वजहों का जिक्र हुआ है। उनमें उच्च संस्थानों में मौजूद कथित ‘वाइब्स चेक’ के माहौल का उल्लेख महत्त्वपूर्ण है। यानी वंचित तबकों से आए छात्रों का आसपास होना संपन्न परिवारों से आए छात्रों को खराब अहसास देता है। इस कारण कमजोर पृष्ठभूमि से आए छात्र बहिष्कार, अलगाव, और अपमानजनक स्थितियों का शिकार होने लगते हैँ। रिपोर्ट के मुताबिक 2018-23 के बीच 13,600 से ज्यादा वंचित समुदायों के छात्रों ने प्रमुख संस्थानों में पढ़ाई बीच में छोड़ दी।
बहरहाल, इस परिघटना को भारतीय शिक्षा की व्यापक परिस्थितियों के संदर्भ में ही देखा जाना चाहिए। एनसीआरबी के आंकड़ों के मुताबिक 2024 में 14,488 छात्रों ने आत्महत्या की। हायर सेकंडरी और कॉलेज स्तर पर ड्राप आउट करने वाले छात्रों का ऊंचा अनुपात बना हुआ है। अतः यह सिर्फ हाई टेक संस्थानों की समस्या नहीं है। ना ही इसे सिर्फ जातिवाद के कथानक से समझा जा सकता है। माहौल से तालमेल बनाने की चुनौती जरूर एक कारण है, मगर आम अवसरहीनता के कारण बढ़ते दबाव पर भी अवश्य ध्यान टिका रहना चाहिए।
