पी4एम असल में क्या करेगा? पहली नजर में यह ट्रंप-कालीन अमेरिका के ठुकराए देशों का संवाद मंच नजर आता है। यानी यह नकारात्मक कारणों से हुई पहल है। ऐसे में क्या सहयोग का कोई एजेंडा तय हो पाएगा?
भारत ने यह फैसला लेने में खासी फुर्ती दिखाई। उसने यूरोपीय संघ, कनाडा, ब्राज़ील, और केन्या की ‘बहुपक्षीयता के लिए सहभागिता’ पहल का हिस्सा बनने का निर्णय लिया है। सोमवार को एक ब्रिटिश अखबार में लिखे लेख के जरिए यूरोपियन काउंसिल के प्रमुख एंतोनियो कोस्ता, कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी, ब्राजील के राष्ट्रपति लुइज इनेसियो लूला दा सिल्वा, और केन्या के राष्ट्रपति विलियम रुटो ने ‘पार्टनर्स फॉर मल्टीलेटरलिज़्म’ (पी4एम) पहल की घोषणा की। उन्होंने संयुक्त राष्ट्र महासभा के वर्तमान सत्र के दौरान न्यूयॉर्क में इसकी पहली बैठक करने का एलान भी किया। उसी शाम भारत ने कहा कि विदेश मंत्री जयशंकर पी4एम की पहली बैठक में हिस्सा लेंगे।
फाइनेंशियल टाइम्स में छपे साझा लेख के मुताबिक प्रस्तावित समूह का मकसद संयुक्त राष्ट्र के तहत ऐसी अधिक प्रातिनिधिक व्यवस्था की मांग करना है, जो आज की वैश्विक चुनौतियों का प्रभावी ढंग से सामना कर सके। नए समूह की राय है कि विश्व-व्यवस्था को केवल महाशक्तियों की राजनीति तक सीमित नहीं रहना चाहिए। इस पहल की पृष्ठभूमि में संभवतः मार्क कार्नी का वो विचार है, जो उन्होंने वर्ल्ड इकॉनोमिक फोरम के पिछले डावोस सम्मेलन में जताया था। वहां उन्होंने बड़ी ताकतों के बीच बढ़ते टकराव के बीच मध्यम दर्जे की शक्तियों के बीच तालमेल की जरूरत बताई थी। बेशक बड़ी ताकतों से उनका मतलब अमेरिका और चीन से था। चीन का दर्जा सचमुच महाशक्ति का है या नहीं, यह अभी विवादास्पद है।
बहरहाल, मुद्दा यह है कि पी4एम असल में क्या करेगा? सरसरी तौर पर यह ट्रंप-कालीन अमेरिका के ठुकराए देशों का संवाद मंच नजर आता है। आंशिक रूप से ब्राजील को छोड़ दें, तो स्पष्टतः ये पहल उन पक्षों की तरफ से की गई है, जो अमेरिका के नेतृत्व में लामबंद रहे हैं। अभी भी उनका स्वाभाविक चयन वही स्थिति होगी। इस रूप में यह नकारात्मक कारणों से सामने आई पहल है। इन हालात में सहयोग का कोई ठोस एजेंडा तय करना आसान नहीं होता है। बहरहाल, यह संभव है कि साझा ताकत दिखा कर ये देश ट्रंपीय अमेरिका से सौदेबाजी की कोशिश करें। हालांकि उसके सफल होने की कम ही गुंजाइश रहेगी।
