राजनीतिक विश्लेषक बेवजह बिहार, झारखंड या उत्तर भारत की गोबरपट्टी के राज्यों की आलोचना करते हैं कि वहां पैसे बांट कर चुनाव जीता जाता है। लोग गरीब हैं इसलिए सरकारें ‘मुफ्त की रेवड़ी’ बांट कर चुनाव जीत जाती हैं। असल में चुनाव जीतने का यह फॉर्मूला यूनिवर्सल हो गया है। विकसित राज्य भी इसका ही सहारा ले रहे हैं। महाराष्ट्र के बाद अब सबसे ज्यादा जीडीपी वाले राज्यों में से एक तमिलनाडु में भी यही तरीका आजमाया जा रहा है। वैसे तमिलनाडु में पहले से पैसे बांट कर वोट लिए जाते थे। लेकिन तब पार्टियां लोगों को चोरी छिपे नकद पैसे देती थीं और सरकारें वॉशिंग मशीन से लेकर मंगलसूत्र तक बांटती थीं।
इस बार के विधानसभा चुनाव से पहले राज्य की एमके स्टालिन सरकार ने सवा करोड़ महिलाओं के खाते में पांच पांच हजार रुपए डाल दिए। बिहार में तो महिलाओं के खाते में दस दस हजार रुपए डाले गए तो कम से कम यह कहा गया कि वे किसी उद्यम की योजना बना कर सरकार को पेश करें। तमिलनाडु में तो कुछ नहीं कहा गया। सीधे पैसे दे दिए गए। इसके बाद मुख्य विपक्षी पार्टी अन्ना डीएमके की ओर से चुनावी वादों की घोषणा हुई तो पार्टी के नेता ई पलानीस्वामी ने कहा कि सरकार बनी तो हर महिला के खाते में दस हजार रुपए भेजे जाएंगे। चुनाव की घोषणा तक और उसके बाद भी वहां और भी बहुत कुछ बांटे जाने की घोषणा होगी।
