विपक्ष की फूट का लाभ सरकार को

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संसद के बजट सत्र का दूसरा चरण नौ मार्च से शुरू होगा और पहले ही दिन स्पीकर ओम बिरला के खिलाफ लाए गए विपक्ष के अविश्वास प्रस्ताव पर चर्चा होगी। उसी दिन शाम तक उस पर वोटिंग भी हो जाएगी। विपक्ष का प्रस्ताव सदन के पटल पर अमान्य कर दिया जाएगा, इसमें किसी को संदेह नहीं है। फिर भी इसे लेकर संशय है या कयास लगाए जा रहे हैं तो वह इस कारण से कि क्या विपक्षी पार्टियां एकजुट होकर इस प्रस्ताव का समर्थन करेंगी? गौरतलब है कि विपक्ष में इस प्रस्ताव को लेकर एक राय नहीं थी। तभी ममता बनर्जी की पार्टी तृणमूल कांग्रेस ने इस पर दस्तखत नहीं किया। पार्टी के नेता अभिषेक बनर्जी ने कहा कि सीधे अविश्वास प्रस्ताव लाने से पहले स्पीकर को थोड़ा समय देना चाहिए। वे चाहते थे कि विपक्ष स्पीकर को अपने कामकाज की शैली बदलने का थोड़ा और मौका दे उसके बाद अविश्वास प्रस्ताव पेश करे।

जानकार सूत्रों का कहना है कि समाजवादी पार्टी में भी इस बात पर एक राय नहीं थी कि स्पीकर के खिलाफ विवाद को इस हद तक ले जाया जाए। हालांकि समाजवादी पार्टी के सांसदों ने प्रस्ताव पर दस्तखत किया लेकिन वह कांग्रेस के दबाव में किया गया। गौरतलब है कि स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पर न तो राहुल गांधी के दस्तखत हैं और न अखिलेश यादव के दस्तखत हैं। सोचें, लोकसभा में विपक्ष की सबसे बड़ी पार्टी कांग्रेस के नेता राहुल गांधी उनका दस्तखत नहीं है, दूसरी सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी समाजवादी पार्टी है तो उसके भी नेता अखिलेश यादव का दस्तखत नहीं है और तीसरी सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी तृणमूल कांग्रेस तो उसके भी नेता अभिषेक बनर्जी के दस्तखत नहीं हैं। क्या यह संयोग है कि लोकसभा में विपक्ष की तीन सबसे बड़ी पार्टियों के नेताओं ने स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पर दस्तखत नहीं किया?

बहरहाल, प्रस्ताव पेश होने और उसे स्वीकार किए जाने और चर्चा के लिए दिन तय हो जाने के बाद भी विपक्षी पार्टियों के अंदर इसे लेकर कोई उत्साह या तैयारी नहीं है। ध्यान रहे लोकसभा में सत्तारूढ़ एनडीए के सांसदों की संख्या 293 है यानी बहुमत से 21 ज्यादा। विपक्षी गठबंधन ‘इंडिया’ ब्लॉक के सांसदों की संख्या 204 है और ममता बनर्जी की पार्टी के 29 सांसद हैं। इस तरह आधिकारिक विपक्ष 233 सदस्यों का है। इनके अलावा 17 और सांसद हैं, जो किसी भी गठबंधन के साथ नहीं हैं। उसमें ओवैसी की एमआईएम, चंद्रशेखर राव की बीआरएस, जगन मोहन रेड्डी की वाईएसआर कांग्रेस के सांसद और कुछ अन्य सांसद भी हैं।

जानकार सूत्रों का कहना है कि सरकार अपने 293 सांसदों के भरोसे नहीं रहेगी क्योंकि उसमें भाजपा के अपने 240 ही सांसद हैं। इसलिए कुछ अन्य पार्टियों से संपर्क किया जा रहा है। भाजपा के संसदीय प्रबंधकों की योजना इस मामले में कांग्रेस को अलग थलग करने की है। दिल्ली में एआई समिट में कांग्रेस के प्रदर्शन के बाद जिस तरह से सपा, तृणमूल, उद्धव ठाकरे की शिव सेना ने कांग्रेस का विरोध किया उससे उत्साहित सरकार इनमें और फूट डालने के प्रयास करेगी। बताया जा रहा है कि अन्य के 17 सांसदों में से ज्यादातर का समर्थन या तो सरकार को मिलेगा या वे गैरहाजिर होंगे। ‘इंडिया’ ब्लॉक के घटक दलों में तृणमूल कांग्रेस का गैरहाजिर होना पक्का बताया जा रहा है। उसके अलावा सपा और शरद पवार की एनसीपी के भी कुछ लोग गैरहाजिर हो जाएं तो हैरानी नहीं होगी। उद्धव ठाकरे की शिव सेना के भी सारे सांसद शायद ही अविश्वास प्रस्ताव के पक्ष में वोट करें। भाजपा की कोशिश समर्थन की संख्या दो सौ से नीचे लाने की है।


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