कारण जो हो, साहब का विदेशियों के प्रति प्रेमिल झुकाव, और देसियों के प्रति रूखा बर्ताव बेढब है। फिर, बार-बार सीमित अंदाज, ऊँचे, हवाई दावे, वैज्ञानिकों विशेषज्ञों जैसे ऑडियेंस में भी घिसे-पिटे मुहावरे, उपदेश, आदि उन की समझ का भी सीमित दायरा दिखाता है। ऊँचे पद से वह थोड़ा ढँका जरूर रहा, पर छिपा नहीं है।
विदेशी नेताओं के साथ साहब के बेतकल्लुफ, याराना, गले-लिपट जैसे व्यवहार का इधर सोशल मीडिया में मजाक बना। इंदौर में एक कलाकार ने उसी अंदाज में राहुल गाँधी के गले से लिपट कर, नाटकीय हँस कर, राहुल की पीठ खूब थपथपाकर, आदि से उस का प्रदर्शन किया। साथ ही, उस ने ऑडियेंस में मानो किसी को देख ‘माँ को बिठाओ’ कहने का भी प्रहसन किया। आम सभाओं में साहब अक्सर किसी बच्चे, बूढ़े या बूढ़ी को नोटिस कर मानो ध्यान दिलाते हैं कि उन के लिए बच्चे-बुजुर्ग भी प्रेम दिखाने आते रहते हैं!
मंच पर उन दोनों भंगिमाओं से तमाम उपस्थित लोग बिना बताए समझ गये कि किस की नकल हो रही है। वह इतना चर्चित हुआ कि अनेक केंद्रीय भाजपा नेताओं ने उस की निन्दा की। जबकि कलाकार ने साहब का नाम भी नहीं लिया था! सो ‘वह बात जिस का सारे फसाने में कहीं जिक्र न था’, वह भाजपा नेताओं को नागवार गुजरी। उन की नाराजगी से प्रहसन और चर्चित हुआ।
किन्तु प्रहसन सटीक था। यह दोनों स्थितियाँ — आए दिन विदेशी नेताओं के गले लटकना, और अपने को सबका चहेता बताना — इतनी बार देखी जा चुकी है कि लोग बोर हो गये हैं। एक तरह से यह लोगों की समझ का अपमान है कि वे इस का बनावटीपन नहीं समझे हैं।
फिर विदेशियों के साथ वह जबरन यारी दिखाना देश की छवि गिराता है। आखिर यूरोपीय, अमेरिकी नेता स्वयं गले नहीं चिपटते। वे प्रायः हाथ मिलाते और संयत रहते हैं। पर अपने साहब विदेशियों से बेतकल्लुफ दिखने को उतावले नजर आते हैं।
यह इसलिए भी शर्मनाक है क्योंकि यह उन का स्वभाव नहीं है। देसी बंधुओं के साथ साहब सीधे मुँह बात भी नहीं करते। किसी से मैत्री तो क्या, समान सहजता भी मुश्किल से बरतते हैं। दलीय सहयोगियों के प्रति उन का रूखा, मालिकाना सा व्यवहार दिखता है। मानो वे सब उनके हरकारे जैसे हों। अपनी भंगिमा ही नहीं, कई बार किसी को फटकारने, डपटने जैसे बयान देकर भी साहब ने दिखाया है कि वे किस को क्या समझते हैं!
यह दो विपरीत अदाएं बार-बार दिखना अच्छी एक्टिंग नहीं! साहब देसी-विदेशी, दोनों दर्शकों की संवेदना से अनजान लगते हैं। उन्हें आभास नहीं कि एक जगह असरानी दूसरी जगह गब्बर, बार-बार देखकर विदेशी और देसी दर्शक क्या सोचेंगे? यही कि एक्टर आत्ममुग्ध, अपने पर फिदा है! माने बैठा है कि एक ही एक्टिंग पर लोग सदैव ताली बजाएंगे।
इसी दुर्बलता पर इंदौर वाले प्रहसन ने ऊँगली रखी। लोग तुरत पहचान गये कि साहब की नकल हो रही है। क्योंकि उन्होंने वह मूल एक्टर द्वारा अभिनीत कई बार देखा हुआ है।
सो, बार-बार देश और विदेश में दो अंदाज दिखाने वाला एक्टर दुर्बल है। निरंतर ऐसा विपरीत व्यवहार दिखाना आत्महीनता भी लग सकती है। विदेशियों के सामने अपने को हीन बनाना कि उन से अपनी निकटता दिखाने के लिए वह मरा जा रहा है। उसी हीनता का दूसरा पहलू देशी लोगों के सामने ऐंठना है। मानो, उसे अपनी महत्ता का भरोसा नहीं! ऊँचे पद पर आकर भी उसे भीतर शंका है कि दूसरे उसे छोटा तो नहीं समझ रहे? इसलिए वह अतिगंभीर मुद्रा बनाकर अपनी महत्ता जताता है।
आखिर, दोनों अवसर औपचारिक, सार्वजनिक व्यवहार के हैं। देसी या विदेशी नेताओं के साथ, दोनों औपचारिक, आधिकारिक कार्यक्रम हैं। किसी को निजी कह कर सफाई देना कठिन है। अतः विदेशियों के साथ विगलित और देसियों के साथ रूखे, यह दोहरापन खटकता है। ऐसा व्यवहार सहज नहीं है।
क्या साहब को अपने पद, व्यक्तित्व, और काम — किसी पर स्वयं विश्वास नहीं है? विदेशियों के सामने गदगद होने, ओर देसियों के सामने ऐंठने में बनावट झलकती है। फिर, साहब की भाषा — अक्सर इतनी खोखली कि हैरत होती है! आखिर ‘भारत की ए.आई. में भारतीयता होनी चाहिए’ कहने का क्या अर्थ हुआ?
कारण जो हो, साहब का विदेशियों के प्रति प्रेमिल झुकाव, और देसियों के प्रति रूखा बर्ताव बेढब है। फिर, बार-बार सीमित अंदाज, ऊँचे, हवाई दावे, वैज्ञानिकों विशेषज्ञों जैसे ऑडियेंस में भी घिसे-पिटे मुहावरे, उपदेश, आदि उन की समझ का भी सीमित दायरा दिखाता है। ऊँचे पद से वह थोड़ा ढँका जरूर रहा, पर छिपा नहीं है।
कैमरे के सामने भी वे प्रायः उचित व्यवहार दिखाने में विफल रहते हैं। वह कैसा एक्टर होगा, जिसे यह भी नहीं मालूम कि किन के सामने कैसी मुख-मुद्रा रखनी उचित है? अपने से आयु में बड़े, और उस पर उपकार करने वाले वरिष्ठ नेता, जो उसे सार्वजनिक मंच पर हाथ जोड़ कर प्रणाम कर रहे हों, उन्हें अनदेखा कर बढ़ जाने का क्या मतलब है? उस से किसे क्या संदेश मिला? यह तो नौसिखिया एक्टिंग लगती है।
यह तब साफ झलकता है जब वही एक्टर विदेशियों के साथ लंगोटिया सा दिखना चाहे। वह भी जिद करके। कभी उसे झूला झुलाकर, कभी उसे जबरन सीढ़ी पर साथ बैठा कर, कभी उस के साथ ताली बजाते हुए चक्कर काटकर, तो कभी उस की बाँह खींचकर, कभी उसे ‘तू’ कहकर, आदि। सब कुछ कैमरे के सामने। यह नाटक एकतरफा है, क्योंकि दूसरा पक्ष सपाट रहता है। शिष्टाचारवश लाचार-सा, कि चलो करने दो जो कर रहा है। कुछ देर की बात है।
ऐसे दृश्य बार-बार देख कर संवेदनशील भारतीय लज्जा महसूस करते हैं कि उन का नेता विदेशियों के सामने छोटा बन रहा है! पर एक्टर की बेपरवाही दिखाती है कि वह इस के परिणामों से अनजान है! यह इस से स्पष्ट है कि अनेकानेक वर्षों में भारत को विदेशी शक्तियों से कोई लाभ के बदले हानि उठाने के उदाहरण अधिक दिखते हैं। यूपीआई पर टैक्स उसी की नवीनतम कड़ी लगती है।
देश के अंदर भी हेकड़ी, परनिंदा, और आडंबर की बुरी परंपरा फैली है। विशेषकर शिक्षा-संस्कृति क्षेत्र में। हर संस्था, संगठन प्रमुख अपने को खामखा विशिष्ट, ऊँचा दिखने और उपलब्धि दिखाने के लिए उसी तरह नाटकीय, कृत्रिम उपाय करता नजर आता है। जो अनुपयुक्त लगता है। पर प्रमुख मानो ‘साधारण’ दिखने की आशंका से ग्रस्त है! सो, अपने उत्तरदायित्व और उचित काम के बदले नाटकीयता और बनावट पर निर्भर है। मुख्यतः अपनी कुर्सी की आयु बढ़ाने की फिराक में है।
यह प्रवृत्ति साहब की देखा-देखी भी है, जो सब के ‘मॉडल’ बताए जाते रहे हैं। आखिर जब वह सब कुछ अगला चुनाव जीतने की दृष्टि से तय करते हैं, तो वही प्रवृत्ति नीचे बढ़ना स्वाभाविक है। प्रायः सब का चयन भी उसी भावना में होता है कि ‘अपने’ आदमी हैं। काम की योग्यता, गुणवत्ता नहीं — बल्कि ‘अपने’ प्रति वफादारी!
इस से शिक्षा-संस्कृति क्षेत्र की हुई और हो रही हानि अपरिमेय है। शैक्षिक संस्थानों में जातिवादी जहर फैलाना और फैलने देना उसी भावना में है। लाभ उठाने वाले भी बखूबी जानते हैं कि यह किसी समूह की हित-चिंता नहीं, बल्कि केवल ताउम्र कुर्सीनशीनी का मंसूबा है।
सो, यह सब हर हाल में निराशाजनक है। किसी सुविचारित नीति के बदले ओछी मानसिकता दिखाता है। विदेशियों के सामने झुकना, और देसियों के सामने ऐंठना एक ही दुर्बलता के दो रूप हैं। साहब के सहयोगियों ने कथित चिंतन-बैठक में इस पर विचार किया या नहीं, किन्तु किसी को उन्हें बताने की जरूरत है कि उन की एक्टिंग प्रभावहीन हो चुकी है।
समय रहते बदलें, वरना फिल्म के पूरे कास्ट, ताम-झाम को हानि उठानी पड़ सकती है। पिछली फिल्में जिस चेहरे के बल पर चली थी, उस में अब चमक नहीं है। इस भ्रम में रहना बेकार है कि विकल्प क्या है? लोग जब चिढ़ जाते हैं तब सिर्फ यह देखते हैं कि चिढ़ाने वाले को कौन हरा सकता है।
वैसे भी, अगर इतनी लंबी अवधि तक साहब-राज के बावजूद प्रजा इस हाल है कि उसे अपने ही देश का कोई अन्य नेता हानि पहुँचा सके — तो यह साहब की नाकारा उपलब्धि का बयान है। वह कैसा जनहितैषी शासक होगा जो प्रजा का हित अपनी अमरता से जोड़ दे?
