विपक्ष से तृणमूल की दूरी चुनावी है

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ममता बनर्जी की पार्टी तृणमूल कांग्रेस ने दिल्ली में विपक्षी गठबंधन से दूरी दिखाई है। यह दूरी पश्चिम बंगाल चुनाव के कारण है। ऐसा नहीं है कि तृणमूल ने सिर्फ विपक्ष से दूरी दिखाई है, बल्कि उसने सरकार और भाजपा के साथ अपनी नजदीकी भी जाहिर कर दी है। पता नहीं भाजपा के रणनीतिकारों ने इसका अनुमान लगाया था या नहीं लेकिन लोकसभा स्पीकर ओम बिरला के खिलाफ विपक्ष के महाभियोग का समर्थन नहीं करके तृणमूल ने एक तीर से दो शिकार किए हैं। एक तो उसने साफ कर दिया है कि कांग्रेस और लेफ्ट की राजनीति से उसका सरोकार नहीं है। दूसरे उसने यह मैसेज भी बनवाया है कि किसी न किसी स्तर पर भाजपा के शीर्ष नेतृत्व के साथ ममता बनर्जी का सद्भाव है। यह बात बहुत पहले से कही जाती है कि ममता बनर्जी को भाजपा के शीर्ष नेतृत्व की ओर से ढील मिलती है और बदले में वे कांग्रेस को निपटाने वाले काम करती हैं। इस बार के चुनावों में भी ममता बनर्जी की पार्टी असम और केरल में कांग्रेस को नुकसान पहुंचाने वाली राजनीति कर ही रही है। ताजा घटनाक्रम के बाद इसमें तेजी आएगी।

तृणमूल के जानकार नेताओं का कहना है कि ओम बिरला के खिलाफ विपक्ष के महाभियोग प्रस्ताव पर तृणमूल नेताओं के दस्तखत नहीं करने का कारण भले अभिषेक बनर्जी ने यह बताया हो कि वे पहले स्पीकर को कुछ समय देने के पक्ष में थे। लेकिन असली कारण राजनीतिक है। ममता बनर्जी को केंद्र सरकार की ओर से बहुत ढील मिली हुई है। राजनीतिक लड़ाई अपनी जगह है और मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर का मामला भी अपनी जगह है। लेकिन ममता बनर्जी ने ईडी के अधिकारियों के साथ जो किया उसके बाद भी उनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं होना इस बात का संकेत है कि ऊपर से उनके प्रति सद्भाव है। ममता बनर्जी ने ईडी के छापे की कार्रवाई में दखल दिया और जब्त किए गए सामान भी कथित तौर पर छीन कर ले गईं। लेकिन उनका कुछ नहीं बिगड़ा। यहां तक कहा जा रहा था कि केंद्र सरकार राष्ट्रपति शासन लगा सकती है। ममता बनर्जी के प्रति सद्भाव यही तक खत्म नहीं होता है। उन्होंने बजट पेश किया तो उससे पहले दूसरे राज्यों की तरह राज्यपाल सीवी आनंद बोस ने सरकार का लिखा अभिभाषण पढ़ने में कोई हिचक नहीं दिखाई। राज्यपाल ने अभिभाषण पढ़ा, जिसमें राज्य सरकार की तारीफ थी और केंद्र सरकार की आलोचना। उन्होंने राज्य सरकार के किए कामों की गिनती कराई। सोचें, कर्नाटक, केरल और तमिलनाडु में राज्यपाल ने अभिभाषण ही नहीं पढ़ा।

भाजपा के प्रति सद्भाव की इन बातों के अलावा तृणमूल के इस दांव में चुनावी राजनीति के भी कुछ दांवपेंच हैं। जैसे ममता बनर्जी को इस बार बंगाली बोलने वाले हिंदुओं के वोट की चिंता है। उनको भी यह मैसेज दिया गया है कि ममता का भाजपा के ऊपर के नेताओं से ठीक है। यानी बांग्लाभाषी हिंदुओं को तृणमूल का साथ छोड़ने की जरुरत नहीं है। ध्यान रहे ममता पिछले कुछ समय से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर हमले नहीं कर रही हैं। गृह मंत्री जरूर उनके निशाने पर हैं। मोदी पर चुप्पी का अर्थ यह भी है कि वे मोदी समर्थक मतदाताओं को भी साध रही हैं। इसी से जुड़ा एक बारीक दांव यह है कि स्पीकर ओम बिरला राजस्थान के हैं, जहां के व्यापारियों का बड़ा वर्ग कोलकाता और पश्चिम बंगाल के अलग अलग हिस्सों में बहुत मजबूत स्थिति में है। मारवाड़ी कारोबारियों का समूह बंगाल की राजनीति को बहुत प्रभावित करता है। ओम बिरला के खिलाफ महाभियोग का समर्थन नहीं करने से इस समूह में ममता के प्रति सद्भाव बनेगा।


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