यह सवाल इसलिए है क्योंकि जनगणना का मामला सुप्रीम कोर्ट में पहुंचा है। एक याचिका दायर की गई है, जिसमें कहा गया है कि जाति जनगणना के लिए जाति प्रमाणपत्र या जाति को प्रमाणित करने वाला कोई एक प्रमाणपत्र अनिवार्य किया जाना चाहिए। याचिका में कहा गया है कि जाति गणना के लिए सेल्फ डिक्लरेशन पर्याप्त नहीं है। इससे कुछ जातियों के आंकड़े असाधारण रूप से ज्यादा हो सकते हैं और कुछ के कम हो सकते हैं। इसलिए ऑनलाइन जनगणना फॉर्म भरने के समय भी कोई दस्तावेज अनिवार्य किया जाना चाहिए। अगर कोई दस्तावेज अनिवार्य किया जाता है तो उसमें निर्धारित से ज्यादा समय लगेगा।
बहरहाल, सुप्रीम कोर्ट ने इस याचिका में उठाए गए बिंदुओं से सहमति जताई है। इतना ही नहीं सर्वोच्च अदालत ने याचिकाकर्ता आकाश गोयल की तारीफ की है कि उन्होंने यह मुद्दा उठाया और अदालत का ध्यान इस ओर खींचा। चीफ जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की बेंच ने इस मामले की सुनवाई की और याचिका में उठाए गए बिंदुओं से सैद्धांतिक सहमति जताई। अदालत को भी लग रहा है कि अगर कोई दस्तावेज अनिवार्य नहीं किया गया तो संतुलन बिगड़ सकता है। हालांकि अभी अदालत ने मामला जनगणना करने वाली संस्था के ऊपर इसे छोड़ा है कि वे इस चिंता का क्या हल निकालते हैं। लेकिन इसमें कोई संदेह नहीं है कि अगर कोई प्रमाणपत्र नहीं लिया जाएगा तो आंकड़ों की शुद्धता की गारंटी नहीं हो सकेगी।
