पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी चुनाव आयोग से भी राजनीतिक लड़ाई लड़ रही हैं। यह सही है कि बंगाल में चुनाव आयोग बाकी दूसरे राज्यों के मुकाबले ज्यादा मेहनत कर रहा है। ज्यादा लोगों को नोटिस जारी किए गए हैं। लॉजिकल डिस्क्रिपेंसीज के नाम पर जितने नोटिस बंगाल में दिए गए हैं उतने संभवतः कई प्रदेशों को मिला कर भी नहीं दिए गए हैं। इसी तरह चुनाव आयोग ने सिर्फ बंगाल में ही माइक्रो ऑब्जर्वर नियुक्त किए हैं। ममता बनर्जी का आरोप है कि ये माइक्रो ऑब्जर्वर सिर्फ देखरेख नहीं कर रहे हैं, बल्कि नाम काटने या हटाने में निर्णायक ऑथोरिटी की भूमिका निभा रहे हैं।
ममता बनर्जी ने मुख्य चुनाव आयुक्त से मिल कर ये शिकायतें की हैं। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में भी याचिका दायर की है। सो, यह तकनीकी और कानूनी मुद्दों की लड़ाई है लेकिन इसका मैसेज राजनीतिक है। उन्होंने चुनाव आयोग से मुलाकात के बाद जिस तरह के बयान दिए वह उनकी राजनीति के अनुकूल है। उन्होंने चुनाव आयोग को अहंकारी और झूठा बताया। जिस तरह से ममता बनर्जी ने नरेंद्र मोदी और अमित शाह को बाहरी बताया है उसी तरह वे चुनाव आयोग को भी बाहरी बता कर बंगाल के लोगों के अधिकार छीनने वाला बता रही हैं। यहां भी वे बाहरी और भीतरी का नैरेटिव चला रही हैं। वे बंगाल के लोगों को संदेश दे रही हैं कि उनको भाजपा के साथ साथ चुनाव आयोग से भी लड़ना है।
