पश्चिम बंगाल में प्रवर्तन निदेशालय यानी ईडी के छापे को लेकर खूब राजनीति हो रही है और विवाद भी बढ़ा हुआ है। ऐसा इसलिए हो रहा है क्योंकि पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री और भाजपा विरोधी तृणमूल कांग्रेस की नेता ममता बनर्जी दूसरी पार्टियों के नेताओं या मुख्यमंत्रियों से अलग हैं। वे जो होता वह होते देने रहने वाली नेता नहीं हैं। इसलिए उन्होंने प्रतिकार किया और सड़क पर उतर कर भी आंदोलन किया। उनकी पुलिस ने उनका साथ दिया और ईडी के अधिकारियों के खिलाफ ही कई मुकदमे दर्ज हो गए। लेकिन ऐसा नहीं है कि पहली बार ऐसा हुआ कि किसी राज्य में चुनाव होने वाला हो और ईडी वहां छापा मारे। यह पिछले कई बरसों से एक परंपरा बन गई है कि जिस राज्य में चुनाव होने वाला होता है वहां चुनाव से ठीक पहले ईडी छापा मारने पहुंच जाती है।
गौरतलब है कि पश्चिम बंगाल में भी छापा पांच साल पुराने मामले में मारा गया है। कोयला तस्करी के जिस मामले में छापेमारी हुई है वह 2020 का मामला है। उसकी एफआईआर 2020 में दर्ज की गई थी और छापा मारा गया 2026 के चुनाव से पहले। इसी तरह झारखंड में ईडी ने मुकदमा दर्ज किया अगस्त 2023 में और कार्रवाई की जनवरी 2024 में जब चुनाव नजदीक आए। उसी समय मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की गिरफ्तारी हुई। ऐसे ही दिल्ली में तत्कालीन मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की सरकार की शराब नीति को लेकर 2022 में मुकदमा दर्ज हुआ। उसके थोड़े दिन बाद तत्कालीन उप मुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया को गिरफ्तार किया गया। मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को 2024 में गिरफ्तार किया गया और 2025 की जनवरी में विधानसभा चुनाव होने वाले थे। महाराष्ट्र में भी 2024 के लोकसभा और विधानसभा चुनाव से पहले ईडी की कार्रवाई हुई थी। अंतर यह है कि बाकी राज्यों में नेता उतने लड़ाकू नहीं हैं, जितनी पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी हैं। इसलिए बंगाल का मामला राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में है और बांगाल में ममता ने इसे अपने पक्ष में इस्तेमाल कर लिया है।
