असम और केरल में क्या करेगी तृणमूल?

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राजनीति में आमतौर पर जो होता हुआ दिखता है वह असल में नहीं होता है और जो होता है वह पहले से दिखता नहीं है। तभी यह सवाल उठ रहा है कि क्या सचमुच ममता बनर्जी और नरेंद्र मोदी के बीच वैसी ही जंग चल रही है, जैसी चलती दिख रही है? दूसरा सवाल है कि क्या सचमुच ममता बनर्जी अपने राज्य के साथ साथ पूरे देश में भारतीय जनता पार्टी को रोकने के लिए प्रतिबद्ध हैं? पश्चिम बंगाल के बाहर की तृणमूल कांग्रेस की राजनीति को देखेंगे तो यह सवाल ज्यादा प्रासंगिक हो जाता है। अपने राज्य यानी बंगाल की राजनीति में तो वे भाजपा के खिलाफ खुल कर लड़ती हैं और सारे उपाय करती हैं, जिससे वे भाजपा को हरा सकें। लेकिन बंगाल के बाहर की उनकी सारी राजनीति कांग्रेस को कमजोर करने और भाजपा की मदद करने वाली होती है। चुनाव रणनीतिकार प्रशांत किशोर जिस समय ममता बनर्जी की पार्टी को चुनाव लड़वा रहे थे उस समय गोवा में तृणमूल ने कैसी राजनीति की उसे सबने देखा। मेघालय में तो ममता बनर्जी ने कांग्रेस पार्टी को तोड़ कर उसके लगभग विधायकों को अपनी पार्टी में शामिल करा लिया। कांग्रेस को उन्होंने इतना कमजोर कर दिया कि वह वहां लड़ने के लायक नहीं बची। मेघालय जैसी राजनीति उसी समय झारखंड में भी करने की कोशिश हुई थी लेकिन उसमें कामयाबी नहीं मिल सकी।

तभी ऐसा लगता है कि ममता बनर्जी की राजनीति बंगाल में भाजपा को रोकने की है और बंगाल के बाहर बाकी राज्यों में कांग्रेस को कमजोर करने की है, जिसका फायदा भाजपा और एनडीए को मिलता है। तीन महीने बाद होने वाले विधानसभा चुनाव में भी ममता बनर्जी ऐसी ही राजनीति करती दिख रही हैं। असम और केरल में उनकी पार्टी अकेले लड़ने की तैयारी में है, जिसका नुकसान कांग्रेस को होगा। कह सकते हैं कि इन राज्यों में ममता की पार्टी का कोई आधार नहीं है। आधार तो गोवा में भी नहीं था लेकिन 2022 के विधानसभा चुनाव में तृणमूल कांग्रेस को 5.2 फीसदी वोट मिले और कांग्रेस के 4.9 फीसदी कम हुए। सरल शब्दों में कहें तो ममता की पार्टी ने कांग्रेस का पांच फीसदी वोट काट लिया। उधर अरविंद केजरीवाल की पार्टी भी लड़ी और उसको करीब सात फीसदी वोट मिले। तब ममता और केजरीवाल में बड़ी दोस्ती थी। दोनों ने मिल कर गोवा में कांग्रेस को समाप्त कर दिया। आज तक कांग्रेस वहां उठ नहीं पाई है।

बहरहाल, असम में कांग्रेस के चुनाव की कमान गौरव गोगोई के हाथ में है और वे बहुत कायदे से चुनाव लड़ने की तैयारी रहे हैं। उन्होंने तैयारी के सिलसिले में ममता बनर्जी की पार्टी की राज्य की सबसे बड़ी नेता सुष्मिता देब से मुलाकात की है। सुष्मिता पहले कांग्रेस में रही हैं। अभी वे तृणमूल की सांसद हैं। अगर ममता बनर्जी भाजपा को रोकना चाहती हैं तो उनको कांग्रेस को बिना शर्त समर्थन करना चाहिए। परंतु वे ऐसा नहीं करेंगी। इसी तरह केरल में लेफ्ट का समर्थन करने वाले दो बार के विधायक पीवी अनवर अब तृणमूल कांग्रेस में शामिल हो गए हैं। उनके सहारे ममता बनर्जी केरल में भी कांग्रेस को नुकसान पहुंचाने की राजनीति करेंगी। असम में उनकी राजनीति का सीधा फायदा भाजपा को होगा। केरल में हो सकता है कि उनकी राजनीति भाजपा से ज्यादा सीपीएम को लाभ पहुंचा दे लेकिन उनको इसकी परवाह नहीं है। क्योंकि सीपीएम अब बंगाल में खड़ी नहीं हो सकती है। उनकी मुख्य उद्देश्य कांग्रेस को कमजोर करने का है। चाहे भाजपा और लेफ्ट मजबूत हो जाएं।


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