यूएई का डूबता मॉडल

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यूएई ने अमेरिका से डॉलर मुहैया कराने की मांग की है। कहा है कि ऐसा नहीं हुआ, तो वह चीनी मुद्रा में तेल बेचने को मजबूर हो जाएगा। ये घटना खाड़ी क्षेत्र में विकल्पों के तलाश का संकेत देती है।

पश्चिम एशिया में जारी लड़ाई ने खाड़ी क्षेत्र की चूलें हिला दी हैं। ईरान के हमलों से खाड़ी देशों में जितना भौतिक नुकसान हुआ, उससे कहीं ज्यादा उनके इस भरोसे को चोट पहुंची कि अमेरिकी सुरक्षा कवच में वे महफूज हैं। इस कारण कई देश भविष्य के विकल्पों पर विचार कर रहे हैं। इसकी सबसे ताजा मिसाल अमेरिकी अखबार वॉल स्ट्रीट जर्नल की ये खबर है कि यूएई ने अमेरिका से वित्तीय मदद मांगी है। यूएई के सेंट्रल बैंक के गवर्नर ने अमेरिकी वाणिज्य मंत्री स्कॉट बेसेंट को बताया कि युद्ध से अर्थव्यवस्था तथा वैश्विक वित्तीय केंद्र के रूप में यूएई की हैसियत के क्षतिग्रस्त हुई है।

इससे वे निवेशक भयभीत हैं, जो कभी निश्चिंत होकर वहां निवेश करते थे। नतीजतन, यूएई के पास डॉलर की कमी हो सकती है। वैसे हालात के लिए यूएई ने अमेरिका से स्वैप लाइन के तहत डॉलर मुहैया कराने की मांग की है। साथ ही कहा है कि अमेरिका ने ऐसा नहीं किया, तो यूएई चीनी मुद्रा युवान में तेल सहित अन्य सामग्रियों की बिक्री के लिए मजबूर हो जाएगा। यूएई के इजराइल और अमेरिका गहरे रिश्ते रहे हैं। इसी कारण वह ईरानी हमलों का सबसे अधिक शिकार हुआ। उससे वो मॉडल संदिग्ध हुआ है, जिस पर यूएई खड़ा था। तो उसने अपनी दुर्दशा की परोक्ष जिम्मेदारी अमेरिका पर डाली है और उससे भरपाई करने को कहा है। उधर सऊदी अरब का यह एलान भी महत्त्वपूर्ण है कि वह अपनी भूमि, वायु क्षेत्र या समुद्री क्षेत्र का उपयोग किसी भी ऐसे युद्ध के लिए अब नहीं होने देगा, जिसमें वह शामिल नहीं है।

सऊदी अरब ने अपने रक्षा समझौते तहत पाकिस्तान से लड़ाकू विमान और जमीनी फौज तैनात करने को कहा है। पाकिस्तानी सेना चीनी हथियारों और हार्डवेयर से लैस है। अतः सऊदी अरब के इस कदम के पीछे भी दूरगामी संकेत देखे गए हैं। कतर, बहरहीन और कुवैत में भी आत्म- समीक्षा के संकेत हैं। भारत के लिए ये घटनाएं खास अहम हैं। वहां के बदलाव का भारत पर गहरा असर होगा, क्योंकि वो इलाका ऊर्जा का प्रमुख स्रोत है, तथा वहां लाखों भारतीय कर्मी काम करते हैं।


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