ईमानदारी सबसे अच्छी नीति

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विपक्ष के एकजुट रहने का संदेश है कि जनमत की प्रतिक्रिया उभार कर निर्णायक दबाव बनाने की भाजपा क्षमता अब कमजोर पड़ रही है। मगर प्रधानमंत्री इससे बेखबर नजर आए। नतीजतन, राजनीतिक गतिरोध अब और बढ़ेगा।

अपने 12 साल के कार्यकाल की सबसे बड़ी विधायी पराजय का सामना करने के बाद नरेंद्र मोदी सरकार आत्म-निरीक्षण करे, तो वह विश्वास, पारदर्शिता, और साफ़गोई का महत्त्व बेहतर ढंग से समझ सकती है। मकसद परिसीमन था, तो उस पर महिला आरक्षण का मुलम्मा चढ़ाने क्या जरूरत थी? विपक्ष चकमा खा जाएगा या महिला विरोधी ना दिखने की जुगत में लोकसभा सदस्यों की संख्या में बढ़ोतरी को अपना समर्थन दे देगा, ऐसी सोच रखना अपनी बुद्धि पर अत्यधिक यकीन ही माना जाएगा।

दांव शायद भी था कि चूंकि उत्तर प्रदेश की लोकसभा सीटें सबसे ज्यादा बढ़ने वाली थीं, इसलिए समाजवादी पार्टी अपनी क्षेत्रीय गणना के तहत विपक्षी खेमे से टूट जाएगी। मगर ऐसी सोच साम-दाम- दंड-भेद के नजरिए को जाहिर करती हैं। अब साफ है कि ऐसे नजरिये के कामयाब होते रहने की समयसीमा होती है। बढ़ी आबादी को देखते हुए लोकसभा की सदस्य संख्या में बढ़ोतरी अतार्किक नहीं है। ना ही सैद्धांतिक दृष्टिकोण से जनसंख्या आधारित परिसीमन का विरोध किया जा सकता है। मगर मुद्दा वो संदर्भ है, जिसमें ये पहल की गई। भाजपा सरकार के व्यवहार एवं नीतियों से राजनीतिक वर्ग में गहरा अविश्वास पैदा हुआ है। संवाद के मंचों को खत्म करना, राज्यपालों के जरिए गैर-भाजपा सरकारों को परेशान करना, मजहब- भाषा आधारित विभाजक एजेंडे को हवा देना, विपक्षी नेताओं के खिलाफ केंद्रीय एजेंसियों के दुरुपयोग आदि जैसी अनेक प्रवृत्तियां हैं, जिनका साया लोकतंत्र के मूलभूत तकाजों पर पड़ा है।

इसका ताजा शिकार परिसीमन की विधायी पहल हुई। बेहतर होता राष्ट्र के नाम प्रसारण में विपक्ष को कोसने के बजाय प्रधानमंत्री इन प्रश्नों पर आत्म-मंथन करते दिखते। नरेंद्र मोदी इस बार विपक्ष के एकजुट रहने का संदेश समझने की कोशिश करते। संदेश यह है कि एजेंडा सेट करने और जनमत की प्रतिक्रिया उभार कर निर्णायक दबाव बनाने की भाजपा क्षमता अब कमजोर पड़ रही है। विपक्ष का आकलन संभवतः यह है कि इन तरीकों से भाजपा जितना ध्रुवीकरण कर सकती थी, कर चुकी। बहरहाल, प्रधानमंत्री इससे बेखर नजर आए। नतीजतन, गतिरोध और बढ़ेगा। आगे का रास्ता सिर्फ संवाद से संभव है। मगर उसके लिए कम-से-कम इतनी ईमानदारी जरूरी होगी, जिससे दूसरे पक्ष में भरोसा पैदा हो।


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