केरल में विधानसभा चुनाव से पहले लेफ्ट डेमोक्रेटिक मोर्चे में सब कुछ ठीक नहीं है। गठबंधन की दोनों मुख्य पार्टियों सीपीएम और सीपीआई के बीच तनाव बढ़ गया है। यह तनाव पहले से बना हुआ था। सीपीआई के नेता सरकार के कामकाज को लेकर सवाल उठा रहे थे। कुछ समय पहले ही नई शिक्षा नीति को लेकर दोनों में मतभेद हुआ था। सरकार का नेतृत्व कर रही सीपीएम ने केंद्र से फंड हासिल करने के लिए समझौते का संकेत दिया था, जिसका सीपीआई ने विरोध किया था। कई और मुद्दे थे, जिन पर पहले से तकरार थी। लेकिन स्थानीय निकाय चुनाव में लेफ्ट मोर्चे की हार ने तकरार बढ़ा दी है। दोनों पार्टियों के बीच एक दूसरे पर आरोप प्रत्यारोप का खेल शुरू हो गया है। माना जा रहा है कि सीपीआई गठबंधन में बेहतर डील के लिए दबाव बना रही है। हालांकि पहसे से चले आ रहे फॉर्मूले में कोई खास बदलाव होता नहीं है।
बहरहाल, स्थानीय निकाय चुनाव के बाद तनाव का पहला संकेत तब मिला, जब सीपीआई नेतृत्व ने पब्लिक अपील जारी कर दी। सीपीआई ने केरल के लोगों से कहा कि वे पार्टी को चिट्ठी लिख कर, ईमेल करके या किसी और माध्यम से बताएं कि लेफ्ट मोर्चे की हार का क्या कारण है। यह मामूली बात नहीं है कि आपस में बैठ कर चर्चा करने और हार के कारणों की समीक्षा करने की बजाय सीपीआई ने आम लोगों से अपील की। सीपीएम के नेता सवाल पूछ रहे हैं कि आम लोगों की सलाह का सीपीआई क्या करेगी? उससे सबक लेकर खुद लागू करेगी या समूचे गठबंधन को बताएगी? अभी यह विवाद चल ही रहा था कि सीपीआई के सांसद विनय विस्वम ने भी स्थानीय निकाय चुनावों के नतीजे पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि कई जगह भाजपा का जीतना गंभीर चिंता की बात बै। उनके कहने का अंदाज ऐसा था, जैसे भाजपा की जीत की जिम्मेदारी पिछले 10 साल से सरकार का नेतृत्व कर रही सीपीएम की हो। सीपीएम नेता इससे भी नाराज हुए हैं।
