यह लाख टके का सवाल है कि कांग्रेस पार्टी कर्नाटक के बारे में कब फैसला करेगी? यह सवाल इसलिए है क्योंकि कांग्रेस फैसला नहीं कर रही है और हर बार नेतृत्व परिवर्तन के सवाल को यह कह कर टाला जा रहा है कि कोई विवाद नहीं है। इसी तरह का विवाद छत्तीसगढ़ को लेकर हुआ था और उसका नतीजा सबके सामने है। कांग्रेस के तत्कालीन मुख्यमंत्री भूपेश बघेल और सरकार के वरिष्ठ मंत्री टीएस सिंहदेव के बीच उसी तरह का सत्ता संघर्ष चल रहा था, जैसा अभी कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया और उप मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार के बीच चल रहा है। छत्तीसगढ़ में भी पॉवर शेयरिंग फॉर्मूले की वजह से ही टकराव था। वहां भी सिंहदेव कह रहे थे कि उनको ढाई साल के बाद मुख्यमंत्री बनाने का वादा किया गया था। लेकिन मुख्यमंत्री बनने के बाद बघेल ने ढाई साल में पद छोड़ने के कथित फॉर्मूले को मानने से इनकार कर दिया था।
कर्नाटक में डीके शिवकुमार के समर्थक भी ऐसा ही दावा कर रहे हैं। उनका कहना है कि ढाई साल के बाद शिवकुमार को सीएम बनाने का फॉर्मूला तय हुआ था लेकिन सिद्धारमैया इनकार कर रहे हैं। सिद्धारमैया ने कहा है कि वे पूरे पांच साल तक मुख्यमंत्री बने रहेंगे। उन्होंने कहा कि वे पहली बार जब वित्त मंत्री बने तो अखबारों ने लिखा कि वे एक सौ भेड़ें भी नहीं गिन सकते हैं लेकिन उन्होंने 16 बजट पेश किए हैं और आगे भी बजट पेश करेंगे। उनके कार्यकाल पूरा करने वाले बयान पर शिवकुमार ने व्यंग्यात्मक लहजे में शुभकामना दी। ऐसा लग रहा है कि यह सत्ता संघर्ष अब निर्णायक दौर में पहुंच गया है। शिवकुमार इस बार दिल्ली पहुंचे तो उनके साथ उनके समर्थक विधायक भी थे। एन चेलुवरयस्वामी, इकबाल हुसैन, एचसी बालकृष्ण, आर निवास सहित अनेक विधायक दिल्ली पहुंचे और पार्टी आलाकमान से मिलने का समय मांगा। एक विधायक ने कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे से मुलाकात की।
इसके बाद कांग्रेस ने विधायकों और नेताओं को चुप कराने का सिलसिला शुरू किया। लेकिन इस बार कांग्रेस के निशाने पर भारतीय जनता पार्टी भी है। कांग्रेस के प्रभारी रणदीप सुरजेवाला ने भाजपा पर हमला करते हुए कहा कि वह पूरी तरह से गुटबाजी की शिकार पार्टी है और मीडिया के साथ मिल कर कांग्रेस सरकार के खिलाफ अभियान चला रही है। पहली बार कांग्रेस ने माना है कि सत्ता संघर्ष के पीछे भाजपा का कोई हाथ हो सकता है। अभी तक कांग्रेस भाजपा का नाम नहीं लेती थी। तो क्या कांग्रेस को लग रहा है कि डीके शिवकुमार को मुख्यमंत्री नहीं बनाया जाता है तो वे भाजपा के साथ जा सकते हैं या कांग्रेस के कुछ विधायक पार्टी छोड़ कर भाजपा की सरकार बनवाने का दांव चल सकते हैं? इसकी संभावना अभी तुरंत नहीं दिख रही है क्योंकि कांग्रेस के अपने 137 विधायक हैं। दूसरी ओर भाजपा के 63 और जेडीएस के 18 विधायक हैं। इसका मतलब है कि जब तक कांग्रेस में बड़ी टूट नहीं होगी तब तक कोई दूसरी सरकार बनने की संभावना नहीं है। शिवकुमार ने कहा है कि वे गुटबाजी में नहीं रहते हैं। लेकिन उनके भाई और पूर्व सासंद डीके सुरेश ने कहा है कि राहुल गांधी और पार्टी अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे को सब बता दिया गया है। अब फैसला उनको करना है। तभी सवाल है कि कांग्रेस फैसला क्यों नहीं कर रही है? अगर कंफ्यूजन बनाए रख कर इस स्थिति को बहुत दिन तक नहीं संभाल सकती है। विधायकों को सार्वजनिक बयान देने से रोक देना इसका समाधान नहीं है।
