नीतीश के नाम पर कंफ्यूजन का नुकसान

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बिहार में महागठबंधन यानी ‘इंडिया’ ब्लॉक के अंदर का तनाव और खींचतान सबको दिख रहा था, जिसे दूर करने कांग्रेस के अशोक गहलोत पहुंचे थे और लालू प्रसाद के परिवार की सारी शर्तें मान कर उसे दूर किया था। उसके बाद महागठबंधन की प्रेस कॉन्फ्रेंस भी हो गई, जिसमें तेजस्वी यादव को मुख्यमंत्री पद का दावेदार घोषित कर दिया गया। लेकिन अभी तक एनडीए की साझा प्रेस कॉन्फ्रेंस नहीं हुई है और न एनडीए की ओर से मुख्यमंत्री पद के दावेदार की घोषणा की गई है। एनडीए के सर्वोच्च नेता प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस पर खामोश हैं और दूसरे सबसे बड़े नेता यानी केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कह दिया है कि मुख्यमंत्री पद का फैसला चुनाव के बाद होगा। हालांकि उसके बाद भाजपा के प्रवक्ता रविशंकर प्रसाद या राजीव प्रताप रूड़ी या दिल्ली के सांसद मनोज तिवारी जैसे नेता बार बार कह रहे हैं कि चुनाव के बाद नीतीश कुमार ही सीएम बनेंगे। लेकिन इनके कहने का कोई मतलब नहीं है। अमित शाह की बात को सिर्फ अमित शाह ओवररूल कर सकते हैं या प्रधानमंत्री मोदी। यह देखना होगा कि चुनाव प्रचार के बीच किसी समय इसकी घोषणा होती है या नहीं!

ध्यान रहे प्रदेश भाजपा के तमाम नेता मान रहे हैं कि अगर नीतीश कुमार के नाम की घोषणा नहीं होती है तो एनडीए को नुकसान हो सकता है। उसमें ज्यादा नुकसान भाजपा को होगा। नीतीश कुमार के समर्थक भाजपा को वोट देने की बजाय घर बैठ सकते हैं या राजद को वोट दे सकते हैं। राजद और कांग्रेस के नेता जितना सहानुभूति नीतीश के प्रति दिखा रहे हैं उसका एक मैसेज जनता के बीच जा रहा है। यह कहानी सोशल मीडिया के जरिए और जमीनी प्रचार के जरिए जनता को सुनाई जा रही है कि चुनाव के बाद भाजपा नीतीश कुमार को सीएम नहीं बनाएगी और तब वे फिर से राजद के साथ जा सकते हैं। यह भी कहा जा रहा है कि जहां राजद का अपना उम्मीदवार नहीं है वहां जदयू को वोट देने के लिए कहा जा रहा है और इसी तरह जहां जदय़ू का उम्मीदवार नहीं है वहां उसके नेता राजद को वोट देने की अपील कर रहे हैं। भाजपा और जदयू के बीच ऊपर से भले सब कुछ ठीक दिख रहा हो लेकिन अंदर सब ठीक नहीं है।

असल में नीतीश कुमार के समर्थकों में भाजपा को लेकर अविश्वास हो गया है। इसका पहला कारण तो यह है कि भाजपा की ओर से नीतीश को मुख्यमंत्री पद का दावेदार नहीं घोषित किया जा रहा है, जबकि वे हर सभा में बार बार दोहरा रहे हैं कि दो बार गलती हो गई और अब वे भाजपा का साथ छोड़ कर नहीं नहीं जा रहे हैं। दूसरा कारण 2020 का चुनाव है, जब भाजपा की शह पर चिराग पासवान गठबंधन से अलग होकर लड़े थे। उन्होंने भाजपा छोड़ कर एनडीए के उस समय से बाकी घटक दलों जैसे जदयू, हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा और विकासशील इंसान पार्टी के खिलाफ उम्मीदवार उतारे थे। उनकी पार्टी की टिकट से ज्यादातर ऐसे नेता चुनाव लड़ रहे थे, जो भाजपा से जुड़े थे। यानी भाजपा ने हर तरह से उनकी मदद की थी। नीतीश समर्थक इस बात को भूल जाते अगर भाजपा उनको मुख्यमंत्री पद का दावेदार घोषित कर देती। तीसरा कारण यह है कि जदयू समर्थकों को लग रहा है कि भाजपा समर्थक इस बार जदयू उम्मीदवारों की मदद नहीं कर रहे हैं। भाजपा को इस अविश्वास का अंदाजा है तभी अलग अलग नेताओं से बयान दिलाए जा रहे हैं। चुनाव से पहले भाजपा को यह विवाद सुलझाना होगा।


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