भारतीय जनता पार्टी और राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ के बाद 75 साल की उम्र सीमा का एक और बंधन टूट गया है। भाजपा से बिल्कुल उलट राजनीतिक विचारधारा वाली देश की सबसे पुरानी कम्युनिस्ट पार्टी, सीपीआई ने डी राजा को लगातार तीसरी बार पार्टी का महासचिव चुना है। दिल्ली में हुई पार्टी कांग्रेस में उनको महासचिव चुना गया। इससे पहले मदुरै कांग्रेस में जब वे दूसरी बार महासचिव चुने गए थे तब कहा गया था कि अगली बार वे 75 साल के हो चुके होंगे और पार्टी उनको तीसरी बार महासचिव नहीं चुनेगी। लेकिन जब राजा को तीसरी बार महासचिव चुन लिया गया तो पार्टी के नेता अलग अलग तर्कों और तथ्यों से इसको सही ठहरा रहे हैं।
गौरतलब है कि डी राजा सीपीआई के पहले दलित महासचिव हैं। उन्होंने सुधाकर रेड्डी की जगह ली, जिनको लीजेंडरी नेता एबी बर्धन के बाद महासचिव बनाया गया था। माना जा रहा है कि विपक्षी गठबंधन में डी राजा के प्रति सद्भाव है और उनकी मौजूदगी में पार्टी बेहतर मोलभाव करने की स्थिति में होती है। दूसरी बात यह कही जा रही है कि अभी बिहार में सीट बंटवारे की बातचीत चल रही है और अगले साल केरल व तमिलनाडु में विधानसभा का चुनाव होना है। ऐसे में महासचिव बदलने से निरंतरता टूटेगी। लेकिन असली समस्या यह है कि सीपीआई के पास अखिल भारतीय राजनीति की समझ रखने या करने वाले नेताओं की कमी होती जा रही है। पार्टी ने कन्हैया कुमार को आगे बढ़ाया था लेकिन वे पार्टी छोड़ कर चले गए। अब कहा जा रहा है कि इस कार्यकाल में डी राजा अपना उत्तराधिकारी तैयार करेंगे।
