यूजीसी के विवादित नियमों पर रोक

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नई दिल्ली। देश भर में विवाद का कारण बने यूजीसी के नए नियमों पर सुप्रीम कोर्ट ने रोक लगा दी है। सर्वोच्च अदालत ने सुनवाई के दौरान बहुत स्पष्ट रूप से यह भी कहा कि इन नियमों के प्रावधान स्पष्ट नहीं हैं और इसलिए इनका दुरुपयोग हो सकता है। चीफ जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की बेंच ने गुरुवार को इस मामले पर सुनवाई की। अदालत के फैसले के बाद वाराणसी से लेकर इलाहाबाद और दिल्ली से लेकर पटना तक रंग और गुलाल उड़ा कर छात्रों ने इसका स्वागत किया।

इससे पहले चीफ जस्टिस की बेंच ने मृत्युंजय तिवारी, विनीत जिंदल और राहुल दीवान की याचिकाओं पर सुनवाई की। इन याचिकाओं में आरोप लगाया गया है कि यूजीसी के नियम सामान्य वर्ग के छात्रों के साथ भेदभाव करते हैं। गौरतलब है कि यूजीसी ने 13 जनवरी को अपने नए नियमों को अधिसूचित किया था। इसमें एससी, एसटी, ओबीसी, महिला और दिव्यांग छात्रों के साथ भेदभाव रोकने के प्रावधान किए गए हैं। लेकिन इनमें कई बातें ऐसी हैं, जो सामान्य वर्ग के छात्रों के साथ भेदभाव करने वाली हैं और उनके ऊपर कार्रवाई की तलवार लटकाती हैं। तभी देश भर में इनका विरोध हो रहा था।

दो हफ्ते से ज्यादा चले विरोध के बाद सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले पर सुनवाई की और नए नियमों पर रोक लगा दी। अदालत ने कहा कि अभी 2012 के नियम ही लागू होंगे। सुप्रीम कोर्ट केंद्र सरकार और यूजीसी को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। साथ ही नियमों का मसौदा फिर से तैयार करने का निर्देश दिया। अदालत ने कहा कि इस मामले में अगली सुनवाई अब 19 मार्च को होगी। सुप्रीम कोर्ट ने इसमें रैगिंग रोकने वाले प्रावधान नहीं शामिल करने का भी सवाल उठाया।

सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने पूछा कि जब ‘भेदभाव’ की परिभाषा पहले से सभी तरह के भेदभाव को कवर करती है, तो ‘जाति-आधारित भेदभाव’ को अलग से परिभाषित करने की जरूरत क्यों पड़ी? अदालत ने यह भी पूछा कि नए नियमों में रैगिंग को क्यों शामिल नहीं किया गया, जबकि यह कैंपस में एक बड़ी समस्या है। चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने पूछा, ‘अनुसूचित जातियों में भी कई लोग अब आर्थिक रूप से समृद्ध हो चुके हैं। हमने अब तक जो जातिविहीन समाज की दिशा में प्रगति की है, क्या हम अब फिर से पीछे जा रहे हैं’?

चीफ जस्टिस ने अलग अलग जातियों के लिए अलग हॉस्टल बनाने के प्रस्ताव पर कड़ी आपत्ति जताई। उन्होंने कहा, ‘भगवान के लिए ऐसा मत कीजिए। हम सब साथ रहते थे, आज अंतरजातीय विवाह भी होते हैं। भारत की एकता शैक्षणिक संस्थानों में भी दिखनी चाहिए’। गौरतलब है कि यूजीसी के नए नियम का नाम है, ‘प्रमोशन ऑफ इक्विटी इन हायर एजुकेशन इंस्टीट्यूशन रेगुलेशंस, 2026’ है।


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