कैश ट्रांसफर की कीमत

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सरकारों का ऋण लेना अपने-आप में समस्या नहीं है, बशर्ते निवेश उत्पादक योजनाओं या दीर्घकालिक इन्फ्रास्ट्रक्चर के निर्माण में हो। मगर, फिलहाल ज्यादातर रकम का इस्तेमाल नकदी ट्रांसफर के लिए हो रहा है।

वोट खरीद योजनाएं का असर जाहिर होने लगा है। पिछले वित्त वर्ष में राज्य सरकारों ने बाजार से 15.2 फीसदी ज्यादा कर्ज उठाया। ज्यादा कर्ज लेने की होड़ का असर ब्याज दरों पर दिखा। मतलब यह कि अब सरकारों को अधिक महंगी दर पर ऋण लेना पड़ रहा है। भारत सरकार को दस साल के बॉन्ड बेचने के लिए अब लगभग सात प्रतिशत की दर से ब्याज देने पड़ रहे हैं। सरकारों का ऋण लेना अपने-आप में समस्या नहीं है, बशर्ते जुटाई गई रकम का निवेश उत्पादक योजनाओं या दीर्घकालिक इन्फ्रास्ट्रक्चर के निर्माण में हो रहा हो। मगर, अपने देश में फिलहाल इनमें से बड़ी रकम का इस्तेमाल मतदाताओं के खाते में नकदी ट्रांसफर के लिए हो रहा है।

मार्केट रिसर्च एजेंसी क्राइसिल के मुताबिक 2019 तक सिर्फ चार राज्यों में कैश ट्रांसफर की योजनाएं थीं, जबकि अब 28 राज्यों और केंद्र शासित दिल्ली में इन्हें चलाने का बोझ सरकारों पर है। प्रोजेक्टडीप नामक एक संगठन की अध्ययन रिपोर्ट के मुताबिक 2015 के बाद से ऐसी योजनाओं पर सरकारी खर्च में 20 गुना से भी ज्यादा बढ़ोतरी हुई है। ये व्यय अब दो लाख 85 हजार करोड़ रुपये सालाना तक पहुंच चुकी है। यह भी गौरतलब है कि ये सारी रकम सिर्फ कर्ज लेकर नहीं जुटाई गई है। बल्कि एक्सिस रिसर्च ने पिछले साल अपनी एक अध्ययन रिपोर्ट में कहा था कि इस बजट का बहुत बड़ा हिस्सा सरकारों की व्यय प्राथमिकता में परिवर्तन लाकर और राजकोषीय घाटा बढ़ाते हुए पूरा किया गया है।

व्यय प्राथमिकता में परिवर्तन का मतलब है कि दीर्घकालिक एवं मानव विकास की योजनाओं का बजट काट कर प्रत्यक्ष नकदी ट्रांसफर की योजनाएं बढ़ाई गई हैँ। चूंकि सरकारें ऐसी योजनाओं के प्रभाव का अध्ययन नहीं करवातीं, इसलिए यह सामने नहीं आ पाता है कि मतदाताओं को तुरंत मिलने राहत की कितनी बड़ी कीमत भावी पीढ़ियों को चुकानी होगी। अर्थशास्त्री अरविंद सुब्रह्मण्यम ने इन योजनाओं को ‘नई कल्याणकारी दृष्टि’ कहा है। इससे मतदाताओं को महसूस होता है कि उनके लिए कुछ किया गया है। लेकिन यह किस कीमत पर हुआ है, यह बताने वाला उनके आसपास कोई मौजूद नहीं होता!


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