“मैं आखिर हूँ कौन?”
यह सवाल बिना बुलाए आता है। कभी बीस साल की उम्र में, जब दुनिया आपसे निश्चित उत्तर चाहती है मगर आपके पास जवाब नहीं होता। कभी चालीस की उम्र में, जब सपनों का जीवन और जीया जा रहा जीवन एक-दूसरे से अलग खड़े दिखाई देते हैं। कभी प्रेम में असफल होने के बाद। कभी बड़ी सफलता मिलने के बाद। और कभी किसी बिल्कुल साधारण मंगलवार की दोपहर, जब अचानक एहसास होता है कि जीवन जीने की इतनी जल्दी थी जो यह पूछना ही भूल गए कि जी कौन रहा था?
यह बहुत निजी सवाल है। लेकिन यह शायद ही कभी हमारी राष्ट्रीयता तक पहुँचता है। शायद ही कभी कोई पूछता है, जानना चाहता हैं कि जिस देश को हम जन्म से अपना घर कहते आए हैं, क्या सचमुच हम उसके नागरिक हैं? क्योंकि दुनिया के अधिकांश देशों के अधिकांश नागरिकों को यह प्रश्न सचमुच कभी पूछना ही नहीं पड़ता।
लेकिन पिछले सप्ताह करोड़ों भारतीयों ने पहली बार यही सवाल अपने आप से पूछा।
नई दिल्ली में पासपोर्ट सेवा दिवस के अवसर पर विदेश मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि भारतीय पासपोर्ट यात्रा का दस्तावेज है, नागरिकता का नहीं। कानूनी दृष्टि से यह कोई नई बात नहीं थी। लेकिन इतना भर कहना था कि सोशल मीडिया, टीवी स्टूडियो और अखबारों में बहस छिड़ गई। शाम तक पूरा देश जैसे आधे दिन के लिए कानून का विद्यार्थी बन चुका था।
सोशल मीडिया ने, हमेशा की तरह, सबसे व्यावहारिक काम किया। उसने मजाक बनाया।
मुझे सबसे अच्छा एक मीम लगा। उसमें प्रेस्टिज प्रेशर कुकर की तस्वीर थी और नीचे लिखा था—“हर भारतीय घर में यह मिलता है। जिसके घर में नहीं है, शायद वह भारतीय नागरिक नहीं है।”
सचमुच, केवल भारत ही संवैधानिक बहस को रसोई के बर्तनों तक पहुँचा सकता है!
लेकिन असली बात मीम नहीं थी।
असली बात यह थी कि हममें से अधिकांश ने यह सवाल पहले कभी पूछा ही नहीं था।
कानूनी स्थिति साफ है। भारत में ऐसा एक भी कोई सार्वभौमिक दस्तावेज नहीं है जो सामान्य नागरिक के बारे में कह दे कि यह भारतीय नागरिक है। नागरिकता कानून से तय होती है और आवश्यकता पड़ने पर जन्म, वंश, पंजीकरण या नागरिकता ग्रहण करने से जुड़े दस्तावेजों की श्रृंखला से सिद्ध की जाती है। सर्वोच्च न्यायालय भी कई बार पहचान और नागरिकता के बीच अंतर स्पष्ट कर चुका है। आधार आपकी पहचान है। मतदाता पहचान पत्र मतदान का अधिकार बताता है। पैन करदाता होने का प्रमाण है। ड्राइविंग लाइसेंस वाहन चलाने का अधिकार देता है। पासपोर्ट विदेश यात्रा का अधिकार देता है।
शायद हम दुनिया की अकेली वह सभ्यता हैं जिसके पास लगभग हर चीज का प्रमाणपत्र है, सिवाय उस एक प्रश्न के जिसने अचानक सबको बेचैन कर दिया—कौन सा कागज साबित करता है कि मैं भारत का नागरिक हूँ?
दुनिया की ओर देखिए तो यह बेचैनी और विचित्र लगती है।
कोई स्कॉटिश नागरिक रात को सोने से पहले यह नहीं सोचता कि वह ब्रिटिश है या नहीं। ब्रिटेन में पासपोर्ट नागरिकता का पर्याप्त प्रमाण माना जाता है और जो लोग नागरिकता ग्रहण करते हैं, उन्हें औपचारिक नागरिकता प्रमाणपत्र भी मिलता है। सिंगापुर में हर नागरिक के पास राष्ट्रीय पंजीकरण पहचान पत्र होता है और नए नागरिकों को नागरिकता प्रमाणपत्र दिया जाता है। अमेरिका में पासपोर्ट स्वयं नागरिकता का निर्णायक प्रमाण है।
कागज अलग-अलग देशों में अलग हो सकते हैं। लेकिन नागरिक शायद ही कभी यह सोचते हुए सोता है कि कानूनी रूप से उसका अपना देश आखिर उसे किस दस्तावेज से पहचानता है।
मैंने इस पर जितना सोचा, बात उतनी अजीब लगने लगी।
मेरे घर में एक स्टील की अलमारी है। उसमें मेरे और मेरे पति के तमाम कागज रखे हैं। जन्म प्रमाणपत्र, पासपोर्ट, आधार, पैन, वोटर कार्ड, विवाह प्रमाणपत्र, संपत्ति के कागज। जीवन की हर महत्वपूर्ण घटना ने सरकार की ओर से हमें एक नया कागज दिया है।
उसी फाइल में एक और कहानी भी रखी है।
मेरे पति जम्मू कश्मीर से हैं। वर्षों तक उनके पास स्टेट सब्जेक्ट सर्टिफिकेट था, जो उन्हें तत्कालीन राज्य का स्थायी निवासी बताता था। अनुच्छेद 370 हटने के बाद वही कागज चुपचाप गायब हो गया। उसकी जगह डोमिसाइल सर्टिफिकेट आ गया। बदला केवल ऊपर लिखा शीर्षक था। परिवार की फाइल में बस एक और प्रमाणपत्र जुड़ गया।
तभी मुझे लगा कि भारत हमें परिभाषित करने वाले कागज बनाने में असाधारण रूप से काबिल, दक्ष है।
एक बताता है हम कहाँ पैदा हुए। दूसरा कहाँ रहते हैं। तीसरा कहाँ वोट देते हैं। चौथा कहाँ कर चुकाते हैं। पाँचवाँ हमारी जाति बताता है। छठा बताता है कि कौन सा राज्य हमें अपना अधिवासी मानता है।
हर कागज पर अशोक स्तंभ की मुहर है।
लेकिन कोई एक कागज यह नहीं कहता—मैं भारत का हूँ।
असम में जब राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर की अंतिम सूची प्रकाशित हुई तो 19 लाख लोगों के नाम उससे बाहर रह गए। उन्हें दस्तावेजों के सहारे साबित करना था कि उनके परिवार 24 मार्च 1971 से पहले भारत में थे। बहुत से लोग ऐसा नहीं कर पाए। इसलिए नहीं कि वे विदेशी थे, बल्कि इसलिए कि वे गरीब थे, बुजुर्ग थे, शादी के बाद उनका नाम बदल गया था या उनके गाँव के पुराने रिकॉर्ड समय, बाढ़ या उपेक्षा में नष्ट हो चुके थे।
यही बहु-दस्तावेज व्यवस्था की असली परीक्षा है।
जब तक कोई सवाल नहीं पूछता, व्यवस्था ठीक चलती रहती है। लेकिन जिस दिन राज्य प्रमाण मांगता है, बोझ उन लोगों पर नहीं पड़ता जिनके पास वकील और अलमारियाँ हैं। वह उन लोगों पर पड़ता है जिनके लिए एक बाढ़, एक शादी या कई पीढ़ियों की गरीबी कागजों की पूरी श्रृंखला तोड़ देती है।
शायद यही कारण है कि पासपोर्ट वाली बहस इतनी दूर तक गई।
इसलिए नहीं कि करोड़ों भारतीय अचानक संवैधानिक कानून के विशेषज्ञ बन गए थे, बल्कि इसलिए कि वे एक कानूनी तकनीकी प्रश्न से कहीं अधिक गहरी बात से टकरा गए।
वह नीली पासपोर्ट पुस्तिका, जिसे हम विदेश यात्रा के दौरान अपने बटुए से भी अधिक संभालकर रखते हैं, हमेशा ऐसा एहसास देती थी मानो गणराज्य ने हमारे कंधे पर हाथ रखकर कहा हो—तुम हमारे हो।
विदेश मंत्रालय की व्याख्या ने कानूनी स्थिति स्पष्ट की, लेकिन उसी क्षण उस भावनात्मक भरोसे को भी झटका दिया। यही इस पूरे विवाद का सबसे बड़ा सबक है।
नौकरशाही के लिए नागरिकता एक कानूनी स्थिति है। लेकिन अपनापन कुछ और है।
एक कानून से मिलता है। दूसरा मन में बसता है।
सबसे मजबूत गणराज्य वह नहीं होता जो सत्रह डाटाबेस के सहारे हर नागरिक की पहचान कर सके। सबसे मजबूत देश, गणराज्य वह होता है जिसमें किसी नागरिक को कभी यह पूछना ही न पड़े— क्या मैं सचमुच इस देश का हूँ?
भारत ने अपने लोगों की पहचान करने की अद्भुत व्यवस्था बना ली है। अब उसे उससे भी कठिन काम करना है—ऐसा भरोसा देना जिसे किसी फाइल के कागज जोड़कर साबित न करना पड़े, बल्कि जिसे नागरिक अपने हाथ में लेकर कह सके— हाँ, मैं इसी गणराज्य का हूँ।
प्रेशर कुकर वाला मीम मजेदार था। लेकिन उसके नीचे छिपा सवाल बिल्कुल भी मजेदार नहीं है।
