प्रेस कॉन्फ्रेंस की कांग्रेस राजनीति

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पहले कहा जाता था कि कांग्रेस को विपक्ष की राजनीति करने नहीं आती है। ऐसा इसलिए था क्योंकि कांग्रेस कभी लंबे समय तक विपक्ष में नहीं रही थी। आजादी के बाद उसका सफर सत्ता के साथ शुरू हुआ था। तभी कांग्रेस के नेता बड़े शान से बताते थे कि कांग्रेस सत्ता में रहती है या सत्ता के इंतजार में रहती है। 2014 से पहले कांग्रेस 67 साल में कुल मिला कर 12 साल सत्ता से बाहर रही थी। वह भी तीन बार में। इन 12 वर्षों में वह जब भी विपक्ष में गई तो बैठ कर सत्ता का इंतजार किया। मोरारजी देसाई की सरकार ढाई साल चली, वीपी सिंह और चंद्रशेखर की डेढ़ साल चली और एचडी देवगौड़ा, आईके गुजराल और अटल बिहारी वाजपेयी की आठ साल चली। इन 12 वर्षों में भी देश के ज्यादातर राज्यों में कांग्रेस की सरकार होती थी।

लेकिन अब पिछले 12 साल से लगातार कांग्रेस सत्ता से बाहर है और देश के ज्यादातर राज्यों में सत्ता से बाहर हो चुकी है। उसका शासन उत्तर में हिमाचल प्रदेश को छोड़ दें तो सिर्फ तीन दक्षिण भारतीय राज्यों में है। फिर भी कांग्रेस ने विपक्ष की राजनीति नहीं सीखी है। सत्ता पक्ष को लगातार घेरना, उसे जवाबदेह बनाना, प्रदर्शन आदि से जनता के अंदर सत्ता विरोधी भावना यानी एंटी इन्कम्बैंसी पैदा करने की कोशिश करना आदि काम कांग्रेस नहीं करती है। अब तो सोशल मीडिया का जमाना है तो कांग्रेस की सारी लड़ाई भी ऑनलाइन मोड में चलती है। ध्यान रहे कोरोना के समय ऑनलाइन पढ़ाई करने वाले ज्यादातर छात्र फिसड्डी निकले हैं। ऐसा ही ऑनलाइन राजनीतिक लड़ाई लड़ने वाली पार्टियों के साथ भी संभव है। ऑनलाइन लड़ाई के अलावा कांग्रेस ने राजनीति करने का एक प्रेस कॉन्फ्रेंस वाला तरीका निकाला है। जैसे कोई बड़ा घटनाक्रम होता है वैसे ही कांग्रेस की ओर से ऐलान किया जाता है कि उसके नेता अलग अलग राज्यों में जाकर प्रेस कॉन्फ्रेंस करेंगे। उनकी सूची जारी होती है और राज्यों की राजधानियों या किसी बड़े शहर में प्रेस कॉन्फ्रेंस आयोजित की जाती है। प्रेस कॉन्फ्रेंस करके कांग्रेस अपने कर्तव्यों की इतिश्री कर लेती है।

अभी छात्रों का इतना बड़ा मुद्दा चल रहा है। नीट यूजी की परीक्षा रद्द होने से 23 लाख छात्र परेशान हुए थे। भले दोबारा परीक्षा हो गई है फिर भी छात्रों और अभिभावकों की नाराजगी कायम है। ऐसे ही सीबीएसई की परीक्षा में ऑन स्क्रीन मार्किंग के कारण 18 लाख छात्र प्रभावित हुए। लाखों छात्रों ने दोबारा कॉपी जांच कराई और उनके अंक 20 से 30 फीसदी बढ़ गए। इन मामलों को लेकर कांग्रेस ने कोई बड़ा आंदोलन नहीं किया। इस मसले पर एक कॉकरोच जनता पार्टी खड़ी हो गई। अब कांग्रेस प्रेस कॉन्फ्रेंस करने जा रही है। इसे ‘छात्रों की गूंज’ नाम दिया गया है। देश के लगभग सभी राज्यों में कांग्रेस के नेता जाकर प्रेस कॉन्फ्रेंस करेंगे। कांग्रेस ने 28 नेताओं को इसके लिए अधिकृत किया है। यह राजनीति का सबसे खराब फॉर्म है। सोशल मीडिया में पोस्ट लिख कर लड़ने से भी खराब। इस किस्म की प्रेस कॉन्फ्रेंस का कोई असर नहीं होता है। अगर संबंधित राज्य के अखबारों में पहले पन्ने पर उस प्रेस कॉन्फ्रेंस की खबर छप जाए तो वह बड़ी बात होती है। इसका नुकसान यह होता है कि प्रदेश कमेटी भी प्रेस कॉन्फ्रेंस के बाद समझ लेती है कि उसका काम हो गया। वह भी कोई आंदोलन नहीं करती है, जबकि स्थानीय स्तर पर बड़े मुद्दों को लेकर आंदोलन होने चाहिए। राहुल गांधी चार शिक्षा केंद्रों पर छात्रों से संवाद कर रहे हैं। वैसा ही संवाद पूरे देश में होना चाहिए लेकिन उसकी बजाय कांग्रेस प्रेस कॉन्फ्रेंस कर रही है। ऐसा लग रहा है कि कांग्रेस बड़े मुद्दों पर भी सुविधाजनक रास्ता ही अख्तियार कर रही है।


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