युद्ध हुआ बेकाबू

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ट्रंप की टिप्पणियां संकेत हैं कि ईरान के खिलाफ छेड़े गए युद्ध से निकलने का रास्ता उसे नहीं मिल रहा है। ट्रंप युद्ध पर से अपना नियंत्रण खो चुके हैँ, जिसकी बेचैनी उनके बयानों से जाहिर हुई है।

ईरान के खिलाफ युद्ध में अमेरिका के उलझते जाने की स्थिति से व्यग्र डॉनल्ड ट्रंप अपनी नाकामी का ठीकरा नाटो में अपने सहयोगी देशों और चीन फोड़ते नजर आ रहे हैं। उलझाव का आलम यह है कि ईरान में थल सेना उतारने पर उनका प्रशासन गंभीरता से विचार कर रहा है, जिसकी शुरुआत ईरानी द्वीप खर्ग से हो सकती है। अफगानिस्तान और इराक के अनुभवों के मद्देनजर अमेरिका के युद्ध रणनीतिकार इसे अपने देश के लिए खतरनाक फैसला मानते हैँ। बहरहाल, वहां थल सेना भेजने के बावजूद होरमुज जलडमरूमध्य को खुलवाने का सवाल बना रहेगा। नौसैनिक हस्तक्षेप के जरिए ऐसा करने में अमेरिका अकेले खुद को अक्षम पा रहा है।

इसलिए ट्रंप ने चीन सहित कई देशों से मदद करने की गुजारिश की। चीन ने तो इसे सीधे ठुकरा दिया, जबकि अमेरिका के सहयोगी माने जाने वाले किसी देश से भी तुरंत सकारात्मक उत्तर नहीं मिला। तो अब ट्रंप ने यूरोपीय देशों की अनिच्छा के मद्देनजर नाटो के “बहुत बुरे भविष्य” की धमकी दी है। उधर चीन को चेताया है कि वे 31 मार्च से तय अपनी बीजिंग यात्रा स्थगित कर सकते हैं। इस बीच खबर है कि फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने ईरान के राष्ट्रपति महमूद पेज़िस्कियान से बात कर फ्रेंच जहाजों के लिए होरमुज का रास्ता खोलने का आग्रह किया।

उन्होंने जोर किया कि फ्रांस इस युद्ध का हिस्सा नहीं है। यह संकेत है कि यूरोपीय देश अमेरिका- इजराइल के बिना तय सैन्य उद्देश्य वाले युद्ध में भागीदारी से बच रहे हैं। दूसरी तरफ ईरानी हमलों में हो रहे नुकसान के कारण अमेरिका के अंदर युद्ध लगातार अधिक अलोकप्रिय होता जा रहा है। चूंकि नुकसान की खबरें अमेरिका के बड़े अखबारों ने छापी हैं, तो उससे भड़के ट्रंप ने उन अखबारों पर राष्ट्र-द्रोह का इल्जाम मढ़ दिया है। मगर उनकी ऐसी प्रतिक्रियाओं को इसी बात संकेत समझा गया है कि ट्रंप प्रशासन ने बिना रणनीति बनाए देश को ऐसे युद्ध में झोंक दिया, जिससे निकलने का रास्ता उसे नहीं मिल रहा है। यानी ट्रंप युद्ध पर से अपना नियंत्रण खो चुके हैँ। इसकी बेचैनी उनके बयानों से जाहिर हो रही है।


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