वार्ता से निकल आइए!

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डॉनल्ड ट्रंप प्रशासन पर भरोसा करना कठिन होता चला गया है। वह ना तो द्विपक्षीय वार्ता के दौरान बनी सहमतियों पर कायम रहता है, और ना ही यह भरोसा रहता है कि वार्ता जारी रहने के दौरान वो कोई कार्रवाई नहीं करेगा।

भारत (एवं कुछ अन्य देशों) के खिलाफ अपने व्यापार कानून की धारा 301 के तहत जांच फिर शुरू करने का अमेरिका का फैसला सीधे तौर पर उस विश्वास पर चोट है, जिसके आधार पर द्विपक्षीय व्यापार समझौते के लिए वार्ता चल रही है। अमेरिका का ट्रंप प्रशासन पहले ही व्यापार के सभी मान्य कायदों को तोड़ चुका है। उसने एकतरफा टैरिफ युद्ध छेड़ कर भारत जैसे देशों पर दबाव बनाया। साफ है, उस कारण शुरू हुई व्यापार वार्ता में जो सहमतियां बनीं, वह उस पर भी कायम नहीं है। चूंकि अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने मनमाना टैरिफ लगाने के राष्ट्रपति के अधिकार को संकुचित कर दिया, तो अब ट्रंप ने विभिन्न देशों को घेरने का नया हथकंडा अपनाया है।

भारत सहित 60 देशों के खिलाफ उसने यह जांच शुरू की है कि क्या उन देशों से अमेरिका में होने वाले उत्पादों को तैयार करने में जबरिया मजदूरी का इस्तेमाल किया जाता है। साथ ही कुछ क्षेत्र में कथित ओवर कैपिसिटी और अति उत्पादन जैसी संभावनाओं की जांच भी शुरू की गई है। अपने कानून के तहत अपने अधिकारियों द्वारा की गई जांच में जिन देशों को दोषी पाया जाएगा, ट्रंप प्रशासन उन पर टैरिफ या प्रतिबंध लगा सकेगा। आर्थिक शब्दावली में ऐसे कदमों को गैर-व्यापार रुकावटें माना जाता है। मुक्त व्यापार के दौर में एकतरफा ढंग से डाली गई ऐसी रुकावटों का कोई तर्क नहीं हो सकता।

दरअसल, डॉनल्ड ट्रंप प्रशासन का रुख ऐसा है कि उसकी ज़ुबान पर भरोसा करना लगातार कठिन होता चला गया है। वह ना तो द्विपक्षीय वार्ता के दौरान बनी सहमतियों पर कायम रहता है, और ना ही यह भरोसा किया जा सकता है कि वार्ता जारी रहने के दौरान वो कोई कार्रवाई नहीं करेगा। जबकि अंतरराष्ट्रीय सहमति, समझौते और व्यवहार में जो चीज सबसे अहम होती है, वह विश्वसनीयता ही है। इसलिए उचित होगा कि भारत अमेरिका के साथ जारी व्यापार वार्ता से बाहर निकल आए। या वार्ता जारी रखने के लिए कम-से-कम 301 जांच को खत्म करने की शर्त लगाए। भारत पहले ही अत्यधिक रियायतें दे चुका है। अब चुप रहना आत्म-सम्मान को तिलांजलि देना होगा।


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