ये कैसी उलटी बयार!

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पूंजी अभाव का सामना कर रहे इस देश में उलटी बयार चल रही है। एक ओर राष्ट्रीय सुरक्षा की चिंता छोड़ चीनी पूंजी बुलाई जा रही है, तो दूसरी तरफ भारतीय पूंजी ‘अमेरिका फर्स्ट’ का एजेंडा साधने जा रही है!

भारत ने सामरिक चिंताओं को ताक पर रखते हुए चीनी पूंजी के लिए अपने दरवाजे खोल दिए हैं। तर्क पहले से दिया जा रहा था कि जब विदेशी निवेशक भारत से मुंह मोड़ रहे हैं, भारत के लिए आ सकने वाली चीनी पूंजी का रास्ता रोके रखना ठीक नहीं है। गौरतलब है कि इस वित्त वर्ष की तीसरी तिमाही में 3.7 बिलियन डॉलर का शुद्ध प्रत्यक्ष विदेशी निवेश बाहर गया। इसके अलावा दलील यह भी दी गई कि भारतीय कारखाना क्षेत्र चीनी उपकरणों एवं वस्तुओं पर निर्भर है, इसलिए उनका आयात करने के बजाय सही नीति चीनी कंपनियों के निवेश के जरिए उन्हें लाना होगा। संभवतः इन्हीं तर्कों को मानते हुए केंद्र ने प्रेस नोट-3 को संशोधित किया है, जिसके जरिए अप्रैल 2020 में चीनी पूंजी के निवेश पर रोक लगाई गई थी। ये वो दौर था, जब लद्दाख क्षेत्र में वास्तविक नियंत्रण रेखा पर चीनी फौज भारतीय इलाकों में जबरन घुसने में जुटी थी। इसलिए प्रेस नोट-3 को महज आर्थिक नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा से संबंधित कदम भी माना गया था।

लेकिन उस पर बिना कोई स्पष्टीकरण दिए उस निर्णय को पलट दिया गया है। बहरहाल, इस निर्णय के साथ ही एक दूसरी खबर आई है, जिससे पूंजी अभाव का सामना कर रहे इस देश में चल रही उलटी बयार का अहसास होता है। अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने एलान किया है कि रिलायंस ग्रुप अमेरिका के ब्राउन्सविले में एक बड़ी रिफाइनरी लगाएगा, जिसके लिए 300 बिलियन डॉलर का सौदा हुआ है। ट्रंप ने इसे ‘अमेरिकी श्रमिकों, ऊर्जा, एवं दक्षिण टेक्सस के लोगों की बड़ी जीत’ बताया है; और कहा है कि इससे ‘अमेरिकी बाजार में गति आएगी, राष्ट्रीय सुरक्षा मजबूत होगी, ऊर्जा उत्पादन बढ़ेगा, जिससे अरबों डॉलर का आर्थिक लाभ’ अमेरिका को होगा। मतलब यह कि भारत के डेटा और बाजार के बाद अब भारतीय पूंजी ‘अमेरिका फर्स्ट’ एजेंडे का हित साधेगी। मुद्दा यह है कि बदले में भारत को क्या मिलेगा? उल्लेखनीय है कि हाल ही में अमेरिकी मंत्री क्रिस्फोटर लैंडो भारत आकर बता चुके हैं कि भारत के विकास में मददगार बनने का अमेरिका का कोई इरादा नहीं है!


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