गैस के लिए हाहाकार

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पश्चिम एशिया में युद्ध लंबा खिंचा (जिसकी पूरी संभावना है) और होरमुज जलडमरुमध्य का मार्ग बंद रहा, तो आने वाले दिनों में नोटबंदी या कोरोना काल जैसे परिमाण के संकट का सामना देश को करना पड़ सकता है।

रसोई गैस के लिए हाहाकार मच गया है। जगह-जगह से सिलिंडर भरवाने के लिए गैस एजेंसियों के सामने लंबी कतारों की खबरें मिल रही हैं। ये हाल तब है, जबकि सरकार ने एलपीजी की 80-85 फीसदी सप्लाई औद्योगिक क्षेत्र से घरेलू उपयोग के लिए भेजने का निर्णय लिया है। कॉमर्शियल उपयोग के लिए गैस की सप्लाई काफी हद तक बाधित हो चुकी है। गौरतलब है कि अभी संकट के शुरुआती दिन हैं। पश्चिम एशिया में युद्ध लंबा खिंचा (जिसकी पूरी संभावना है) और होरमुज जलडमरुमध्य का मार्ग बंद रहा, तो आने वाले दिनों में नोटबंदी या कोरोना काल जैसे परिमाण के संकट का सामना देश को करना पड़ सकता है। अब यह सामने आया है कि चूंकि गैस का भंडारण मंहगा पड़ता है, इसलिए भारत ने खुद को लगातार सप्लाई पर ही निर्भर बनाए रखा। अब चूंकि मुश्किल आ खड़ी हुई है, तो सरकार आपातकालीन निर्णय लेने को मजूबर है। उसने ऐसे लिए हैं, जिनसे घरेल उपभोक्ताओं को अधिकतम राहत मिल सके। यह सही, मगर समस्याग्रस्त प्राथमिकता है। आखिर श्रमिक वर्ग के लोग फैक्टरियों या कार्यस्थलों पर कैंटीन या ढाबों में भोजन करते हैं।

लाइन होटल ट्रक एवं बस ड्राइवरों और अन्य लंबी दूरी के यात्रियों के खाना खाने की जगहें हैं। फिर अनगिनत लोग रोज कामकाज के सिलसिले में यात्राओं पर जाते हैं, जो रेस्तरां या होटलों में ही भोजन करते हैं। फिलहाल स्थिति यह है कि अनेक शहरों से रेस्तरां और होटलों में मेनू की कटौती हो रही है और कुछ रोज में उनके बंद हो जाने की चेतावनी दी गई है। रेस्तरां और क्लाउड किचन पर लाखों कर्मचारी एवं होम फूड डिलीवरी से जुड़े गिग वर्कर निर्भर हैँ। उधर औद्योगिक गैस की कटौती से कल-कारखाने बंद हुए, तो उसका असर लाखों नौकरीशुदा लोगों पर पड़ेगा। उत्पादन, वितरण, एवं उपभोग में गिरावट से अर्थव्यवस्था पर होने वाला दूरगामी असर अलग है। तो कुल मिलाकर देश एक बड़ी मुश्किल में फंसता नजर आ रहा है। इसके मद्देनजर क्या यह कहना काफी होगा कि युद्ध होता है, तो दिक्कत होती है? या एहतियाती कदम ना उठाने के लिए किसी की जवाबदेही तय होगी?


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