विरोध बढ़ाने वाले मुद्दे

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इस बहुलता भरे देश में असहमत विचार और विरोधी भावनाओं की एक सीमा से ज्यादा अनदेखी विपरीत परिणाम दे सकती है। इसलिए बेहतर होगा कि केंद्र असहमत समूहों के साथ संवाद कायम करने का नजरिया अपनाए।

पूरे भारत को अपनी विचारधारा के रंग में ढालने की मुहिम में जुटी नरेंद्र मोदी सरकार को ऐसे कदमों पर हो रही प्रतिक्रियाओं को लेकर अवश्य सचेत रहना चाहिए। इस बहुलता भरे देश में असहमत विचार और विरोधी भावनाओं की एक सीमा से ज्यादा अनदेखी विपरीत परिणाम दे सकती है। इसलिए बेहतर होगा कि सरकार असहमत समूहों के साथ संवाद कायम करने का नजरिया अपनाए। इस हफ्ते ऐसी दो घटनाएं हुईं, जिन्हें केंद्र के अति-उत्साह की प्रतिक्रिया समझा जाएगा।

बीते 28 जनवरी को केंद्र ने दिशा-निर्देश जारी कर राष्ट्रगान से पहले राष्ट्रगीत गाना और वंदे मातरम के सभी छह स्तोत्र गाना अनिवार्य कर दिया था। गुजरे मंगलवार को नगालैंड विधानसभा ने इस मुद्दे को प्रवर समिति को भेजने का फैसला किया कि क्या ये दिशा-निर्देश उस राज्य पर भी लागू होता है। इसके पहले बजट सत्र की शुरुआत पर पहली बार गन-गण-मन से पहले सदन में वंदे मातरम गाया गया। उस पर भाजपा को छोड़ सभी दलों के सदस्यों ने आपत्ति जताई। उनमें सत्ताधारी गठबंधन में शामिल दल भी हैं, हालांकि ये गठबंधन केंद्र में सत्ताधारी एनडीए का हिस्सा है। कई सदस्यों ने कहा कि इस मामले से “संवैधानिक एवं अंतरात्मा से संबंधित” सवाल खड़े हुए हैं। यह भी कहा गया कि केंद्र का दिशा-निर्देश देशभक्ति और एकरूपता का घालमेल करता मालूम पड़ा है।

इस बीच रेलवे स्टेशनों पर अन्य लिपियों में हिंदी शब्द लिखने को लेकर तमिलनाडु में विवाद गरमा गया है। बुधवार को तिरुचि स्टेशन पर अधिकारियों ने हिंदी, अंग्रेजी, और तमिल में लिखे कर्त्तव्य-द्वार शब्द को हटा दिया। कहा कि ऐसा जन भावनाओं का ख्याल करते हुए किया गया है। इसके पहले डीएमके समर्थकों ने गेट पर बने मेहराब पर लिखे इन शब्दों पर कालिख पोत दी थी। मुख्यमंत्री एम।के। स्टालिन ने इसे ‘एक भाषा, तीन लिपि’ नीति बताते हुए इस पर कड़ा एतराज जताया था। संकेत हैं कि तमिलनाडु में अब अन्य जगहों पर भी हिंदी विरोधी समूह इस मुद्दे पर विरोध जताने की तैयारी में हैं। ऐसी हर घटना राष्ट्रीय मेलजोल की भावना में पेच डालती है। अतः उचित यही होगा कि इन पर अविलंब ध्यान दिया जाए।


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