भारत तक पहुंची आंच

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भारत के अतिथि जहाज को भारतीय जल क्षेत्र के करीब डुबो देना भारत की प्रतिष्ठा के प्रति अमेरिका की बेपरवाही की मिसाल है। इसलिए इस घटना पर भारत को औपचारिक विरोध एवं आपत्ति अवश्य दर्ज करानी चाहिए।

ईरान पर अमेरिका- इजराइल के हमले से पश्चिम एशिया में शुरू हुए युद्ध की आंच बुधवार को भारत तक पहुंच गई, जब भारतीय जलसीमा के करीब ईरान के जहाज इरिस देना को अमेरिका ने डुबो दिया। अमेरिका के युद्ध मंत्री पीटर हेगसेट ने इसे अपने देश की एक बड़ी सैन्य सफलता के रूप में पेश कर इस बारे में कोई भ्रम नहीं रहने दिया कि ये कार्रवाई योजनाबद्ध ढंग से की गई। अमेरिका ने ऐसा करने को सोचा, यह भारत के प्रति उसके तौहीनी नजरिए का परिचायक है। आखिर वो जहाज भारतीय नौसेना के अंतरराष्ट्रीय बेड़ा समीक्षा कार्यक्रम- मिलन- में भाग लेने भारत के आमंत्रण पर आया था। विशाखपत्तमन में इस कार्यक्रम में भाग लेकर वह लौट रहा था।

ईरान ने कहा है कि चूंकि जहाज युद्ध से बाहर के क्षेत्र से गुजर रहा था, अतः उसकी हथियार प्रणालियों को “सुरक्षित एवं निष्क्रिय” मोड में रखा गया था। ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने कहा है- ‘हम मान कर चल रहे थे कि हम दोस्ताना जल क्षेत्र में हैं, अतः जहाज पर सवार अधिकांश लोग समारोहों में भाग लेने वाले गैर लड़ाकू कर्मचारी थे।’ डॉनल्ड ट्रंप प्रशासन ने ऐसे जहाज पर हमला करने को सोचा, यह तमाम अंतरराष्ट्रीय कानूनों और मर्यादाओं को ठेंका दिखाने के उसके नजरिए मेल खाता है। मगर ऐसा भारत के अतिथि जहाज के साथ भारतीय जल क्षेत्र के करीब करना भारत की चिंताओं के प्रति उसकी असंवेदनशीलता की भी मिसाल है।

इसलिए इस घटना पर भारत को औपचारिक विरोध एवं आपत्ति दर्ज करानी चाहिए। दुनिया में प्रतिष्ठित स्थान प्राप्त करने की सबसे पहली शर्त खुद अपनी प्रतिष्ठा के प्रति सचेत रहना होता है। वेनेजुएला और ईरान के मामलों में अंतरराष्ट्रीय नियमों के पक्ष में आवाज ना उठा कर भारत ने पहले ही अपनी अंतरराष्ट्रीय हैसियत की अनदेखी की है। मगर अब बात सैद्धांतिक रुख तय करने की नहीं, बल्कि अपने मामले में बोलने की है। कम-से-कम यह अवश्य कहा जाना चाहिए कि अमेरिका अपने युद्ध की आंच हम तक पहुंचाए। भारत के क्षितिज पर वैसे ही अमेरिकी युद्ध के आर्थिक दुष्परिणामों का अंदेशा सघन होता जा रहा है।


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