जीडीपी की नई सीरीज

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शुरुआती धारणा यह बनती है कि सरकार ने अपने आंकड़ों को अधिक विश्वसनीय बनाने की कोशिश की है। संभवतः यह आईएमएफ के निर्णय का असर है, जिसके तहत उसने भारत के आर्थिक आंकड़ों को सी ग्रेड में डाल दिया था।

सकल घरेलू उत्पाद की गणना की नई सीरीज के तहत इस वर्ष का अनुमान जारी हुआ, तो भारत के जीडीपी के कुल आकार में 12 लाख करोड़ रुपये की गिरावट दर्ज हो गई। पिछले साल जारी हुए प्रथम अनुमान में 2025-26 में भारत का जीडीपी 357 लाख करोड़ रुपये तक पहुंचने का अनुमान लगाया गया था। नई सीरीज के तहत ये अनुमान 345 लाख करोड़ रुपये रह गया है। ऐसा संभवतः इसलिए हुआ कि 2022-23 को आधार वर्ष मान कर जीडीपी के आकलन के लिए जो स्रोत चुने गए हैं, उनमें सुधार हुआ है। शुरुआती धारणा यह बनी है कि भारत सरकार ने अब अपने आंकड़ों को अधिक विश्वसनीय बनाने की कोशिश की है।

संभवतः यह अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के उस निर्णय का असर है, जिसके तहत उसने भारत के आर्थिक आंकड़ों को सी ग्रेड में डाल दिया था। जीडीपी के आकार में गिरावट की एक बड़ी वजह निजी उपभोग खर्च के आंकड़े में आई लगभग दो फीसदी की गिरावट है। दूसरी वजह सेवा क्षेत्र (व्यापार, रिपेयर, होटल, ट्रांसपोर्ट, संचार आदि) में सकल मूल्य निर्माण (जीवीए) के आकलन में बड़ी कटौती है। इसी तरह सामान्य प्रशासन और कंस्ट्रक्शन आदि क्षेत्रों के योगदान का अनुमान पहले की तुलना में घट गया है। मैनुफैक्चरिंग एकमात्र महत्त्वपूर्ण क्षेत्र है, जिसके योगदान का अनुमान नई सीरीज के तहत बेहतर हुआ है।

नए आंकड़ों से कुल छवि यह उभरती है कि अर्थव्यवस्था का प्राथमिक क्षेत्र (कृषि, पशुपालन, खनन, वन उत्पाद) आदि में विकास गतिरुद्ध है, द्वितीय क्षेत्र (मैनुफैक्चरिंग, निर्माण, ऊर्जा उत्पादन) में गति बनी हुई है, जबकि तृतीय क्षेत्र (सेवा) में वृदधि की रफ्तार मंद हुई है। वैसे विशेषज्ञों ने संकेत दिया है कि नई सीरीज से कई विसंगतियों का जवाब नहीं मिला है। मसलन, निवेश दर (32 प्रतिशत) से जितना अपेक्षित है, जीडीपी वृद्धि दर (7.6 प्रतिशत) उससे कहीं अधिक नजर आती है। दूसरी तरफ जीडीपी की जो वृद्धि दर बताई गई है, सकल उपभोग की वृद्धि दर उससे कहीं ज्यादा दिखाई गई है। उचित होगा कि सरकार ऐसे सवालों के ठोस उत्तर पेश करे, ताकि आंकड़ों की विश्वसनीयता बहाल करने दिशा में सचमुच प्रगति संभव हो सके।


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