अमेरिका ने ईरान के आसपास दो बड़े युद्धपोतों की तैनाती की है और उसके बाद लड़ाकू विमानों की अग्रिम तैनाती पश्चिम एशिया में कर दी है। हालांकि आम तौर पर इस तरह की सैन्य गतिविधियां प्रत्यक्ष युद्ध की घोषणा नहीं होतीं, बल्कि प्रतिरोधक शक्ति का प्रदर्शन होती हैं।
अमेरिका क्या ईरान में युद्ध छेड़ेगा? अमेरिका की तैयारियों को देख कर तो लगता है कि वह युद्ध छेड़ने वाला है लेकिन इस पर सवालिया निशान इसलिए है क्योंकि वह जेनेवा में ईरान के साथ वार्ता भी कर रहा है। पहले मस्कट में ईरान के साथ वार्ता हुई और अब जेनेवा में वार्ता हुई है। यह भी खबर है कि अमेरिका सिर्फ ईरान के परमाणु हथियार बनाने की गतिविधियों पर रोक लगाने या उसके बैलेस्टिक मिसाइल कार्यक्रम को रूकवाने की बात नहीं कर रहा है, बल्कि उसके साथ व्यापार की भी बात कर रहा है। यह हैरानी की बात है। अगर दोनों देशों के ऐतिहासिक संबंधों को देखें और पश्चिम एशिया की भू राजनीतिक स्थिति को देखें तो यह सोचना कठिन है कि अमेरिका कभी ईरान से व्यापार की वार्ता कर सकता है। लेकिन यह खबर है कि अमेरिका के दोनों वार्ताकार स्टीव विटकॉफ और जारेड कुशनर व्यापार की वार्ता भी कर रहे हैं। इस पर बात हो रही है कि ईरान अपना बाजार अमेरिकी उत्पादों के लिए खोले, अमेरिका से रक्षा सौदे करे और बदले में ईरान को तेल बेचने की छूट मिले। माना जा रहा है कि बाकी बातें इसके साथ ही सुलझ जाएंगी।
हालांकि यह आसान नहीं है फिर भी इससे एक बात तो साबित होती है कि राजनीति की तरह कूटनीति में भी कोई स्थायी दोस्त या दुश्मन नहीं होता है। बहरहाल, अभी तो स्थिति यह है कि अमेरिका ने ईरान के आसपास दो बड़े युद्धपोतों की तैनाती की है और उसके बाद लड़ाकू विमानों की अग्रिम तैनाती पश्चिम एशिया में कर दी है। हालांकि आम तौर पर इस तरह की सैन्य गतिविधियां प्रत्यक्ष युद्ध की घोषणा नहीं होतीं, बल्कि प्रतिरोधक शक्ति का प्रदर्शन होती हैं। ऐसा लग रहा है कि अमेरिका यही काम कर रहा है। वह ईरान पर दबाव बना रहा है ताकि मनमाफिक समझौता कर सके। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने खामेनाई की सत्ता बदलने की बात कही है लेकिन कम से कम अभी ऐसा होने की संभावना नहीं दिख रही है।
अगर सचमुच खामेनाई की सत्ता बदलना मकसद होता तो जिस समय ईरान के लाखों लोग सड़कों पर उतरे थे और ट्रंप कह रहे थे कि मदद पहुंच रही है उसी समय अमेरिकी मदद पहुंची होती। उस समय अमेरिका ने प्रदर्शनकारियों की कोई मदद नहीं की। उलटे ट्रंप ने रजा पहलवी के नेतृत्व की संभावना को भी खारिज कर दिया। इसलिए उनकी मंशा कुछ और ही प्रतीत होती है। एक तरफ वे दबाव बना रहे हैं तो दूसरी ओर कूटनीति का रास्ता भी खोले हुए हैं। ऐसा लग रहा है कि राष्ट्रपति ट्रंप एक तरफ इजराइल को भी खुश रखना चाहते हैं और दूसरी ओर ईरान के साथ बिना युद्ध के ही कुछ बड़ा हासिल करना चाहते हैं। ध्यान रहे ट्रंप को ईरान की क्षमताओं का अंदाजा है और यह भी पता है कि अगर युद्ध छिड़ा तो कितनी बड़ी क्षेत्रीय अशांति होगी। ईरान होरमुज की खाड़ी में दुनिया के 20 फीसदी तेल कारोबार को बाधित कर सकता है और पूरे क्षेत्र में मौजूद 50 हजार अमेरिकी सैनिकों के साथ साथ इजराइल के लिए भी खतरा पैदा कर सकता है। अगर ईरान में बातचीत के जरिए शांति बहाल होती है, ईरान परमाणु हथियार बनाने की योजना को स्थायी रूप से स्थगित करता है और अमेरिका के साथ व्यापार संधि होती है तो फिर यह एक नए दौर की शुरुआत होगी।
