राष्ट्रपति मैक्रों ने मुंबई में कहा भी कि फ्रांस भारत पर भरोसा करता है इसलिए उसे प्रौद्योगिकी हस्तांतरण में कोई समस्या नहीं है। इसलिए आगे का सवाल है कि क्या फ्रांस, भारत के लिए रूस जैसा सामरिक सहयोगी बन सकता है?
फ्रांस क्या भारत के लिए नया रूस हो सकता है? य़ह लाख टके का सवाल है। दोनों देशों के बीच जिस तरह सामरिक संधियां हो रही हैं और राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों की भारत यात्रा में दोनों देशों ने जैसे अपने संबंधों को स्पेशल ग्लोबल स्ट्रेटेजिक पार्टनरशिप में बदला वह एक नए युग की शुरुआत का संकेत है। वैसे भी पिछले कुछ सालों में भारत और फ्रांस के बीच सामरिक संबंधों का तेज़ी से विस्तार हुआ है। राष्ट्रपति मैक्रों के भारत दौरे में दोनों देशों ने रक्षा, हिंद प्रशांत रणनीति, अंतरिक्ष, परमाणु ऊर्जा और उभरती प्रौद्योगिकियों के क्षेत्र में सहयोग को और गहरा करने पर सहमति जताई है। यह सिर्फ दोपक्षीय संबंधों का विस्तार नहीं है, बल्कि बदलती विश्व व्यवस्था में एक संतुलनकारी रणनीति का संकेत है।
भारत और फ्रांस दोनों देश रणनीतिक स्वायत्तता के समर्थक हैं। फ्रांस, यूरोप में एकमात्र परमाणु शक्ति और संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद का स्थायी सदस्य होने के नाते स्वतंत्र विदेश नीति पर जोर देता है। इसी तरह भारत भी बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था का समर्थक है। हाल के दिनों में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की अनिश्चित विदेश नीति ने दोनों देशों को अपने संबंधों में विविधता लाने के लिए बाध्य किया है।
बहरहाल, भारत व्यापार से लेकर रक्षा के क्षेत्र में अपने समझौतों में विविधता ला रहा है। तभी फ्रांस से राफेल लड़ाकू विमानों की खरीद को भारत ने प्रमुखता दी है। भारत नए विमानों की खरीद और भारत में निर्माण की संधि कर रहा है। ध्यान रहे फ्रांस उन चुनिंदा देशों में है जो भारत को अत्याधुनिक रक्षा तकनीक साझा करने के लिए तैयार रहते हैं। यह दीर्घकालिक तकनीकी सहयोग भारत की आत्मनिर्भर रक्षा उत्पादन नीति के अनुरूप भी है। राष्ट्रपति मैक्रों ने मुंबई में कहा भी कि फ्रांस भारत पर भरोसा करता है इसलिए उसे प्रौद्योगिकी हस्तांतरण में कोई समस्या नहीं है।
अब सवाल है कि क्या फ्रांस, भारत के लिए रूस जैसा सामरिक सहयोगी बन सकता है? ऐतिहासिक रूप से रूस और पहले का सोवियत संघ भारत का सबसे विश्वसनीय रक्षा साझेदार रहा है। सुखोई विमान या टी 90 टैंक रूस से भारत को मिलते हैं। लेकिन यूक्रेन युद्ध की वजह से और दूसरे भू राजनीतिक कारणों से रूस की आपूर्ति शृंखला प्रभावित हुई है। तभी भारत रक्षा खरीद में भी विविधता ला रहा है। यह लंबे समय में भारत की सामरिक तैयारियों को दिखाता है। हालांकि ऐसा नहीं है कि फ्रांस से सामरिक समझौते के बाद रूस के साथ भारत के संबंध खत्म हो जाएंगे। फ्रांस और रूस दोनों की भूमिका और संदर्भ अलग हैं। रूस के साथ भारत का संबंध ऐतिहासिक गहराई, सैन्य निर्भरता और भू राजनीतिक समन्वय पर आधारित रहा है। तो फ्रांस के साथ संबंध आधुनिक तकनीक, वैश्विक मंचों पर साझेदारी और हिंद प्रशांत में साझा रणनीतिक हितों पर केंद्रित हैं। विश्व व्यवस्था के लिहाज से देखें तो फ्रांस के साथ साझेदारी भारत की ‘मल्टी अलाइनमेंट’ नीति को मजबूती देता है। अमेरिका, रूस, फ्रांस, जापान और अन्य शक्तियों के साथ समानांतर संबंध रख कर भारत किसी एक धुरी पर निर्भरता कम कर रहा है। इससे भारत की वैश्विक सौदेबाजी क्षमता बढ़ती है और उसे अधिक रणनीतिक लचीलापन मिलता है।
