ममता बनर्जी का मोर्चा

Categorized as संपादकीय

एसआईआर गंभीर विसंगतियों से ग्रस्त रहा है। सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों से खामियां दूर करने में कई बार मदद मिली, लेकिन बुनियादी मुद्दे हल नहीं हुए। ममता बनर्जी के वकील की भूमिका अपनाने से भी ऐसा होने की संभावना कम ही है।

ममता बनर्जी इस मामले में अनूठी राजनेता हैं कि सत्ता के ऊंचे पदों पर रहने के बावजूद उन्होंने अपनी जूझारू भूमिका कभी नहीं छोड़ी। 15 साल से मुख्यमंत्री हैं, लेकिन इस दौरान उनकी गतिविधियों ने कोलकाता की सड़कों को कभी सियासी तौर पर सूना नहीं होने दिया। इस बीच बुधवार को उन्होंने नया चोला पहना। युवावस्था में ली गई कानून की डिग्री का उपयोग करते हुए वे सुप्रीम कोर्ट में बतौर वकील पेश हुईं। इस तरह मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के खिलाफ अपनी लड़ाई को उन्होंने नया मुकाम दिया।

इसके पहले पश्चिम बंगाल के उन जीवित मतदाताओं को लेकर वे निर्वाचन आयोग के दफ्तर गई थीं, जिनके नाम कथित तौर पर गलत ढंग से मतदाता सूची से हटाए गए हैँ। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री का आरोप है कि निर्वाचन आयोग में उनसे बदसलूकी की गई, इसलिए आनन- फानन में उन्हें वहां से निकलना पड़ा। तो सुप्रीम कोर्ट में अपने खास अंदाज में उन्होंने इस केस की पैरवी की। समाधान क्या निकलेगा, कहना कठिन है। एसआईआर की प्रक्रिया गंभीर विसंगतियों से ग्रस्त रही है। इस कारण भारत की चुनाव व्यवस्था को लेकर अविश्वास बढ़ा है। सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों से प्रक्रियागत खामियां दूर करने में कई बार मदद मिली, लेकिन इससे बुनियादी मुद्दे हल नहीं हुए।

ममता बनर्जी के वकील की भूमिका अपनाने से इस सूरत में आमूल बदलाव होगा, इसकी संभावना कम ही है। लेकिन अंत तक और हर मोर्चे पर संघर्ष करने के ममता के इरादे ने यह जरूर दिखाया है कि लोकतंत्र के सिकुड़ने का रोना रोने वाले विपक्षी राजनेता ऐसी परिस्थितियों में अपना दायित्व कैसे निभा सकते हैं। लोकतंत्र में किसी समस्या को मुद्दा बना देने और उसे लगातार मुद्दा बनाए रखने का अपना महत्त्व होता है। ऐसा हर उपलब्ध मंच और माध्यम का इस्तेमाल करते हुए ही किया जा सकता है। ममता बनर्जी ने एक समय अपराजेय दिखने वाला लेफ्ट फ्रंट का किला इसी अंदाज से ध्वस्त किया था। अब उसी ढंग से वे अपना किले को बचाने की जद्दोजहद में हैं। यह अंदाज अहम है। इसका महत्त्व चुनावी सफलता या विफलता से तय नहीं होगा।


Previous News Next News

More News

प्रहलाद जोशी के जरिए बड़ा संदेश

July 29, 2026

ऐसी चर्चा थी कि धर्मेंद्र प्रधान शिक्षा मंत्री के पद से इस्तीफा देंगे तो डॉक्टर जितेंद्र सिंह को उनकी जगह शिक्षा का प्रभार दिया जाएगा। यह अंदाजा इस बात से लगाया जा रहा था कि कॉकरोच जनता पार्टी के आंदोलन के दौरान वे सक्रिय भूमिका निभा रहे थे। प्रधानमंत्री आवास के सामने राहुल गांधी के…

अब ई-20 पार्टी बन कर तैयार है

July 29, 2026

सरकार अभी कॉकरोच जनता पार्टी के आंदोलन से मिले जख्मों को सहला ही रही है कि इथेनॉल मिश्रित पेट्रोल यानी ई-20 पेट्रोल के खिलाफ आंदोलन की तैयारी शुरू हो गई है। इसके लिए ई-20 पार्टी का गठन हो गया है। इस पार्टी को सोशल मीडिया में पर्याप्त समर्थन भी मिल रहा है। कॉकरोच जनता पार्टी…

क्या दिपके राजनीतिक पार्टी बनाएंगे?

July 29, 2026

अभिजीत दिपके और उनके नजदीकी लोग जैसे आशुतोष रांका और सौरव दास दावा कर रहे हैं कि अभी राजनीतिक पार्टी बनाने का कोई इरादा नहीं है और न चुनाव लड़ना है। लेकिन असल में दिपके और उनकी टीम राजनीतिक दल बनाएंगे। ध्यान रहे भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के समय इंडिया अगेंस्ट करप्शन के लोग खास कर…

पीके से पूरा एनडीए लड़ रहा है

July 29, 2026

बिहार की बांकीपुर विधानसभा सीट का उपचुनाव भाजपा के लिए दुःस्वप्न साबित हो रहा है। भाजपा के कई नेता कह रहे हैं कि नितिन नबीन को सीट से इस्तीफा नहीं देना चाहिए थे। गौरतलब है कि राष्ट्रीय अध्यक्ष होने के बाद वे राज्यसभा चले गए और उन्होंने बांकीपुर सीट से इस्तीफा दे दिया। इसकी वजह…

कॉकरोच: एक शब्द का बल

July 29, 2026

द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान ब्रिटिश प्रधानमंत्री विंस्टन चर्चिल ने दिया था। उन के शब्दों ने हिटलर के सामने पस्त हो रहे इंग्लैंड को बल दिया। इस हद तक कि कई यूरोपीय देशों को टिके रह कर लड़ने का हौसला मिला।…. चर्चिल ने अंग्रेजी भाषा को बुलाया और उसे युद्धभूमि में उतार दिया।” आज कम…

logo