एक प्रतीकात्मक सरकार

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मणिपुर में वर्तमान विधानसभा के तहत ही नई सरकार बनाने के निर्णय के साथ कई दिक्कतें जुड़ी हैँ। पहली तो यही कि विधानसभा की संवैधानिक स्थिति पर सवाल हैं। इस बारे में हाई कोर्ट में कांग्रेस की याचिका विचाराधीन है।

मणिपुर में सरकार बनाने का भारतीय जनता पार्टी का फैसला समस्याग्रस्त है। भाजपा की सोच है कि मैतेई मुख्यमंत्री और कुकी एवं (संभवतः) नगा उप-मुख्यमंत्री बना कर सामुदायिक तनाव का समाधान निकाला जा सकता है। इससे इन समुदायों में सत्ता में साझेदारी मिलने का भरोसा पैदा होगा, जिससे उनमें सुरक्षा की भावना पैदा होगी। संभव है कि यह समझ आंशिक रूप से सही हो। मगर वर्तमान विधानसभा के तहत ही नई सरकार बनाने के निर्णय के साथ कई दिक्कतें जुड़ी हुई हैँ। पहली तो यही कि इस विधानसभा की संवैधानिक स्थिति पर सवाल हैं।

हाई कोर्ट में कांग्रेस की याचिका विचाराधीन है, जिसमें दलील दी गई है कि दो सत्रों के बीच छह महीने से अधिक का अंतराल हो जाने के कारण विधानसभा अब अस्तित्व में नहीं है। विधानसभा की आखिरी बैठक 12 अगस्त 2024 को हुई थी। संविधान के अनुच्छेद 174(1) के तहत अगली बैठक 11 फरवरी 2025 तक हो जानी चाहिए थी। मगर ऐसा नहीं हुआ। 13 फरवरी 2025 से राष्ट्रपति शासन लागू कर दिया गया। बहरहाल, यह तकनीकी मसला है। राजनीतिक मुद्दा उससे कहीं बड़ा है। मैतेई और कुकी समुदायों में विवाद की वजहें गहरी हैं। मई 2023 में हुई हिंसा ने, जो उसके बाद भी छिट-पुट रूप से जब-तब भड़कती रही है, भावनात्मक विभाजन की गहरी खाई पैदा कर रखी है।

अभी हाल में वो दुर्भाग्यपूर्ण घटना हुई, जिसमें अपनी कुकी पत्नी से मिले गए मैतई पति की कुकी समुदाय के लोगों ने हत्या कर दी, जबकि पत्नी को वहां से सुरक्षित जाने दिया गया। इस घटना ने उचित ही देश के विवेक को आहत किया। बहरहाल, जब हालात यहां तक पहुंचे हों, तो जरूरत नई शुरुआत की होती है। तब समाज के स्तर पर जख्मों पर मरहम लगाना और असंतोष के मूलभूत कारणों को दूर करना अनिवार्य हो जाता है। राजनीतिक मोर्चे पर भी तब बेहतर रास्ता प्रतिनिधित्व के नए अवसर प्रदान करना होता। विधानसभा का कार्यकाल साल भर और है। बेहतर होता, अगर नए चुनाव अभी कराए जाते। उससे कम-से-कम नई शुरुआत की आस जगती। लेकिन भाजपा ने अभी साल भर और सत्ता भोगने का फैसला किया है।


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