रुख में चाहिए स्पष्टता

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सरकार ने विपक्ष से संवाद करते हुए राष्ट्र को भरोसे में लिया होता, तो संभवतः चीनी कंपनियों के लिए भारत के दरवाजे खोलने के मुद्दे पर उसे आलोचना नहीं झेलनी पड़ती। बहरहाल, सरकार चाहे तो अब भी यह रास्ता अपना सकती है।

हालांकि पुष्टि नहीं हुई है, मगर मीडिया में छपी कई ऐसी रिपोर्टों से देश में व्यग्रता देखी गई है कि केंद्र भारतीय बाजार को चीनी कंपनियों के लिए खोलने जा रहा है। कुछ खबरों के मुताबिक जिन क्षेत्रों को खोला जाएगा, उनमें सरकारी ठेके भी हैं। सरकारी क्षेत्र के ठेके हर वर्ष 700-750 बिलियन डॉलर के होते हैं। यह एक बड़ा बाजार है। कुछ अन्य खबरों में बताया गया है कि सरकार जरूरत के हिसाब से कदम उठाएगी और यह सुनिश्चित करेगी कि उसी अनुपात में चीन भी भारतीय उत्पादों के लिए अपना बाजार खोले। बहरहाल, यह मामला सिर्फ व्यापारिक नहीं है। इसीलिए कई हलकों से इन खबरों पर उग्र प्रतिक्रिया हुई है। कांग्रेस ने तो इसे गलवाल घाटी के शहीदों का अपमान बताया है।

मुमकिन है कि ऐसी प्रतिक्रियाओं के पीछे सियासी मकसद भी हों, लेकिन भारत में मौजूद भावनाओं के मद्देनजर उन्हें बिल्कुल दरकिनार नहीं किया जा सकता। आखिर खुद नरेंद्र मोदी सरकार ने चीन कंपनियों पर प्रतिबंध अप्रैल 2020 के बाद से वास्तविक नियंत्रण रेखा पर बढ़े तनाव की पृष्ठभूमि में उठाया था। तब से चीन से कारोबार के प्रश्न को सत्ताधारी पार्टी और उसके समर्थकों ने भारतीय की राष्ट्रवादी भावनाओं से जोड़ा था। तब से भारत में दो तरह की धारणाएं रही हैं। एक राय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की इस घोषणा पर आधारित है कि ‘भारत की सीमा में ना तो कोई घुसा और ना किसी ने भारत की जमीन पर कब्जा किया है’।

दूसरी राय उन खबरों पर आधारित है, जिनमें लगातार बताया गया है कि चीनी फौज लद्दाख क्षेत्र में भारतीय इलाकों में घुसी और वहां बफर जोन बनवा कर वापस लौटी। यानी भारत की पहुंच से बड़ा इलाका निकल गया। मोदी सरकार ने इस बारे में विपक्ष से संवाद करते हुए राष्ट्र को भरोसे में लिया होता, तो संभवतः चीनी कंपनियों के लिए भारत के दरवाजे खोलने के मुद्दे पर उसे आलोचना नहीं झेलनी पड़ती। बहरहाल, अब सरकार चाहे तो यह रास्ता अपना सकती है। बेहतर होगा अगर वह आज की गंभीर आर्थिक चुनौतियों के मद्देनजर इस कदम की जरूरत पर राष्ट्रीय आम सहमति तैयार करे।


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